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Sunday, 24 January 2016

बाल कहानी : खजाने की खोज

                                                             



                                  खजाने की खोज

अजय और रमेश स्कूल से घर लौट रहे थे। कुछ दूर तक रास्ता नदी के साथ-साथ जाता था। धूप में नदी का पानी चमचम कर रहा था। दोनों रोज देखते थे कि एक टूटी-फूटी नाव तट पर खड़ी रहती है। वे आपस में पूछते थे कि आखिर वह नाव किसकी है।
एक दिन जल्दी छुट्टी हो गई। उस दिनों दोनों ने नाव की जांच करने की सोची। दोनों नाव के पास जाकर देखने लगे। नाव टेढ़ी खड़ी थी। उसमें थोड़ा पानी भरा था और ढेर सारे पत्ते पड़े थे। जोर की बदबू आ रही थी। तभी रमेश को नाव में कुछ चमकता नजर आया। वह एक सिक्का था। अजय के मना करने पर भी रमेश नाव में कूद गया और सिक्का उठा लाया। हंसकर बोला-‘‘खजाना!’’
सिक्का एक रुपए का था। अजय ने कहा-‘‘यह तो नया सिक्का है। खजाना कैसे हो सकता है।’’ रमेश बोला-‘‘हमारी किताब में खजाने की खोज की कहानी है। तुमने भी तो पढ़ी होगी।’’
‘‘हां, पर वह तो सिर्फ कहानी है। भला ऐसे खजाना कहां मिलता है।’’
तभी एक आदमी उधर से गुजरा। उसने कहा-‘‘बच्चों, यहां क्या कर रहे हो। यहां सांप निकलते हैं।’’
‘‘यह नाव किसकी है?’’ अजय ने पूछा।
‘‘उसी बूढ़े झूलन की है। जैसा वह बूढ़ा वैसी बूढ़ी उसकी नाव। उससे मिलना है क्या? वह कहानियां खूब सुनाता है। और उसने पास में एक झोंपड़ी की ओर इशारा कर दिया।
अजय और रमेश झोंपड़ी के पास जा पहुंचे। अंदर कोई जोर-जोर से खांस रहा था। दोनों झोंपड़ी में घुस गए। अंदर एक बूढ़ा बैठा खांस रहा था। अजय ने झट बढ़कर बूढ़े की कमर सहलानी शुरू कर दी, फिर वहां रखे घड़े से पानी लेकर उसे पिलाया। बूढ़े को कुछ आराम मिला। उसने धीमे स्वर में पूछा-‘‘बच्चो, तुम कौन हो, यहां कैसे आ गए?’’
‘‘ऐसे ही।’’ अजय ने कहा-‘‘आप दवाई क्यों नहीं लेते!’’
बूढ़ा हंस पड़ा। ‘‘कौन दे दवाई। मैं तो अकेला पड़ा रहता हूं।’’
रमेश ने पूछ लिया-‘‘बाबा, पहले तो आप नाव चलाते थे। क्या अपने किसी खजाने के बारे में सुना है?’’
बूढ़ा हंस पड़ा-‘‘बच्चों, मैंने खजाने की कहानियां तो सुनी हैं, पर ये तो सिर्फ कहानी होती हैं।’’ दोनों चलने लगे तो बूढ़े झूलन ने कहा-‘‘बच्चों फिर आना, खजाने की कहानी सुनाऊंगा।’’
