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Monday, 18 May 2020

जोकर काम पर-कहानी-देवेन्द्र कुमार


                  जोकर काम परकहानी-देवेन्द्र कुमार
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सड़क पर काम चल रहा है।  सड़क का एक हिस्सा नीचे धंस गया है।  शायद नीचे पानी की पाइप लाइन फट गई है।  गड्ढा खोदकर उसे घेर दिया गया है।  लोहे के बोर्ड लगा दिए हैं, जिन पर लिखा  है-‘ सावधान, आदमी काम पर हैं। ’ इसलिए वहां सड़क संकरी हो गई है।  ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए वहां सिपाही रामभज की ड्यूटी लगा दी गई है।    
दोपहर में एक घंटा काम बंद रहता है।  एक दोपहर वह लौटा तो देखा एक मजदूर बोर्ड पर कुछ लिख  रहा है-‘ आदमी’ शब्द पर कागज चिपका कर उस पर ‘जोकर’ लिख दिया गया था।  रामभज ने पढ़ा –‘जोकर काम पर’ – ‘’यह क्या है?’’ उसने पूछा।  जवाब में एक मजदूर ने कहा- ‘’मैने सही ही तो लिखा है, हमारे बीच एक जोकर मौजूद है। ‘’ और उसने अपने एक साथी की ओर इशारा किया। जिसे जोकर कहा गया था वह उठ कर रामभज के पास आ खड़ा हुआ।  उसने कहा- ‘’जी, पेशे से मैं जोकर हूँ।  लेकिन सर्कस बंद हो गया और मैं बेरोजगार।  जब जहाँ जो भी काम मिलता है वही कर लेता हूँ। ’’  छोटे कद और दुबले शरीर वाला वह आदमी कहीं से भी तो सर्कस के जोकर जैसा नहीं लग रहा था।  रामभज ने फिर पूछा –‘’ क्या तुम सच में सच कह रहे हो!’’
 “जी। -“-- ज़वाब आया।  उस का नाम डेविड था।  
रामभज  बोला-‘’ अगर तू जोकर है तो वही करतब दिखा जो सर्कस में दिखाया करता था।’’
लेकिन मेरे पास जोकर की पोशाक तो अब है नहीं। ’ डेविड बोला।  
कोई बात नहीं तू जोकर के करतब दिखा। ’--रामभज हंस रहा था।  
डेविड ने रामभज का डंडा थाम लिया और कुछ देर तक खामोश खड़ा रहा। एकाएक उसने   डंडा हवा में उछाला और फिर लपक कर पकड़ लिया।  तब उसके दोनों पैर हवा में थे।  फिर उसने गोल गोल घूमते हुए डंडे को कभी इधर तो कभी उधर उछालते हुए उसे हवा में अधर रखा, और हर बार जमीन पर गिरने से पहले ही दुबारा लपक लिया।  वह बड़ी कुशलता से अपने करतब दिखा रहा था।  उसका बदन रबर की तरह लचकीला दिख रहा था।  डेविड ने डंडे को एक बार फिर हवा में काफी ऊपर उछाल दिया और खुद भी उछला उसे हवा में पकड़ने के लिए,   फिर न जाने क्या हुआ – डंडा फुटपाथ पर आ गिरा और डेविड गड्ढे में।
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  डेविड के दो साथी तुरंत गड्ढे में कूद गए।  रामभज भी झुक कर मदद करने लगा।  डेविड गड्ढे की तली में पीठ के बल पड़ा था। उसे बाहर निकाल कर पटरी पर लिटा दिया गया।  वह बेहोश था।  रामभज पछता रहा था कि काश उसने डेविड से खेल दिखाने को न कहा होता। उसने वहां से गुज़रती हुई एक कार को रोका फिर कई मजदूरों ने डेविड को सीट पर लिटा दिया।  रामभज ने ड्राईवर से हॉस्पिटल चलने को कहा।  साथ में डेविड के दो साथी भी थे।  डॉक्टर ने डेविड को देखा और उसे एडमिट कर लिया ।  डॉक्टर ने कहा कि डेविड को ठीक होने में कई दिन लगने वाले थे।  डॉक्टर ने दवा का परचा रामभज को थमा दिया।  केमिस्ट की दुकान अंदर ही थी। दवाओं का बिल काफी ज्यादा था। रामभज की जेब में उतने पैसे नहीं थे।  उसने केमिस्ट से कहा_ ‘‘मैं बाकी पैसे अभी लाकर देता हूँ। ’’
