Tuesday, 14 July 2020

परी से मिलना है --कहानी--देवेन्द्र कुमार


     परी से मिलना हैकहानी—देवेन्द्र कुमार     
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  ग्रेटर नॉएडा के  परी चौक के बारे में बहुत लोग जानते हैं।वहाँ गोल चक्कर में सोने के रंग वाली अनेक परियां पंख फैलाये कमल पुष्पों में खड़ी दिखाई गई हैं, यह कहानी उन्हीं की है।  
  दादी माँ रजत को हर रात कहानी सुना कर नींद की गोदी में ले जाती हैं, यह क्रम बहुत दिनों से चल रहा था। लेकिन इधर एक समस्या आ खड़ी हुई है। रजत ने जिद ठान ली है कि उसे परियों को देखना  है, उनसे बातें करनी हैं।भला ऐसा कैसे हो सकता है! परियों की कहानियां तो न जाने कब से कही सुनी जा रही  हैं,पर किसी ने परियों को अपनी आँखों से देखने या उनसे बातें करने का दावा तो कभी नहीं किया।
  लेकिन रजत की जिद के लिए दादी अपनी सुनाई परी कथा को ही दोषी मानती हैं।असल में एक रात उन्होंने ऐसी परियों की कहानी सुनाई थी, जो  किसी कारण से  दिन निकलने से पहले परी लोक वापस नहीं लौट सकी थीं। परी लोक के नियम के अनुसार धरती पर उतरने वाली परियों को दिन निकलने से पहले हर हाल में परी लोक में वापस लौटना होता है, नहीं तो उनकी उड़ने की शक्ति समाप्त हो जाती है। और फिर उन्हें सदा के लिए धरती पर ही रहना पड़ता है।  
  रजत ने पूछा कि वह कौन सा कारण था तो दादी ने कहा-‘ जब परियां  परी लोक वापस जाने लगीं तो उन्हें किसी बच्ची के रोने की आवाज़ सुनाई दी, बस वे रोने वाली बच्ची की खोज में निकल पडीं और इतने में दिन निकल आया, उनकी उड़ने की शक्ति समाप्त हो गई। वे परी लोक वापस नहीं लौट सकीं।’   
  रजत ने कहा था –‘जब उन परियों को अब सदा के लिए हमारी धरती पर ही रह्ना है तब तो वे कहीं न कहीं जरूर मिल सकती है।’      
  ‘ शायद कहीं मिल जाएँ वे परियां। उन्हें खोजना होगा।’
  ‘कहाँ,किस जगह?’रजत ने पूछा तो दादी ने आँखें मूँद लीं जैसे सो गई हों।क्योंकि उनके पास रजत के   इस प्रश्न का  कोई उत्तर नहीं था।लेकिन रजत ने ठान लिया था कि चाहे जैसे हो,वह धरती पर रहने को अभिशप्त परियों को खोज कर ही रहेगा।            
     सुबह रजत ने दादी से फिर पूछा कि  परियों को कहाँ खोजना चाहिए? उस दिन रविवार था, रजत के पापा रमेश चाय पी रहे थे। उन्होंने रजत की बात सुनी तो  हंस कर कहा-‘मुझे मालूम है कि परियां कहाँ मिल सकती हैं।  मैं तो ऑफिस जाते समय  रोज ही उस जगह से गुजरता हूँ।’ फिर उन्होंने परी चौक के बारे में रजत को  बताया।सुनते ही रजत ख़ुशी से उछल पड़ा ! उसने कहा–‘ पापा,प्लीज मैं तो आज ही उन परियों से मिलना चाहता हूँ।’      
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     रमेश उसे स्कूटर पर बैठा कर परी चौक के गोल चक्कर पर ले गए। रजत अपलक मुग्ध भाव से उन चमचम करती परी-प्रतिमाओं को देखता रह गया। उनके पंख इस तरह फैले हुए थे जैसे वे उड़ने को  तैयार हों। ‘पर ये तो परियों की प्रतिमाएं हैं, मैं तो सचमुच की परियों से मिलना चाहता हूँ। रजत ने कहा।
  ‘ उसके लिए तो तुम्हें रात भर जाग कर परियों के आने की प्रतीक्षा करनी होगी।क्योंकि वे रात  के अँधेरे में ही अपने छिपने की जगह से बाहर निकल कर इधर उधर घूमती हैं।’
   ‘क्या वे रात में हमारे घर में भी आ सकती हैं !’