रमेश के पिता एक वैध थे। उसने उन्हें झूलन के बारे में बताया और खांसी की दवा देने को कहा। उन्होंने कहा-‘‘मरीज को देखने बिना दवा देने का कोई फायदा नहीं।’’ लेकिन रमेश की जिद पर उन्होंने एक दवाई दे दी।
अगले दिन स्कूल से लौटते समय दोनों झूलन की झोंपड़ी के पास पहुंचे तो देखा एक आदमी झोंपड़ी से निकलकर भाग रहा है।
अजय बोला-‘‘जरूर कोई चोर है। इसे तो पकड़ना चाहिए। और दोनों चिल्लाने लगे-‘‘चोर-चोर।’’ तभी बूढ़ा झोंपड़ी से बाहर आया। बोला-‘‘जाने दो उसे।’’ लेकिन तब तक भागते हुए आदमी को सामने से आते दो लोगों ने पकड़ लिया और झोंपड़ी के पास ले गए।
‘‘बाबा, आपका चोर पकड़ा गया।’’ अजय बोला।
‘‘जाने दो इसे।’’ बूढ़ा बोला।
चोर को पकड़ने वाले लोग चकित थे। उन्होंने कहा-‘‘बाबा, चोर को छोड़ क्यों दें इसे तो पुलिस को सौंपना चाहिए। अगर ये बच्चे शोर न मचाते तो यह भाग जाता। आखिर यह क्या लेकर भागा था। तलाशी लेने पर उसकी जेब से सौ के कई नोट बरामद हुए।
बूढ़े ने कहा-‘‘यह मेरा बेटा है। अलग रहता है। कल मेरे एक पुराने मिलने वाले आए थे। वह पहले मेरी नाव में सवारी किया करते थे। ये रुपए उन्होंने ही दिए थे। तब मेरा बेटा यही था। आज इसने आकर मुझसे पैसे मांगे, पर मैंने मना कर दिया। इस पर यह रुपए लेकर भाग गया।’’
‘‘बेटा है तो क्या हुआ। इसने रुपए चुराए हैं। इसे सजा मिलनी चाहिए।’’ झूलन के बेटे को पकड़ने वालों ने कहा। ‘‘हां इसे पुलिस को देना चाहिए।’’ अजय और रमेशने भी वही बात कही।
‘‘यह आवारा है। अगर इसे पुलिस में दोगे तो इसके बच्चे भूखों मर जाएंगे। इसे जाने दो।’’ झूलन बोला।
‘‘बाबा, आपका बेटा आपका ध्यान नहीं रखता, फिर भी आप इसकी हिमायत कर रहे हैं।’’ अजय बोला। झुलन ने कुछ नहीं कहा। बस रोता रहा। आखिर उसके बेटे को छोड़ दिया गया। वह सिर झुकाए वहां से चला गया। रुपए झूलन को मिल गए।
झूलन के साथ अजय और रमेश झोंपड़ी में चले गए। रमेश ने झूलन को दवाई दे दी। ‘‘वह बोला-‘‘बेटा, मुझे कब तक दवा दोगे?
‘‘जब तक आपकी खांसी ठीक नहीं हो जाती। हम दोनों इसी रास्ते से रोज आया-जायाकरते हैं।’’ रमेश बोला।
कुछ देर बाद अजय और रमेश भी घर की ओर चल दिए।
‘‘मिल गया खजाना!’’ अजय ने कहा। वह धीरे-धीरे हंस रहा था।
‘‘हां, मुझे तो जरूर मिल गया है खजाना। तुम अपनी कहो।’’ कहकर रमेश खिलखिला उठा।
उसने तय कर लिया था कि जब तक झूलन को खांसी ठीक नहीं हो जाती, वह रोज आया करेगा झूलन के पास।
 