 डेविड का एक साथी रामभज के साथ हॉस्पिटल में ही रहा।  रामभज सोच रहा था कि अब क्या करे?  डेविड की मां गाँव में रहती थी।  अब जो करना था उसे ही करना था।  इलाज महंगा था, लेकिन डेविड को इस हालत में बेसहारा तो नहीं छोड़ा जा सकता था।  डेविड के साथी ने कहा - ‘’अब क्या होगा।  हम लोगों के पास तो पैसे एकदम नहीं हैं।  रामभज ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया_’’ चिंता मत करो।  कुछ न कुछ इंतजाम तो होगा ही। ’’    
सुबह ड्यूटी से पहले हॉस्पिटल जाकर डेविड का हालचाल लिया।  डॉक्टर से बात की।    डेविड के एक साथी से रामभज ने हॉस्पिटल में ही रहने को कहा_’’ काम की चिंता मत करो, अभी डेविड की देख भाल ज़रूरी है।  बाकी मैं संभाल लूँगा। ’’ वहां से वह ड्यूटी पर आ गया। आगे क्या होगा अभी इसकी कल्पना मुश्किल थी।  तभी दिमाग में एक विचार आया।  वह कुछ पल बोर्ड की ओर देखता रहा जिस पर ’जोकर काम पर’ लिखा था.उस पर  नया कागज़ चिपका कर उस पर लिख दिया_ ‘जोकर घायल है।  उसे मदद चाहिए। ’  
 यह लिख कर रामभज ड्यूटी में व्यस्त हो गया।  तभी वहां एक कार आकर रुक गई।  कार से उतर कर एक आदमी रामभज के पास आया।  उसने कहा_’’ यह जोकर का क्या मामला है?’’ रामभज ने संक्षेप में पूरी बात बता दी।  “ अस्पताल में दवाओं की दुकान मेरी ही है’’। -- उसने कहा। मैं मदद करूंगा। ” कह कर वह चला गया। रामभज शाम को ड्यूटी निपटा कर उस आदमी से मिला।  उसने डेविड के लिए दवाएं आधी कीमत पर देने का वादा किया।  बोला_’’ आप आधी कीमत भी बाद में चुका देना।“
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रामभज को  इसकी आशा नहीं थी।  यह तो चमत्कार ही हो गया था।  एक बड़ी चिंता दूर हो गयी थी। अब डेविड की तबियत में काफी सुधार  था।  कुछ दिन बाद उसे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई।  वह ख़ुशी का दिन था।  डेविड फुटपाथ पर कुर्सी पर बैठा था।  रामभज और डेविड के साथी आसपास खड़े हंस रहे थे।  रामभज मिठाई लाया था।  जिस गड्ढे में डेविड जा गिरा था उसे  भर दिया गया था।  सड़क की मरम्मत हो चुकी थी।  डेविड के साथी कहीं और काम कर रहे थे।  
‘’ अब क्या इरादा है?’’ ‘रामभज डेविड से पूछ रहा था।
‘‘सोचता हूँ  गाँव चला जाऊं माँ के पास।  उन्हें चिंता  हो रही होगी। ’’
‘’हाँ, यही ठीक रहेगा। ’’- रामभज ने कहा।  डॉक्टर ने डेविड को कुछ दिन आराम करने की सलाह दी थी।  रामभज डेविड को उसके गाँव छोड़ आया।  डेविड को सही- सलामत देख कर उसकी माँ बहुत खुश हुई। डेविड की माँ की साधारण झोंपड़ी थी पर साफ़ सुथरी।  आगे फूल लगे थे और पीछे फलों के पेड़ और साग-- भाजी की  क्यारियाँ।  डेविड की माँ सब्जी बेच कर गुज़ारा करती थी।  पहले डेविड शहर से पैसे भेज दिया करता था, लेकिन सर्कस बंद होने से मुश्किल बढ़ गई थी।  
