Showing posts with label कहानी बच्चों के लिए. Show all posts
Showing posts with label कहानी बच्चों के लिए. Show all posts

Saturday, 17 November 2018

दीवार --देवेन्द्र कुमार --कहानी बच्चों के लिए





दीवारदेवेन्द्र कुमार—कहानी बच्चों के लिए
===========

छोटे बच्चों को समझाया जाता है कि दीवार पर कुछ न लिखें, उसे गन्दा न करें,पर न जाने किसने दीवार पर दो आँखों का चित्र बना दिया था. और प्रिया ने कुछ ऐसा कर दिया जिसे देख कर घर की मालकिन प्रेमाजी बुरी तरह भड़क गई. आखिर ऐसा क्या कर दिया था बेचारी प्रिया ने !===    

 रेखा ने कॉल बेल बजा दी फिर दरवाज़ा खुलने का इन्तजार करती हुई इधर--उधर देखने लगी, दरवाजे के ठीक सामने वाली दीवार पर एक चित्र बना दिखाई दिया, किसी ने वहां नीली पेंसिल से दो आँखें बना दी थीं. तभी दरवाज़ा खुल गया और रेखा अंदर चली गई. रेखा वहां सफाई का काम करती है. काम करते हुए वही चित्र आँखों के सामने घूमता रहा. उसकी बेटी प्रिया दूसरी क्लास में पढ़ती है. वह बहुत अच्छी ड्राइंग बनाती है. रेखा सोच रही थी—‘क्या प्रिया भी ऐसी सुंदर ड्राइंग बना सकती है.’ घर की मालकिन का नाम प्रेमा है.
अगले दिन रविवार था. रेखा बेटी को भी अपने साथ ले आई. उसे आँखों के चित्र के पास  सीढ़ी पर बैठा दिया. कहा—“स्लेट पर चाक से ऐसा ही सुंदर चित्र बना.” फिर काम करने अंदर चली गई. कुछ देर बाद उसे प्रेमाजी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी. उसने बाहर निकल कर देखा प्रेमाजी प्रिया को डांट रही हैं-“अरे तूने तो सारी दीवार गन्दी कर दी.” प्रिया ने आँखों के चित्र के पास एक आदमी का चित्र बना दिया था. उसे एक बैसाखी के सहारे खड़ा दिखाया गया था. रेखा ने प्रिया के गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया और बोली—“ अरे यह क्या कर डाला. मैने तो स्लेट पर बनाने को कहा था, दीवार पर क्यों बना दिया.’’  बेटी रोते हुए बोली—‘‘ स्लेट पर मिट जाता है.’’
उसी समय अंदर से प्रेमा का बेटा अनुज बाहर निकल आया. वह स्कूल में ड्राइंग का अध्यापक है. उसने दीवार पर बने चित्रों को देखा--‘’अरे वाह ! सुंदर. किसने बनाए हैं ये चित्र.’’ तब तक प्रेमा अंदर चली गई थी. रेखा ने अनुज को पूरी बात बता दी. वह मुस्कराया और प्रिया का हाथ थाम कर अंदर ले गया. उसे बैठा कर उसके सामने ड्राइंग की शीट और रंगों वाली पेंसिलों का डिब्बा रख कर बोला—‘’ प्रिया, आराम से ड्राइंग बंनाओ.’’ कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया. रेखा भी काम में लग गई. प्रिया शीट पर ड्राइंग बनाने में जुट  गई.
                                  1