   ‘जरूर आ सकती हैं।’-रमेश ने कहा। ‘हो सकता है परियां सचमुच कभी हमारे घर आई हों।’
   ‘और हम उन्हें न देख सके हों।’—रजत ने निराश स्वर में कहा।    
    ‘हाँ।क्योंकि परियां हर किसी को अपने जादू से गहरी नींद में सुला देती हैं। इसलिए कोई भी उन्हें   नहीं देख सकता।’
    ‘दिन के उजाले में परियां कहाँ छिप कर रहती हैं?’-रजत ने जानना चाहा।
     रमेश को रजत की उत्कंठा में परी कथा जैसा आनंद आ रहा था।जैसे वह खुद भी कहानी के एक पात्र बन गए थे। उन्होंने इधर उधर देखा तो पास  के फुटपाथ पर दो बूढी औरतें  और एक बच्ची बैठी  दिखाई दीं।रमेश ने उनकी ओर संकेत करते हुए कहा -‘हम वहां चलें तो  शायद कुछ पता चल सके।हो सकता है परियां इनमें छिप कर दिन बिताती हों।’फिर रजत और रमेश उन औरतों के पास जा पहुंचे।
रजत ने लड़की से पूछा-‘क्या तुम परी हो?’
 ‘मेरा नाम तो रमा है।लड़की ने कहा और मुस्करा दी।पास बैठी दोनों औरतों ने कहा-‘हम परी चौक पर बैठती हैं इसलिए तुम हमें परियां कह सकते हो।’ पता चला एक का नाम झुमिया और दूसरी नंदा थी। 
झुमिया भुट्टे भून रही थी और नंदा सरकंडों की टोकरी बनाने में जुटी थी।रमा रंगीन गेंदें उछाल कर लपक रही थी।’
  रजत ने पूछा –‘तुम्हारा घर कहाँ है?’
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  ‘बेटा घर तो बड़े लोगों के होते हैं,हमारी तो  छोटी सी  झोंपड़ी है-वह भी बिना दरवाजे की।’नंदा बोली।
 ‘ क्या मैं उसे देख सकता हूँ-‘ रजत ने कहा तो झुमिया दोनों को झोंपड़ी पर ले गई। रजत ने देखा कि सचमुच झोंपड़ी में दरवाज़ा नहीं था। अंदर तीन लोग बैठे भोजन कर रहे थे। झुमिया ने छींके पर रखा डिब्बा उतार कर एक एक रोटी तीनों की थालियों में रख दीं।बोली-‘ पेट भर खाओ।’रजत ने देखा डिब्बे में बहुत सारी रोटियां थीं।रमेश और रजत वापस आये तो नंदा ने पूछा –‘देख लिया हमारा बिना दरवाज़े वाला झोंपड़ा।’
   ‘वे तीनों कौन हैं जो खाना खा रहे थे।’-रमेश ने पूछा।
    ‘हमारे बेटे हैं, और वे तीन ही क्यों और भी कई हैं।’-झुमिया बोली।
    नंदा ने बताया-‘एक दिन हलकी बारिश हो रही थी,तभी तीन लोग भुट्टे लेने आये।भुट्टे खाते हुए वे आपस में बातें कर रहे थे।एक बोला –‘ आज तो भुट्टे  से पेट भरना होगा,’ दूसरे ने कहा-‘ढाबे वाला पिछला बकाया चुकाने पर ही खाना देगा।’ तीसरा बोला-‘पता नहीं मालिक से पगार कब मिलेगी।’ मैं उनकी मुश्किल समझ कर तीनों को अपनी झोंपड़ी पर ले गई।मैंने खाना बनाकर तीनों को खिलाया।और कहा-‘माँ के होते हुए उसके बेटे भूखे नहीं रह सकते।’ मैंने उनसे कह दिया कि  मैं उनके लिए रोज रोटी बना कर छींके पर रख दिया करूंगी। वे जब चाहें आकर खा सकते हैं। अगर उनका कोई साथी मुश्किल में हो तो वे उसे भी साथ ला सकते हैं।
   झुमिया ने कहा कि वे तीनों पास ही मजदूरी करते हैं। एक बोला-‘ऐसे भी कोई खाना खिलाता है!’ मैंने कहा –‘हाँ माँ अपने बेटों को भूखा नहीं रहने देगी।’ समझाने पर वे मान गए। उन तीनों के अलावा  उनके और भी कई साथी मेरा पकाया खाना खाते हैं। कई जनों ने अपने खाने के पैसे देने चाहे पर मैंने उनसे पैसे कभी नहीं लिए। लेकिन वे जब चाहें आटा ले आते हैं। मैं रोज इतनी रोटियां बना  कर रखती हूँ कि आठ-दस जाने पेट भर सकें।’रजत ने देखा था कि डिब्बे में बहुत सारी’ रोटियां थीं। ‘कुछ हमारा और कुछ उनका बस इस तरह माँ बेटे मिल कर चला रहे हैं।’