रामभज समझ गया कि डेविड को जल्दी ही कोई काम-धंधा करना होगा।  चलते समय उसने डेविड से कहा-‘’ कुछ दिन आराम कर लो फिर शहर आ जाना।  कुछ तो हो ही जाएगा। ’’ रामभज को तसल्ली थी कि एक बड़ी आफत दूर हो गई।  घर जाकर वह पत्नी को डेविड के बारे में बताने लगा,  तभी उसका बेटा रजत वहां आ गया।  डेविड के बारे में सुन कर बोला-‘’ पापा, हमारे स्कूल की बस रोज वहाँ से गुज़रती है जहां बोर्ड पर जोकर के बारे में लिखा हुआ है।  हमारी क्लास ने जोकर भाई के लिए कुछ पैसे जमा किये हैं।  हम वह पैसे उन्हें देना चाहते हैं। ’’
‘’ लेकिन डेविड तो मैं  उसके गाँव छोड़ कर आ रहा हूँ। ’’ पिता की यह बात सुनकर रजत कुछ देर चुप रहा फिर बोला-‘’ तब उन पैसों का क्या करें?’’
रामभज समझ नहीं पा रहा था कि रजत से क्या कहे।  अगले दिन स्कूल से लौटने के बाद रजत ने रामभज को बताया कि प्रिंसिपल सर ने कल उसे मिलने के लिए बुलाया है।  रामभज जाकर रजत के प्रिंसिपल से मिला।  उन्होंने कहा-‘’ बच्चे गाँव जाकर डेविड से मिलना और उसे जमा की गई रकम देना चाहते हैं। ’’
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रामभज जानता था कि डेविड इस तरह दान के पैसे कभी नहीं लेगा।  पर उसने कुछ कहा नहीं, वह बच्चों की टोली को डेविड के पास ले जाने को तैयार हो गया।  प्रिंसिपल ने स्कूल की ओर  से बस का प्रबंध कर दिया था।  बस डेविड के घर के सामने जाकर रुकी तो पूरे गाँव में हल्ला मच गया।  बच्चों की टोली को देख कर डेविड और उसकी माँ तो ख़ुशी से जैसे पागल हो गए।  डेविड की माँ ने कहा-‘’ बच्चों को खिलाने के लिए घर में तो कुछ है नहीं । ’’ इस पर रामभज ने कहा- ‘’आप कोई चिंता न करें ।  बच्चों के पास उनके लंच बॉक्स हैं।  आप उन्हें अपने बाग़ के कुछ फल खिला दें। ’’ बच्चों को डेविड से मिल कर बहुत अच्छा लगा।  वे डेविड को पैसे देने को उतावले थे पर रामभज ने उन्हें मना कर दिया।  विदा लेते समय उसने डेविड से कहा—‘’ अब तुम ठीक हो गए हो।  शहर आकर स्कूल के बच्चों से मिल लो।  कोई  काम भी देखो। ’’
कुछ दिन बाद डेविड गाँव से आ गया।  रामभज उसे रजत के स्कूल ले गया।  प्रिंसिपल ने डेविड से कहा-‘’ हमारे स्टूडेंट्स तुम्हारे सर्कस वाले करतब देखना चाहते हैं। ’’
डेविड ने कहा-‘’ काफी दिन हो गए सर्कस बंद हुए। ’’
 ‘’ तो क्या हुआ।  बच्चों के लिए क्या इतना भी नहीं करोगे। ’’  कह कर प्रिंसिपल हंसने लगे।  आखिर डेविड राजी हो गया।  सर्दी का मौसम था।  स्कूल के ग्राउंड पर गुनगुनी धूप बिखरी थी।  पूरा स्कूल वहां जमा था।  डेविड के लिए जोकर की पोशाक का बंदोबस्त कर लिया था।  जोकर की पोशाक में डेविड सामने आया तो सब बच्चे तालियाँ बजाने लगे।  डेविड को सर्कस के दिन याद आ गए।  वह अपने करतब दिखाने लगा।  पूरा ग्राउंड रह रह कर तालियों से गूंजने लगा।  बाद में प्रिंसिपल ने उसे एक लिफाफा दिया।  कहा—‘’यह बच्चों की ओर से तुम्हारे लिए है। ’’