कुछ देर बाद अनुज ने आकर देखा--प्रिया ने ड्राइंग शीट पर बैसाखी वाले आदमी का चित्र बना दिया था. एकदम वैसा जैसा बाहर दीवार पर बनाया था. वह कुछ समझ न सका ...आखिर उसने रेखा को बुला कर पूछा तो बोली –“ पिछले साल इसके पिताजी का एक्सीडेंट हो गया था. उस कारण उनका एक पैर घुटने के नीचे काटना पड़ा था. प्रिया जब भी उन्हें बैसाखी के सहारे चलते हुए देखती है तो रोने लगती है. मैंने इसे कई बार समझाया है कि पिता का वैसा चित्र न बनाया करे, पर यह सुनती ही नहीं.’’ अनुज चुप रहा. वह वह कुछ सोच रहा था.
अगले दिन रेखा काम पर आई तो अनुज घर में मौजूद था. उसने रेखा को एक कागज़ दिया. उस पर एक पता लिखा था. उसने कहा—“ तुम अपने पति को लेकर इनके पास जाना. वहां जाकर तुम्हें सब पता चल जाएगा.” उस कागज पर एक संस्था का पता लिखा था, जहां अंगहीनों को कृत्रिम अंग लगाए जाते थे.
दो दिन बाद रेखा काम पर आई तो बहुत खुश लग रही थी, प्रेमा ने पूछा—“ क्या कोई खज़ाना मिल गया है जो इतनी खुश लग रही है.” पर रेखा ने कुछ न कहा. वह प्रेमा का स्वभाव  अच्छी तरह जानती थी. वैसे भी अनुज ने अभी किसी को भी कुछ बताने से मना किया था.
अगले दिन रेखा उस संस्था में गई तो अनुज भी वहां मौजूद था. डॉक्टर ने रेखा के पति की अच्छी तरह जांच की. तभी रेखा ने अनुज से कहा—“आपसे कुछ कहना है.” अनुज ने हंस कर कहा—“ तुम्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं है. इसका पूरा खर्च संस्था और मैं मिल कर उठाएंगे.’’  रेखा के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गई.
संस्था में रेखा अपने पति के साथ कई दिनों तक जाती रही. इस बीच वह काम पर  नहीं आ सकी. प्रेमा जी से उसने बीमार होने का बहाना बनाया था. और फिर एक रविवार के दिन वह बेटी के साथ काम पर आई तो उसके पोर पोर से हंसी फूट रही थी. अनुज ने प्रिया से कहा—“आज तुम्हें अपने पापा का नहीं, फूलों का चित्र बनाना है. ’’ और उसने सामने रखे गमले की ओर संकेत किया जिसमें फूल मुस्करा रहे थे. प्रिया हंस कर फूलों की ड्राइंग बनाने लगी. लेकिन अनुज को पता नहीं था कि फ्लैट में आने से पहले, उसने दीवार पर बने पिता के रेखा चित्र में कुछ परिवर्तन कर दिया था. अब चित्र में बैसाखी कहीं नज़र नहीं आ रही थी. उसमें दिखाई देता आदमी अपने दोनों पैरों पर खड़ा था.
बाद में जब प्रेमाजी ने दीवार को दोबारा पेंट करवाने की बात कही तो अनुज ने मना कर दिया. उसने कहा—“ मां, यह दीवार अब सदा ऐसे ही रहेगी. इन दो चित्रों के पास मैं भी ड्राइंग किया करूंगा.” बात प्रेमाजी की समझ में नहीं आ रही थी. पर जिन्हें समझना था वह जान चुके थे. यह पता नहीं चल सका कि दीवार पर दो आँखों का चित्र किसने बनाया था. ( समाप्त )                              
2