बाल कहानी : एक नया सितारा

                                                   
                 
                                                     एक नया सितारा

मुझे गर्मियों की रातें बहुत अच्छी लगती हैं। इसलिए कि उन दिनों स्कूलों की छुट्टियां होती हैं। सुबह मां की पुकार पर बिस्तर से उठना नहीं पड़ता। और रात में हम देर तक बाबा से कहानियां सुनते रह सकते थे।
जैसे ही दिन ढलता हम यानी मैं और मेरी बहन राधा पानी की बाल्टी लेकर छत पर चले जाते और पानी के छपके मारकर छत को ठंडा करने लगते। पानी सूख जाता तो छत पर बाबा के लिए चटाई बिछा दी जाती। गर्मी के मौसम में बाबा शीतलपाटी पर सोया करते थे। उनके पास ही दूसरी चटाई पर मैं और राधा बैठ जाते। हमें बाबा की प्रतीक्षा रहती। कुछ ही देर में पड़ोस से मुन्नू और रमन भी आ पहुंचते। उन्हें भी बाबा से कहानी सुनना पसंद था। बाबा के छत पर आते ही हम उनसे कहानी सुनाने की फरमाइश करते।
तब बाबा कहते-‘‘तुम लोग कहानी अधूरी छोड़कर नींद के पास चले जाते हो। अब नींद ही कहानी सुनाएगी तुम्हें।’’ कुछ देर तक हां-ना होती रहती ओर फिर बाबा कहानी सुनाने लगते। सुनते-सुनते मैं शीतलपाटी पर लेट जाता और आकाश की ओर ताकने लगता। आकाश तारों से भरा होता और फिर न जाने कब नींद आंखों में आ जाती।
रोज ही ऐसा होता था। लेकिन उस दिन वैसा कुछ नहीं हुआ। उस रात बाबा देर से आए और चुपचाप शीतलपाटी पर बैठ गए। लगा जैसे वह कहानी सुनाने की तैयारी कर रहे हैं। फिर वह लेटकर आकाश में देखने लगे। मैंने कहा-‘‘बाबा, कहानी सुनाओ न।’’
कुछ देर चुप रहने के बाद बाबा ने कहा-‘‘कहानी बाद में, आज पहले तारे गिनेंगे।’’ मैंने आकाश में देखा-हर कहीं तारे बिखरे थे। भला असंख्य तारों को कौन गिन सकता था। राधा बोली-‘‘शायद आपको कहानी याद नहीं है इसीलिए तारों की बात कर रहे हैं।’’
‘‘कहानियां तो अनेक याद हैं मुझे पर आज हम तारे गिनेंगे। इनमें एक नया तारा शामिल हुआ है। चलो शुरू करो।’’ फिर बाबा खुद तारे गिनने लगे- एक, दो, तीन... हम चारों ने भी तारों की गिनती शुरू कर दी-छत पर आवाजें गूंजने लगीं-एक दो, दस, सत्रह...! क्या यह भी कोई कहानी थी। तारे गिनते गिनते कब नींद आ गई, पता न चला।
सुबह आंख खुली तो अभी हल्का अंधेरा था। बाबा शीतलपाटी पर नहीं थे। मैंने ऊपर से आंगन में झांका तो बाबा खड़े दिखाई दिए, फिर वह बाहर दरवाजे की तरफ चले गए। अब वह मुझे दिखाई नहीं दे रहे थे। मैंने राधा को जगाया और फिर हम नीचे जा पहुंचे। मम्मी-पापा एक तरफ बैठे थे, पर बाबा दिखाई नहीं दे रहे थे। मैंने मां से पूछा-‘‘बाबा कहां हैं?’’
‘‘वह गांव गए हैं।’’ पापा ने बताया।
‘‘दो दिन बाद आएंगे।’’ मां बोलीं।
‘‘गांव क्यों गए हैं? वहां तो कोई नहीं है हमारा।’’
‘‘तुम्हारी एक दादी रहती थीं। वह बीमार थीं। इसीलिए गए हैं।’’
‘‘लेकिन हमारी दादी तो यहां हमारे साथ रहती थीं।’’ मैं पूछ रहा था। दो साल पहले दादी हमें छोड़ गई थीं। तब फिर गांव में यह कौन सी दादी थीं जिनके पास बाबा गए थे।
‘‘तुम्हारे दादा की बहन जयवंती जो गांव में ही रहती थीं।’’ पापा ने जयवंती दादी के बारे में कुछ बताया, जो मेरी समझ में नहीं आया। मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं था।