डेविड ने तुरंत लिफाफा लौटा दिया।  बोला—‘’ मैं यह पैसे कभी नहीं ले सकता। ’’ अब रामभज को अपनी बात कहने का अवसर मिला।  उसने कहा—‘’ ये पैसे तुम्हारे लिए नहीं हैं।  ये हैं तुम्हारी माँ और तुम्हारे मजदूर दोस्तों के लिए।  उन लोगों ने रात दिन तुम्हारी देख भाल की है।  क्या उनकी मदद नहीं करोगे? और अभी हॉस्पिटल के केमिस्ट का उधार भी चुकाना है। ’’ 
प्रिंसिपल ने कहा-‘’ डेविड, शहर में रहकर तुम्हें कुछ तो करना ही होगा, तब फिर यही क्यों नहीं।  मैं कोशिश करूंगा कि दूसरे स्कूलों में भी तुम खेल दिखाओ।  अपनी माँ और अपने दोस्तों की उसी तरह मदद करो जैसे उन्होंने तुम्हारी सहायता की है। ’’ अब कुछ और कहने की जरूरत नहीं थी।  
  सड़क की मरम्मत हो चुकी थी।  रामभज की ड्यूटी कहीं और लग गई थी,लेकिन ‘जोकर वाला बोर्ड’ अब भी वहीँ लगा था, उस पर जोकर की सुंदर ड्राइंग बनी थी।  उसके नीचे लिखा था- धन्यवाद।
           ( समाप्त )




          

Tuesday, 31 March 2020

मिठास--कहानी--देवेन्द्र कुमार


मिठास—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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  सोमू ने ध्यान से उधर देखा –अगल बगल रोशनी से चमकती दुकानों के बीच दबी सहमी सी संकरी छोटी सी जगह में पीला बल्ब जल रहा था। एक फट्टे पर दो थालियों में समोसे और गुलाब जामुन रखे थे। उनके पीछे दो जने बैठे थे – एक बूढी औरत और सात आठ साल का एक बच्चा।
   सोमू ने आस पास की दुकानों में पता किया था, गली में खड़े फेरी वालों से पूछा था। वह खस्ता हाल दुकान किसी नरेश की थी। वह अक्सर बीमार रहा करता था। इसलिए दुकान खुलती कम लेकिन बंद ज्यादा रहती थी। और नरेश की जगह उसकी बूढी माँ रामवती अपने पोते परेश के साथ बैठी नजर आती थी-- सामने समोसे और गुलाब जामुन रखे हुए, जो देखने से ही बासी लगते थे। सोमू ने कई दिन तक देखा और सोचा और फिर एक शाम रामवती के सामने जा खड़ा हुआ। वह दुकान पर कब्जा करने की स्कीम बना रहा था, क्योंकि नरेश तो अब नहीं रहा था।  
    ‘ माई, राम राम, समोसा और गुलाब जामुन तो देना।’
     रामवती ने झट पास रखी प्लेट उठा कर अपने आँचल से पोंछी और एक समोसा और एक गुलाब जामुन रख कर सोमू की ओर बढ़ा दी। सोमू प्लेट लेकर परेश के पास बैठ गया। वह खाना शुरू करता इसके पहले ही रामवती ने हडबडा कर कहा -–‘बेटा, माफ़ करना, ये गरम नहीं हैं।’
    ‘माई, भूख में सब चलता है,वैसे गरम होते तो...’—अपनी बात अधूरी छोड़ कर सोमू ने समोसा खाना शुरू कर दिया। फिर दूसरे हाथ से परेश के बाल सहला दिए। रामवती ध्यान से देख रही थी। परेश ने दादी की ओर देखा तो बोल उठी—‘ तेरे मामा हैं।’ अब परेश ने सोमू की ओर नजर घुमाई तो सोमू ने उसका कन्धा थपकते हुए कहा ‘माई ने सच कहा—मैं तेरा मामा ही तो हूँ।’ फिर झोले से प्लास्टिक का डिब्बा निकाल कर रामवती को थमा दिया। बोला—‘गुलाब जामुन इसमें और समोसे कागज की थैली में रख दो। मैं दोस्त के घर जा रहा हूँ। गरम करके खायेंगे तो मज़ा आएगा।’