Thursday, 8 November 2018

मैं भैया जैसी --देवेन्द्र कुमार --कहानी बच्चों के लिए


===हर बहन अपने भाई जैसी बनना चाहती है, रचना भी तो यही चाहती थी, लेकिन उसका भाई ऐसा   
करने से मना करता है. क्यों किसलिए... 
=============================
      === आखिर क्या हुआ था रचना को? बाज़ार में इस बारे में कई लोगों ने पूछा पर रामदास ने हाथ हिला दिया और ठेले को तेजी से धकेलता हुआ आगे चला गया. ठेले पर उसकी बेटी रचना बैठी थी. उसके माथे से खून निकल रहा था. रामदास बेटी को जल्दी से जल्दी डाक्टर के पास पहुँचाना चाहता था.                 कुछ देर बाद रचना की मरहम--पट्टी करवा कर लौटा तो उसने तसल्ली से लोगों को बताया कि गिरने                    से रचना को चोट लग गई थी. रामदास सब्जी बाज़ार में शाम के समय मलाई-कुल्फी का ठेला लगाता था. सब्जी के खरीदार उसकी कुल्फी भी चाव से खाते थे.
        बाज़ार में धन्नी ताई अपने सही भाव और तौल के लिए मशहूर थी. वह रचना से बहुत प्यार करती थी. रचना को भी धन्नी ताई अपनी दादी जैसी लगती थी. उन्होंने रचना के सिर पर हाथ फिराते  हुए पूछा –‘’ क्या हुआ बिटिया?’’
         रचना ने कहा—‘’दादी, मैं भैया ...’’ लेकिन वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई . रामदास चिल्ला कर बोला—‘’क्या भैया भैया कर रही है.’’ और ठेले को तेजी से आगे बढ़ा दिया.  ठेले को घर के बाहर लगा    कर वह रचना को लगभग घसीटता हुआ अंदर ले गया. वह बहुत गुस्से में था. रचना की माँ शोभा नेकहा  —‘‘एक तो बच्ची को इतनी चोट लगी है, ऊपर से तुम उसे इस तरह डांट रहे हो.’’ 
        रामदास ने कहा-- ‘’तुम्हें पता भी है कि मामला क्या है. यह धन्नी को अविनाश के बारे में बताने को ही थी कि मैंने रोक दिया, वर्ना पूरे बाज़ार में बदनामी हो जाती.’’  रचना की चोट के बारे में रामदास ने झूठ बोला था. रचना को चोट गिरने से नहीं लगी थी. रचना के भाई अविनाश ने उस पर गिलास फेंका था, जो उसके माथे से जा टकराया. रचना का माथा लहूलुहान हो गया. अविनाश रचना से चार साल बडा है. दोनों भाई-बहन हमेशा प्यार से रहते आये हैं, लेकिन इधर कुछ समय से अविनाश रचना से चिढने लगा है. रामदास और शोभा बेटे के इस बदले हुए व्यवहार का कारण नहीं समझ पा रहे थे. रचना भी हैरान थी.
                                        1  
        कुछ समय पहले की घटना है. स्कूल में सीढियां उतरते समय अविनाश फिसल गया था. उससे पैरों में चोट आ गई था. दोनों पैरों पर प्लास्टर चढ़ने के कारण वह स्कूल नहीं जा पा रहा था. उसे दोस्तों के साथ मस्ती करना पसंद था,लेकिन अब तो घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था. वह बैठा हुआ देखता रहता था कि घर के सारे काम पहले की तरह चल रहे हैं, जैसे उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है. शायद वह घर में होते हुए भी नहीं है. पर ऐसा बिलकुल नहीं था. माँ, पिता और रचना उसका पूरा ख्याल रखते थे. पर अविनाश सबसे नाराज़ ही रहता था, खास कर रचना से.  वह सदा गुनगुनाती रहती थी. रचना का गला सुरीला था. स्कूल की म्यूजिक प्रतियोगिता में वह कई बार पुरस्कार भी जीत चुकी थी.