  रजत सोच रहा था –बिना पैसे लिए इतने लोगों को खाना कोई परी ही खिला सकती है।यह तो परी का जादू है।उसने रमेश से कहा-‘पापा,परसों मेरा जन्म दिन है,क्या मैं इन्हें बुला सकता हूँ?’उसे जवाब न देकर रमेश ने झुमिया और नंदा से कहा-परसों मेरे बेटे का जन्मदिन है। यह आप तीनों को बुलाना चाहता है।’
  दोनों ने रजत के सिर पर हाथ रखते हुए कहा-‘हम जरूर आयेंगे।आप अपना पता बता दें।’
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 ‘मैं खुद आकर  आपको ले जाऊँगा।’-रमेश ने कहा।
 ‘नहीं उसकी जरूरत नहीं है। हम खुद आयेंगे,’- नंदा बोली।
 इसके बाद रमेश और रजत वापस लौट आये। रमेश को लग रहा था कि उसने परियों को खोज लिया है।
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  रजत के जन्मदिन की शाम ==–पूरा कमरा रंग बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था।मेहमान आ चुके थे लेकिन रजत को नंदा,झुमिया और रमा की प्रतीक्षा थी। और फिर वे तीनों आ गईं।नंदा और झुमिया साफ़ सुथरे वस्त्रों में थीं, रमा रंग बिरंगे परिधान में बहुत सुंदर लग रही थी।नंदा और झुमिया ने दो थैलियाँ रजत को थमा दीं, उनमें दो सुंदर गुड़ियां थीं।रजत को लगा जैसे खिलौना गुड़ियाँ मुस्कराई हों और होंठ हिले हों। यह उसकी कल्पना थी या सच,पता नहीं। उसने रमा से पूछा-‘ और तुम मेरे लिए क्या गिफ्ट लाई हो?’
 ‘ मैं सब मेहमानों को परी नृत्य दिखाऊंगी।’-रमा ने कहा और मुस्करा दी।
   ‘परी नृत्य! क्या तुमने परियों को नाचते हुए देखा है?’-रजत के स्वर में आश्चर्य बोल्र रहा  था।
  नंदा ने कहा-‘ एक दिन हमारे पास वाले पार्क में कुछ लड़कियां नाच रही थीं।उन्हीं को देख कर सीखा है रमा ने।’
  और फिर रमा नाचने लगी।उसके खुले केश जैसे हवा में उड़ रहे थे। कमरे में मधुर संगीत तैर रहा था। सब ताली बजा रहे थे। अद्भुत था रमा का परी नृत्य। फिर झुमिया और नंदा ने कहा-अब हमें आज्ञा दीजिए। हमें एक और समारोह में जाना है।’ बहुत कहने पर भी उन तीनों ने कुछ नहीं खाया और चली गईं। सारे मेहमान देर तक  रमा के परी नृत्य की चर्चा करते रहे।
  समारोह समाप्त हुआ। मेहमान चले गए।रजत ने दोनों गुड़ियाँ अपने पलंग के पास वाली मेज पर रख दीं और एकटक देखने लगा-क्या गुड़ियों के होंठ हिल रहे थे! और फिर कानों में एक मधुर स्वर गूँज उठा।’तुम परियों से मिलना चाहते हो न।’
 ‘हाँ।’-रजत ने अलसाए स्वर में कहा और नींद ने उसे अपनी गोद में  छिपा लिया।(समाप्त)
                               

Monday, 13 July 2020

तो फिर सच ही कहूं-कहानी-देवेन्द्र कुमार


                               
                                     तो फिर सच ही कहूँ—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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    फ़्लैट के बंद दरवाजे के बाहर एक पौधे का गमला रखा है।लीला रोज सुबह गमले में पानी डालती है।उस समय मन में आता है कि न जाने इस फ़्लैट में कौन रहता होगा। इस समय वे कहाँ होंगे। इसके बाद  सामने वाले फ़्लैट के  बाहर रखे पौधों की बारी आती है। लीला इस फ़्लैट में साफ़-सफाई का काम करती है।उसकी मालकिन हैं प्रभा मैडम। वह कई बार कह चुकी हैं-‘तुम मेरे घर में काम करती हो या उस  बंद फ़्लैट में! तुम्हें पगार मैं देती हूँ या कोई और। तुम सबसे पहले बंद फ़्लैट वाले पौधे में पानी डालती हो,उसके बाद हमारे पौधों की बारी आती है। ऐसा क्यों!’