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  रामवती असमंजस में थी। सोमू बोला—‘ क्या सोच रही हो। जितने गुलाब जामुन और समोसे  हैं, सब रख  दो।’
  ‘क्या सच! सारे लोगे,लेकिन...’  सोमू ने डिब्बा रामवती के हाथ से ले कर उस की मुश्किल आसान कर दी, फिर जेब से सौ रुपये का नोट निकाल कर उसे थमा दिया।
  वह बोली -–‘लेकिन मेरे पास छुट्टे नहीं हैं।’ ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई  ग्राहक इतना सारा सामान ले रहा था। हंस कर सोमू ने कहा— ‘माई,चिंता मत कर। माँ –बेटे का हिसाब लम्बा चलेगा।  जल्दी चुकता होने वाला नहीं। बकाया फिर ले लूँगा।’ रामवती सोमू को जाते हुए देखती रही। परेश भी उधर ही ताक रहा था। दुकान बंद करके घर की ओर जाते हुए भी इसी बारे में सोच रही थी। कौनथा   यह अजनबी लड़का, जिसने नरेश की तरह माई पुकार कर उसके साथ बेटे का रिश्ता जोड़ लिया था।  रामवती घर पहुँच कर बहू रचना को कुछ बतलाती इससे पहले परेश बोल उठा—‘आज मामा आये थे और दादी को सौ का नोट दे गए।’  
    अब सोमू को अगली चाल चलनी थी। दूसरी शाम वह दुकान पर पहुंचा तो हडबडा गया—दुकान बंद थी। कुछ देर सोचता खड़ा रहा। अब क्या करे। तभी दूसरी तरफ खड़े फेरी वाले ने कहा – ‘आज दुकान नहीं खुली। शायद घर में किसी की तबीयत ख़राब हो। वैसे बेटे की मौत ने उसे तोड़ कर रख दिया है। पता नहीं किस उम्मीद में पोते के साथ यहाँ बैठी रहती है। मैंने तो कई बार समझाया है कि दुकान किसी को किराए पर दे दे या बेच कर छुट्टी करे। दुकान चलाना उसके बस की बातनहीं’   
  फेरी वाले के शब्द सोमू के कानों में जैसे मिठास घोल रहे थे। अगर ऐसा हो जाए तो...तो... पल भर में मन न जाने कितनी दूर उड़ गया। फिर अचकचा कर बोला—‘तुम किसी की बीमारी के बारे में कह रहे थे। पता ठिकाना मालूम होता तो जा कर देख आता।’
  ‘मैंने शायद तुम्हें कल भी देखा था। मैं रामवती के घर के पास ही रहता हूँ। आओ ले चलूँ।’गलियाँ पार करके फेरीवाला एक दरवाजे के सामने रुक गया। उसने आवाज लगाईं और दरवाज़ा खडका दिया। दरवाज़ा परेश ने खोला। सोमू को देखते ही मुड़ कर चिल्लाया—‘दादी, मामा आये हैं।’ सोमू अंदर घुसा तो देखा—रामवती चटाई पर हाथ टेक कर उठने की कोशिश कर रही थी। बोला—‘माई,लेटी रहो।बताओ तबीयत कैसी है।’  
   ‘मैं ठीक हूँ। तू अपनी बता।’—कहते हुए रामवती ने मुस्कराने का प्रयास किया।
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  ‘तेरा हाथ मेरे सिर पर है तो मुझे क्या चिंता।’—कहते हुए सोमू ने रामवती  का हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रखा तो चौंक पड़ा। उसे तेज बुखार था। परेश से बोला—‘ तेरी दादी को तो डाक्टर को दिखाना होगा।’ जवाब में रचना ने कहा—‘ मैं तो सुबह् से कई बार डाक्टर को दिखाने की बात कह चुकी हूँ ,लेकिन...’