बाबा दो दिन बाद लौट आए। वह कुछ थके-थके लग रहे थे। शाम को मैंने और राधा ने रोज की तरह छत को पानी डालकर ठंडा किया, फिर बाबा के लिए शीतलपाटी बिछा दी। अब आकाश में तारे झिलमिल करने लगे थे। बाबा आकर शीतलपाटी पर बैठ गए। उन्होंने पूछा-‘‘आज कौन सी कहानी सुनोगे?’’
मैंने कहा-‘‘बाबा, आज हम सच्ची कहानी सुनेंगे?’’
‘‘यह सच्ची कहानी कैसी होती है?’’ उन्होंने पूछा।
‘‘जो सच होती है-वैसी कहानी सुनाइए हम जयवंती दादी की कहानी सुनेंगे।’’ हम दोनों ने एक साथ कहा।
बाबा कुछ देर चुप रहे फिर बोले-‘‘तो तुम्हारे पापा ने तुम्हें जयवंती दादी के बारे में बता दिया। हां, दो दिन पहले वह स्वर्ग चली गईं। मैं गांव गया तो सही पर उनका मुंह न देख सका।’’
मैंने कहा-‘‘बाबा, पापा को भी उनके बारे में ज्यादा पता नहीं है। आप ही बताइए उनके बारे में बाबा कुछ देर चुप बैठे रहे फिर कहने लगे-‘‘मैं और जयवंती कई वर्षों तक गांव में रहे। हमारा बचपन साथ-साथ बीता... हम देानों में बहुत प्रेम था। हम सदा साथ-साथ रहते थे। हमारे घर से नदी बस थोड़ी ही दूर थी हम अक्सर खेलते हुए नदी तट पर पहुंच जाते। पिता हम दोनों को वहां जाने से रोकते। कहते नदी में घडि़याल आ गया है। वह मनुष्यों को खा जाता है।
तब जयवंती ने कहा था-‘‘जब घडि़याल हमारी तरफ आएगा तो मैं भैया के सामने खड़ी हो जाऊंगी वह मुझे खाकर ही भैया के पास पहुंच सकेगा। और फिर रोते-रोते उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
मैंने कहा-‘‘जयवंती, रो क्यों रही हो। यहां हमारे घर में तो घडि़याल का कोई खतरा नहीं है।’’ यह सुनकर जयवंती हंस पड़ी। जब वह हंस रही थी तब भी उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। कहकर बाबा आंखें पोछने लगे।
मैंने पूछा-‘‘इसका मतलब जयवंती दादी आपसे बहुत प्यार करती थीं।
‘‘हां, वैसे ही जैसे तुम और राधा एकदूसरे से करते हो।’’ कहकर बाबा हंस पड़े। बोले-‘‘एक बार एक सांड जयवंती के पीछे पड़ गया। वह डरकर भागने लगी तो गिर पड़ी। मैं उसके साथ ही था। मैंने जयवंती को अपने पीछे छिपा लिया और सांड पर पत्थर फेंकने लगा। कुछ देर बाद वह मुड़कर चला गया। हम दोनों बच गए।’’
‘‘सांड आपको चोट भी पहुंचा सकता था।’’ मैंने कहा।
‘‘हां, यह तो था पर मैं जयवंती को खतरे से बचाने के लिए कुछ भी कर सकता था।’’
इसके बाद बहुत देर तक मैं और राधा जयवंती दादी के बारे में पूछते रहे और बाबा बताते रहे। बीच-बीच में वह पूछ लेते थे-‘‘जब नींद आए तो बता देना।’’
उस रात हम देर तक बाबा से उनकी बहन जयवंती दादी की बातें सुनते रहे पर नींद हमारे पास तक नहीं फटकी। बाबा ने हमें अपने गांव के बारे में बताया जहां मैं और राधा कभी नहीं गए थे। पर उनकी बातें सुनकर मुझे लग रहा था जैसे मैं उनके साथ उनके गांव की गलियों में घूम रहा हूं। मैंने कहा-‘‘बाबा, मैं आपके साथ जाकर गांव देखना चाहता हूं।’’
‘‘गांव तो जा सकते हैं पर तुम्हारी जयवंती दादी तो अब रही नहीं।’’ बाबा ने उदास स्वर में कहा और आंखें पोंछने लगे।
आकाश में सब तरफ चमकीले तारे बिखरे थे बाबा ने कहा था एक नया सितारा तारों के झुंड में शामिल हुआ है। मैं तारों को देखने लगा-क्या नया सितारा जयवंती दादी थीं। शायद हां, शायद... 