          इस बार भी रचना कार्यक्रम की तैयारी कर रही थी. इसलिए वह स्कूल से आने के बाद भी  अभ्यास करती रहती थी. लेकिन अविनाश माँ से कहता था -–‘’मेरे सिर में दर्द होता है इसकी आवाज़ से, इससे कहो कहीं और जाकर गाना-–बजाना करे.’’  माँ ने उसे बहुत समझाया पर वह किसी भी तरह मानने को तैयार नहीं हुआ. भाई के इस बेतुके व्यवहार से रचना का मन बहुत दुखी हुआ. उसने सोच लिया कि इस बार प्रतियोगिता में भाग नहीं लेगी.
          रात को सब सो गए लेकिन रचना को नींद नहीं आ रही थी. अचानक उसकी रुलाई फूट पड़ी. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अविनाश ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा था. माँ ने बेटी का रोना सुना तो पास आकर चुप कराने लगी. अविनाश भी जाग रहा था. रचना ने सिसकते हुए कहा—‘’भैया मुझसेइसी  लिए खफा है न कि उसे चोट लगी है और मैं भलीचंगी हूँ. लेकिन अब तो मैं भी भैया जैसी हो गई हूँ. क्या अब भी वह मुझ से नाराज रहेगा? ‘’ रचना के सिर में गिलास का कोना चुभने से गहरा घाव होगया था. डाक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी. वह भी स्कूल नहीं जा सकती थी.
       माँ ने पूछा-–‘’क्या तू धन्नी ताई से अविनाश की शिकायत करने वाली थी? तेरे बापू तो यही  बता रहे थे.’’
      ‘’ नहीं माँ, बापू ने गलत समझा. मैं कभी भैया की शिकायत नहीं कर सकती. मैं तो उनसे यही कह रही थी कि चोट लगने से मैं भी भैया जैसी हो गई. पर बापू पूरी बात सुने बिना ही गुस्सा हो गए.’’
       फिर सन्नाटा हो गया. रचना की माँ सो गई पर रचना नहीं सो सकी. वह उठ कर अविनाश की चारपाई के पास जा खड़ी हुई. उसे लगा अविनाश सो गया है, पर वह जाग रहा था. उसने सुना—रचना धीरे धीरे कह रहीं थी—‘’भैया, अब तो गुस्सा छोड़ दो. देखो ना, अब तो मैं भी तुम्हारे जैसी हो गई हूँ. तुम यही तो चाहते थे.’’
                                    2
      एकाएक अविनाश उठ कर बैठ गया. उसने रचना का हाथ पकड़ लिया. उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं. उसने रुंधे गले से कहा— ‘’नहीं रचना,कभी नहीं. मेरे जैसी कभी मत बनना. जैसी हो वैसी ही रहना. तुम्हें पता नहीं मैं कैसा हूँ. मैंने कितनी बार बापू की जेब से पैसे चुराए हैं. कई बार स्कूल से भाग कर दोस्तों के साथ फिल्म देखी है. उनके साथ सिगरेट पी है.’’ वह रो रहा था. रचना भाई से लिपट गई—‘’मेरा भैया बहुत अच्छा है. तुम कभी कोई गलत काम नहीं कर सकते.’’ दोनों की आँखों से आंसू बह रहे थे.
       उन दोनों की बातें माँ ने भी सुन ली थीं. वह आकर उन्हें प्यार करने लगी. अविनाश से कहा -–‘’बेटा,गलती सबसे होती है. तेरे बापू भी अपने बचपन की ऐसी ही बातें सुनाया करते हैं. जो हुआ उसे भूल जाओ, दोनों भाई-बहन प्यार से रहो.’’
         ‘’लेकिन माँ मैंने रचना के सिर पर गिलास फैंक कर मारा, इसे बहुत चोट लगी है.’’
          ‘’कहाँ है चोट! वह तो कब की ठीक हो गई.’’-- अँधेरे में रचना की हंसी सुनाई दी. माँ की हथेलियाँ दोनों के सिर सहला रही थीं.  ( समाप्त )                         
            