  ‘अभी आया।’—कह कर सोमू बाहर निकल गया। कुछ देर बाद लौटा तो रामवती की बांह पकड़ कर बोला –‘रिक्शा बाहर खड़ी है,आओ।’ फिर साथ में परेश को भी ले लिया। रामवती के लौटने तक रचना ने इखरे-- बिखरे घर को कुछ संवार दिया। सोमू ने रामवती को दवा दी और कहा—‘अब चलता हूँ, कल फिर आऊंगा।’ लेकिन रामवती की पुकार ने रोक लिया। बोली—‘ उस दिन ठन्डे समोसे और गुलाब जामुन ले गया था। आज गरम चाय है, पीकर जाना।’ वह रामवती के पास ही बैठ गया। उसके मन ने कहा—‘सोमू ,तेरा काम हो गया।’
  चाय पीते पीते सोमू ने घर को अच्छी तरह निरख परख लिया। उसने एक बर्तन में रखे गुलाब जामुन देखे और कुछ कहने को हुआ, पर रचना पहले ही बोल पड़ी—‘मैंने गुलाब जामुन बहुत पहले ही बना लिए थे, फिर अम्माजी की तबियत बिगड़ गयी। समोसे नहीं बन सके।’
  ‘कोई बात नहीं। एक काम करो, यह गुलाब जामुन वाला बर्तन मुझे दे दो।’
  ‘पर आप इतने सारे गुलाब जामुनों का क्या करेंगे?’
  ‘यह भी खूब कहा। खुद खाऊंगा और दोस्तों को खिलाऊंगा।’फिर रामवती से बोला-‘माई, अब कुछ दिन दुकान पर मत बैठना, वर्ना तबीयत ज्यादा बिगड़ जायेगी।’
‘लेकिन...’
‘लेकिन वेकिन रहने दो। मैंने दुकान ठीक ढंग से चलाने के बारे में कुछ सोचा है।’
  फिर आने की बात कह कर सोमू बाहर चला आया।वह कई बार रामवती का हाल चाल लेने गया। उसे देख कर रामवती जैसे निहाल हो जाती थी।उसके जीवन में ऐसा पहली बार था कि किसी गैर ने उसके मन में इतनी गहरी जगह बना ली थी।और फिर एक दिन सोमू सबको दुकान पर ले गया, आसपास की चहल पहल के बीच अपनी उदास,उजाड़ दुकान रामवती और रचना को दुखी कर गई। सोमू बड़े ध्यान से उनके हाव भाव परख रहा था। कुछ देर की चुप्पी के बाद सोमू ने कहा- ‘मैंने परेश के बारे में कुछ सोचा है।’    
‘परेश के बारे में क्या...’