Wednesday, 2 December 2015

बाल कहानी : डबल ड्यूटी

                                                           
                                                              डबल ड्यूटी



लखमा तेजी से हाथ चला रही है. आज उसे जल्दी घर जाना है. कोई  मेहमान आने वाला हैं. लेकिन काम तो पूरा करना ही है. लखमा बाज़ार में तीन दुकानों में सफाई का काम करती है.  पति मजदूर है. दोनों के काम करने पर भी घर मुश्किल से चलता है. एक बेटा है अमर.  
दुकानों के बाहर बरामदे में पोंछा लगाते हुए लखमा की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो कुछ आगे एक दुकान के बाहर सफाई कर रहा था. लखमा देखती रही- बच्चा सात आठ साल का लग रहा था. वह उसे देखती रही- बच्चा कोशिश कर रहा था पर सफाई उससे हो नहीं रही थी. पानी की बाल्टी खिसकाते हुए वह फिसल गया और बाल्टी उलट गई. अब लखमा रुक न सकी. उसने बढ़ कर बच्चे को गोदी में उठा लिया और सिर सहलाते हुए बोली-‘’ तेरा नाम क्या है?’’
‘’ जानी.’’ उसने कहा.
‘’ तू यह काम क्यों कर रहा है? यह तेरे बस का नहीं है. ‘’ पूछने पर लखमा ने जान लिया कि जानी की माँ रेशमा बीमार है. वह भी लखमा की तरह दुकानों में सफाई का काम करती है. और उसने ही जानी को सफाई करने भेजा था. ऐसी स्थिति से कई बार लखमा को भी गुजरना पड़ा था. वह जानती थी कि ऐसे में काम हाथ से निकल जाता है. इसीलिए जानी की माँ ने उसे काम करने भेजा होगा.
लखमा ने जानी से कहा-‘’ बेटा , तू रहने दे. जा बच्चों के संग खेल. मैं अभी निपटा देती हूँ. ‘’ जानी हंसने लगा और सडक पर खेलते बच्चों के बीच चला गया. हालांकि लखमा को घर जाने की जल्दी थी पर उसे जानी का अधूरा काम पूरा करना ही था. उसने जल्दी जल्दी काम निपटाया फिर घर की तरफ चल दी . उसने देखा जानी सड़क पर दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा था, लखमा के होटों पर मुस्कान आ गई. उसे अच्छा लग रहा था. पर घर पहुँच कर मूड बिगड़ गया, उसे घर लौटने में देर हो गई थी. इसलिए मेहमान बिना मिले चला गया था.
अगली सुबह लखमा काम पर पहुंची तो जानी फिर वहाँ दिखाई दिया. इसका मतलब था कि जानी की माँ अभी बीमार थी. ‘ मुझे न जाने कितने दिन डबल ड्यूटी करनी होगी. ‘ वह यह सोच कर पछता रही थी कि उसने क्यों यह मुसीबत अपने ऊपर ले ली. वह जानी को सफाई करते देखती रही. वह ठीक तरह से काम कर नहीं पा रहा था. पर लखमा ने उसकी मदद नहीं की. लेकिन पोंछा लगाते हुए जब जानी दो बार फिसल गया तो लखमा रह न सकी. उसने जानी का हाथ पकड़ कर जोर से अपनी ओर खींचा और चिल्ला कर बोली –‘’ कल तुझे मना किया था न कि तू यह काम नहीं कर सकता. बता फिर क्यों आया ?’’
हाथ खींचने से जानी रो पड़ा. सुबकते हुए बोला-‘’ माँ ने भेजा है. उनकी तबीयत ठीक जो नहीं है.’’
‘’ चल मैं चलती हूँ तेरी माँ के पास, चाहे जो हो बस तुझे यहाँ नहीं आना है.’’ लखमा ने कहा और जानी के साथ उसकी माँ से मिलने चल दी. उसने जानी का काम अधूरा छोड़ दिया. वह कुछ सोच रही थी.
जानी की माँ छोटे से कमरे में जानी के साथ रहती थी. उसका पति दूसरे शहर में नौकरी करता था ओर कभी कभी ही यहाँ आया करता था. बीमारी में जानी की माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. लखमा जानी की माँ को देख कर समझ गई कि उसकी तबीयत जल्दी ठीक नहीं होगी. उसने कहा –‘’ जानी की माँ , तुम काम की चिंता मत करो. पर जानी को मत भेजा करो. अभी तो इसके पढने – खेलने के दिन हैं. ‘’ जानी की माँ रेशमा ने कोई जवाब नहीं दिया,