                                       

Friday, 26 October 2018

बताओ किसे दूं--देवेन्द्र कुमार--कहानी बच्चों के लिए




बताओ किसे दूं ?—देवेन्द्र कुमार—कहानी बच्चों के लिए
        
===उपहार,गिफ्ट प्रेजेंट –नाम कुछ भी हो,देने से पहले यह फैसला तो करना ही होगा कि वह किसे दिया जाये? वह कौन है जिसे उपहार दिया जा सकता है? यह निर्णय करना बहुत कठिन था. न कोई नाम सूझ रहा था और न इस समस्या का समाधान! और क्या उसे उपहार कहा भी जा सकता था

=== दादी पूजा कर रही थीं. अमिता बेसब्री से उनकी पूजा समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रही थी. उसने माँ से आइसक्रीम के लिए पैसे मांगे थे, पर उन्होंने मना कर दिया--’’हर समय आइसक्रीम!नहीं आज नही.कल पापा से कहना, वह दिलवा देंगे.’’
        अमिता झट दादी के पास जा पहुंची.जब मम्मी-पापा किसी चीज के लिए मना कर देते हैं तब दादी ही उसकी फरमाइश पूरी करती हैं. आज भी वह इसीलिए दादी के पास आई थी. आखिर उनकी पूजा समाप्त हुई. अमिता ने देखा कि दादी उठते हुए लड़खड़ा गईं. उसने झट उन्हें सहारा दिया तो वह गिरने से बच गईं, पर उनके मुंह से एक कराह निकल गई. अमिता को मालूम है कि दादी के घुटनों में दर्द रहता है. इसलिए उन्हें दर्द कम करने वाली दवा लेनी होती है.’’दादी,लगता है आज आपके घुटनों में ज्यादा दर्द है.’’—अमिता ने कहा. एक पल के लिए वह आइसक्रीम की बात भूल गई.
        दादी दर्द में भी मुस्करा दीं, उन्होंने अमिता का सिर सहला दिया. बोलीं—‘’दर्द तो रहता ही है. भगवान् की जैसी मर्जी.’’
       अमिता ने कहा—‘’दादी, आप भगवान् की इतनी पूजा करती हैं,फिर भी वह आपकी बात नहीं सुनते. ऐसा क्यों.’’                   
       ‘’कौन सी बात?’’
        ‘’आप अपने घुटनों के दर्द के बारे में भगवाव से क्यों नहीं कहतीं. तुम कहती हो न कि भगवान् सबकी इच्छा पूरी करते हैं.’’
         ‘’हाँ करते तो हैं.’’
                                     1
      ‘’ तो भगवान् से कहो कि आपके घुटनों का दर्द ठीक कर दें.’’                                      
      ‘’भगवान् से हर समय अपने लिए कुछ न कुछ मांगते रहना तो ठीक नहीं. वह मुझे लालची समझेंगे. ‘’--कहते हुए दादी  मुस्करा दीं.
      अमिता ने कहा—‘’दादी.तुम ठीक कह रही हो. देखो मैंने आज तक भगवान् से कुछ नहीं माँगा. मुझे जो कुछ चाहिए वह सब मम्मी –पापा या आप दिला देती हैं.’’
      दादी समझ गईं. उन्होंने कहा—‘’मेरी बिटिया को आइसक्रीम खानी है-क्यों?’’
      अमिता मुस्करा दी. दादी ने अमिता को पैसे देते हुए कहा—‘’जाओ आइसक्रीम ले लो.’’
       ‘’ दादी, आइसक्रीम बाद में, मुझे पहले आपके घुटनों के दर्द के बारे में भगवान् से बात करनी है. मैं उनसे कहूँगी कि आपके घुटनों का दर्द झटपट ठीक कर दें.’’--कह कर अमिता आँखें मूँद कर भगवान् की प्रतिमा के सामने बैठ गई. 
        दादी दिलचस्पी से अमिता को देखती रहीं. उनके मन में अमिता के लिए प्यार उमड़ रहा था. वह छोटी बच्ची अपनी दादी के घुटनों के दर्द को लेकर बहुत परेशान थी. कुछ देर तक अमिता होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाती रही फिर दादी की ओर देख कर मुस्करा दी.
        ‘’अमिता, तुमने भगवान् से क्या कहा.’’—उन्होंने पूछा.
        ‘’मैंने कहा—भगवान्,मेरी दादी के घुटनों का दर्द जल्दी से ठीक कर दो .’’
         ‘’फिर भगवान् ने तुम्हें क्या जवाब दिया?’’
        ‘’दादी,भगवान् की आवाज तो मुझे नहीं सुनाई दी,पर मुझे विश्वास है उन्होंने मेरी प्रार्थना जरूर सुनी होगी. अब देखना तुम्हारे घुटनों का दर्द जल्दी ही छूमंतर हो जायेगा.’’—अमिता ने हँसते हुए कहा.               
        उस रात सोने से पहले अमिता ने दादी से कई बार पूछा—‘’ आपके घुटनों का दर्द कैसा है? कुछ कम तो जरूर कर दिया होगा भगवान् ने.’’