‘यही कि दुकान के चक्कर में नरेश की माई परेश का जीवन नष्ट कर रही है।’ –सोमू ने गंभीर स्वर में कहा।’बचपन पढाई और खेल कूद के लिए होता है। लेकिन तुम उसे सारा दिन दुकान पर अपने साथ बांधे रखती हो। हमें परेश के बचपन के बारे में भी तो सोचना चाहिए। हमें इसे स्कूल भेजना चाहिए।’
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‘पर मैं अकेली तो दुकान चला नहीं सकती।’
‘मैं भी यही चाहती हूँ कि परेश पढाई करे। इसके पापा की भी यही इच्छा थी।’—रचना बोली।
‘हमारे घर के पास एक अध्यापक रहते हैं। मैंने परेश के बारे में उनसे बात की थी। उनका कहना है कि पहले परेश को उनके पास भेजा जाए, ताकि वह समझ सकें कि परेश को किस क्लास में प्रवेश मिल सकता है।’
                            
‘यह तो बहुत अच्छा रहेगा।’—रचना ने उत्साहित स्वर में कहा।
‘ लेकिन दुकान...’ –रामवती बीच में रुक गई।
‘माई, मैंने इसका भी इंतजाम कर लिया है।’—सोमू ने रामवती का हाथ पकड़ कर कहा—‘मैं एक कारीगर को जानता हूँ जो अच्छी मिठाई बना सकता है,’ फिर रचना की ओर देख कर बोला –‘अब तुम्हें घर पर गुलाब जामुन और समोसे बनाने की जरूरत नहीं। माई सुबह आकर दुकान खोल देगी,फिर कारीगार गुलाब जामुन और समोसे बना देगा।’
‘मैं अकेली’—रामवती ने कहना चाहा।
‘तुम्हारे साथ रचना भी रह सकती है। मास्टरजी से पढ़ कर परेश भी यहीं आ जाया करेगा।’  
रामवती ने कहा—‘अब मेरी भी सुन ले। मैं इतना झंझट नहीं कर सकती। तू दुकान संभाल, हमें आराम से रहने दे।’
सोमू के मन में ख़ुशी फूटने लगी। अरे,उसकी योजना कितनी आसानी से सफल हो गई थी। लेकिन कुछ तो कहना ही था। ‘माई, तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारी मुसीबत अपने गले में डाल लूं। ना माई ना। मैं इतना पागल नहीं। तुम जानो तुम्हारा काम। हाँ परेश को अध्यापक से जरूर मिला दूंगा। मिठाई बनाने वाला कारीगर भी कल से आ जायेगा। मैं यह चला।’ और वह चुपचाप उठ कर चला गया।
’अरे सुन तो।’—रामवती पुकारती रह गई, पर सोमू रुका नहीं। ‘अब शायद नहीं आयेंगे।’—रचना ने उदास स्वर में कहा। लेकिन अगली सुबह वह परेश को अध्यापक के पास ले जाने के लिए आगया,    बोला—‘परेश को मास्टरजी के पास छोड़ कर मैं मिठाई वाले कारीगर के साथ दुकान पर पहुँचता हूँ,  तुम दोनों भी आ जाओ।’
हलवाई ने समोसे और गुलाब जामुन बना दिए। कई ग्राहक मिठाई ले गए। दोपहर में सोमू परेश को दुकान पर छोड़ गया। रचना से बोला—‘अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी। हलवाई का हिसाब सप्ताह के अंत में करती  रहना।’                                 
‘ पर तू कहाँ जा रहा है?’—रामवती ने कहा। ‘मैंने तुझ से दुकान सँभालने को कहा और तू है कि डर कर भाग रहा है।’
               
‘हाँ मैं डरता हूँ तो बस अपने से। वैसे मैं कहीं जा नहीं रहा हूँ। बीच बीच में आकर देखता रहूँगा कि तुम अपने बेटे का नाम कितना आगे बढ़ा रही हो, और परेश की पढाई कैसी चल रही है।’—कह कर सोमू रामवती के पैरों पर झुक गया। उसका हाथ पकड़कर अपने सर पर रख लिया, फिर     तेजी से चला गया।
नरेश की दुकान अब अच्छी चल रही है। परेश को स्कूल में प्रवेश मिल गया है। लेकिन दुकान को हथियाने के इरादे से आया सोमू कहाँ है? वह रामवती के साथ छल करना चाहता था,पर जरूरत नहीं पड़ी।रामवती तो खुद उसे दुकान देना चाहती थी, फिर क्यों नहीं ली! बेटे की याद में तड़पती माँ से उसका सहारा छीनने की उलझन में सोमू रामवती और परेश के कितना निकट चला गया था, यह उसे पता ही नहीं चला।और जब मालूम हुआ तो...                                 ( समाप्त )