अगली सुबह लखमा ने देखा कि जानी फिर वहां खड़ा था. लखमा को देखकर वह दूर चला गया, शायद जानी लखमा से डर गया था. लखमा उस दुकान वाले के पास गई जहाँ जानी सफाई कर रहा था. उसने कहा-‘’ जानी की माँ तो बीमार है. शायद वह काफी समय तक काम करने नहीं आ सकेगी ‘’ दुकानवाले ने कहा – ‘’ तो तुम कर लो उसकी जगह . हमारी दो दुकानें और हैं.’’ लखमा खुश हो गई . उसे अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद हो गई. डबल ड्यूटी में मेहनत  ज्यादा थी पर पगार भी तो दुगनी मिलने वाली थी. हाथों के साथ दिमाग भी भाग रहा था. वह सोच रही थी कि अतिरिक्त पैसों से क्या कुछ हो सकेगा. अब जानी दुकान पर नहीं आता था. बस एक चबूतरे पर बैठा लखमा को देखता रहता था. लखमा सोचती थी जानी यहाँ क्या कर रहा है. रेशमा के पास क्यों नहीं बना रहता. मन हुआ कि जानी से रेशमा का हाल पूछे पर चुप रह गई.
लखमा ने महीने के आखिरी सप्ताह में रेशमा के बदले काम किया था. दुकानवाले ने पैसे दिए तो बोली-‘’ रेशमा के पैसे भी दे दो , उसे जरुरत होगी.’’ दुकानवाले ने कहा-‘’ रेशमा के पैसे उसी को दूंगा.’’ सुन कर लखमा सोच में पड़ गई. वह रेशमा के बारे में सोच रही थी. एक तो काम नहीं ऊपर से बीमारी का खर्च. पिछले काम के पैसे भी नहीं मिल रहे हैं. बाज़ार में जानी दिखा तो पूछा-‘’ यहाँ क्या कर रहा है ? माँ के पास क्यों नहीं टिकता?’’
‘’ माँ ने काम खोजने को कहा है. ‘’ – जानी बोला.
‘’ तुझे कौन काम देगा भला. ‘’ लखमा ने व्यंग से कहा. ‘’ चल मैं तेरी माँ से बात करती हूँ.’’ और उसके साथ रेशमा से मिलने चल दी. लखमा ने देखा कि रेशमा की तबीयत पहले से   ज्यादा ख़राब है. साफ़ था कि उसे तुरंत काफी पैसे चाहिएं ताकि ठीक से दवा - दारु और देख   भाल हो सके. लखमा ने कहा-‘’ तुम जानी को पढने भेजो न कि काम की तलाश में. ‘’
में क्या करूँ समझ में नहीं आता,’’ रेशमा ने उदास स्वर में कहा.
सब ठीक हो जाएगा . लेकिन सबसे पहले तुम मेरे साथ चलो. ‘’- कह कर लखमा ने रेशमा को अपने सहारे से बैठा दिया . पास रखी शीशी से बालों में तेल लगा कर सँवारने लगी. बोली – ‘’ अब तुझे मेरे साथ चलना है. ‘’’फिर बता दिया कि दुकानदार उसी को पैसे देगा फिर हाथ पकड़ कर दुकानदार के पास ले गई. कहा-‘’ रेशमा खुद अपने पैसे लेने आ गई है.’’
दुकानदार ने पैसे देते हुए कहा-‘’ तुम तो ऐसे सिफारिश कर रही हो जैसे तुम दोनों आपस में बहनें हों. लेकिन तुम दोनों के धर्म तो अलग अलग हैं , फिर बहनें कैसे हो सकती हो.’’ लखमा से पहले रेशमा बोल उठी-‘’ बहन होने के लिए  धर्म एक होना जरुरी नहीं.’’ और मुस्करा दी. लखमा सोच रही थी कि कहीं दुकानदार काम के बारे में उसकी बात रेशमा को न बता दे. तब तो रेशमा उसे लालची समझ बैठेगी. पर वैसा कुछ न हुआ. लखमा रेशमा को उसके घर ले आई. रास्ते भर वह कुछ सोचती रही थी. और फिर उसने फैसला कर लिया. रेशमा ने उसे अपनी बहन कहकर उसके मन को छू लिया था. लखमा को   अपनी छोटी बहन याद आ गई जो गाँव में रहती थी. लखमा काफी समय से बहन से मिल नहीं पाई थी.
अगली सुबह काम पर जाने से पहले वह रेशमा के पास जा पहुंची. कहा-‘’ रेशमा-‘’ आराम कर, तेरा काम मैं संभाल लूंगी. पर एक शर्त है. आज के बाद जानी को काम पर मत भेजना . उसे पढना चाहिए. ‘’
‘’ कौन पढ़ाएगा जानी को?’’ रेशमा ने उदास स्वर में कहा.
‘’मैं इसे मास्टरजी के पास ले जाऊँगी जो मेरे बेटे को पढ़ाते हैं. ‘’ –लखमा ने कहा. उसने आगे बताया कि मास्टरजी बच्चों को पढ़ाने के पैसे नहीं लेते . किताबें और कॉपी पेंसिल भी अपनी जेब से देते हैं. वे उन बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा पाते.
रेशमा को लखमा की बात माननी पड़ी. लखमा जानी को मास्टरजी के पास ले गई. और जब जानी पहले दिन मास्टरजी से पढ़ कर आया तो वह ख़ुशी से रो पड़ी. लखमा रेशमा के बदले काम करती रही.महीना पूरा हुआ तो लखमा ने रेशमा की दुकानों के पैसे लाकर रेशमा के हाथ में रख दिए. वह लेने को तैयार नहीं हुई. तब लखमा ने कहा-‘’ मान ले कल अगर मैं बीमार हो जाऊं तो क्या तू मेरी मदद नहीं करेगी?’’ इस बात ने रेशमा को चुप कर दिया. अब कहने को कुछ नहीं था, लखमा अपने घर की ओर चली तो मन पर बैठा बोझ उतर गया था.( समाप्त)