        ‘’बेटी, तेरी प्रार्थना बेकार नहीं जाएगी. थोडा आराम तो है दर्द में.’’—दादी ने कहा.
       ‘’इसका मतलब यह हुआ कि भगवान् ने मेरी बात मान ली.’’ –-अमिता ने प्रसन्न स्वर में कहा.
                                       2
       ‘’हाँ बिटिया,भगवान तो सब की प्रार्थना सुनते हैं. अब आराम से सो जाओ.’’—दादी ने कहा. अमिता नींद की गोदी में गई तो जरूर लेकिन दादी से कहानी सुनने के बाद. यह रोज का नियम था.         अमिता की मम्मी जब रात में उससे सोने के लिए कहतीं तो वह झट दादी के पास दौड़ जाती. और दादी अपनी कहानी के झूले पर झुलाती हुई अमिता को सपनों की दुनिया में पहुंचा देतीं. अगली सुबह नींद खुलते ही अमिता दादी के पास दौड़ गई. दादी उस समय पूजा कर रही थीं. पर अमिता बैचैन थी. उसने पुकारा—‘’दादी,दादी! जल्दी से बताओ कि आपके घुटनों का दर्द अब कैसा है ?क्या दर्द कम नहीं हुआ है, तब तो मुझे भगवान् से आज फिर प्रार्थना करनी होगी कि आपके घुटनों का दर्द तुरंत छू मंतर कर दें.
        ‘’ बिटिया, दर्द तो अब भी हो रहा है.’’—दादी ने कहा और हंस पड़ीं.
         ‘’इसका मतलब है कि भगवान् ने मेरी बात नहीं मानी.’’—कहते हुए अमिता उदास हो गई.
         ‘’अमिता, कल रात भगवान् मेरे सपने में आये थे.’’
         ‘’क्या कहा भगवान् ने?’’—अमिता ने पूछा.
        ‘’उन्होंने कहा –‘’ तुम अमिता की प्यारी दादी हो.मुझे उसकी बात तो माननी ही होगी,पर एक समस्या है.’’
          अमिता ध्यान से दादी की बात सुन रही थी. ‘’कैसी समस्या दादी?’’
           दादी ने आगे कहा—‘’ भगवान् बोले--‘’ तुम्हारे घुटनों का दर्द तो मैं ठीक कर दूंगा, पर तुम्हारे दर्द को मैं अपने पास तो रख नहीं सकता. तुम्हारा दर्द किसी और को देना होगा. बताओ किसे दूं तुम्हारे घुटनों का दर्द?’’   
           अमिता बोली—‘’ इसमें क्या मुश्किल है. अगली बार जब भगवान् आपके सपने में आयें तो आप कह देना कि वह आपके घुटनों का दर्द किसी को भी दे दें.’’
          ‘’बिटिया, तुम जो नाम बताओगी वही मैं भगवान् से कह दूँगी.’’
          ‘’अमिता सोचती रही पर उसे कोई नाम नहीं सूझा. बोली—‘’ दादी, इतनी बड़ी दुनिया है,भगवान् आपके घुटनों का दर्द किसी को भी दे सकते हैं. बस आपका दर्द ठीक होना चाहिए.’’
           ‘’कोई नाम तो बताओ?’’—दादी ने कहा.
                                   3
         काफी समय इसी उलझन में बीत गया.दादी ने अमिता का सिर सहलाते हुए कहा—‘’बिटिया, दर्द या बीमारी कोई मिठाई नहीं जो भगवान् किसी को भी दे दें. वह तो सब को अच्छी अच्छी चीजें देते हैं. हमें ख़ुशी बांटनी चाहिए,दर्द या दुःख नहीं.’’
        ‘’ दादी,इस शहर में हम बहुत से लोगों को नहीं जानते. भगवान् उनमें से किसी को भी आपके घुटनों का दर्द दे सकते हैं.’’
         ‘’बिटिया,क्या यह बात ठीक होगी कि मेरे पैरों का दर्द किसी अनजान आदमी के पैरों में चला जाये?’’—दादी पूछ रही थीं.
        ‘’नहीं यह अच्छा तो नहीं होगा.पर फिर आपके घुटनों का दर्द कैसे ठीक होगा? ‘’
         दादी ने अमिता को गोद में भर लिया. उसके बाल सहलाती हुई बोलीं—‘’हम किसी के जन्मदिन पर बढ़िया उपहार देते हैं. लेकिन क्या दर्द भी उपहार में देना चाहिए?’’
         ‘’नहीं .’’—अमिता बोली.           
         ‘’बस इसीलिए मैंने भगवान् से दिया कि वह मेरा दर्द किसी को न दें. क्योंकि मेरी प्यारी अमिता यह एकदम अच्छा नहीं लगेगा. और फिर मेरी नींद टूट गई.’’ कह कर दादी हंसने लगीं.
           ‘फिर?’’ अमिता ने जानना चाहा.
            ‘’फिर यही कि समय पर दवा लूं और परहेज करूं.’’
             ‘’और आज आपने दवा नहीं ली.’’—कहती हुई अमिता दादी की दवा लेने दौड़ गई. दादी धीरे धीरे हंस रही थीं,  ( समाप्त )