  प्रभा की बात गलत नहीं है।लीला इतना ही कह पाती है-माफ़ करना मैडम जी, मुझे लगता है कि कहीं वह पौधा सूख न जाए,बस
  ‘वह पौधा हरा भरा रहे या सूख जाए, इसकी चिंता तुम्हें क्यों होनी चाहिए।आगे से ऐसा न हो इसका ध्यान रखना।’-प्रभा कहती है। इसके लिए लीला को  कई बार माफ़ी  मांगनी पडी है। उसे लगता है कि कहीं उस अनाथ पौधे के कारण उसका काम न छूट जाए।इसलिए उसने पार्क के माली की  मदद ली। माली उस गमले को  नीचे ले गया। काम पर आते जाते  समय लीला उस पौधे के बारे में पूछना नहीं भूलती। माली मुस्करा कर कहता है –‘लगता है उस पौधे का तुम से कोई ख़ास रिश्ता है।’ क्या कहे लीला।वह तो बस इतना ही चाहती है कि वह पौधा सूख न जाए,क्योंकि इसका ध्यान रखने वाला कोई है नहीं। उस फ़्लैट का बंद दरवाजा कब खुलेगा इस बारे में लीला कुछ नहीं जानती।
  अब प्रभा को लीला से कोई शिकायत नहीं, सब ठीक चल रहा था,पर एक सुबह कुछ हुआ। लीला  पौधों में पानी डाल रही थी तो उसे एक चीख सुनाई दी।प्रभा का फ़्लैट चौथी मंजिल पर है।लीला ने झाँक कर देखा तो चौंक गई।जमीन पर एक बच्चा पड़ा दिखाई दिया। वह तुरंत नीचे उतर गई,बच्चे को देखा, उसके माथे से खून निकल रहा था।उसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना जरूरी था। लड़का सात आठ साल का रहा   होगा।
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  लीला ने एक बार ऊपर की ओर देखा, मन में आया कि बच्चे की चोट के बारे में प्रभा मैडम को खबर कर दे, फिर उसे मरहम पट्टी  के लिए ले जाए। उसने इधर उधर देखा पर कहीं कोई नज़र नहीं आया। बच्चे को इस हालत में अकेला छोड़ कर प्रभा के पास कैसे जाती। उसने कुछ सोचा और बच्चे को गोद में भर कर बाहर की ओर चल पड़ी। उसने सोच लिया था कि इस तरह बिना बताये चले  जाने के लिए वह  प्रभा से बाद में माफ़ी मांग लेगी।
   लीला घायल बच्चे को गोद में उठाये हुए सोसाइटी के गेट पर पहुंची तो गार्ड वचन पास चला आया और बोला-‘अरे,इसे चोट कैसे लगी?यह तो’ लीला ने कहा-‘ वह सब बाद में,अभी तो तुरंत इसकी चोट का इलाज जरूरी है।’
  वचन ने कहा-‘ इतनी सुबह तो डाक्टर मिलेगा नहीं,पास में कम्पाउण्डर शीतल रहता है।आओ उसके घर  ले चलें।’ रास्ते में वचन ने बताया कि बच्चे का नाम आशु है और यह राज मिस्त्री जैराम का बेटा है जो अपनी सोसाइटी के एक फ़्लैट में काम कर रहा है।कुछ देर पहले ही तो यह जैराम को पूछता हुआ मेरे पास आया था और मैंने इसे जैराम के पास भेज दिया था,फिर इसे यह चोट  कैसे लग गई!’ लीला ने बताया कि कैसे उसने चीख सुन कर नीचे देखा तो यह जमीन पर गिरा दिखाई दिया था।
  आशु की मरहम पट्टी करवाने के बाद वचन ने कहा-‘ मैं जैराम का घर जानता हूँ।’ और वह लीला को वहां ले गया।जैराम की पत्नी लता बिस्तर पर लेटी हुई थी । बेटे को वचन की बांहों में देख कर वह झटके से उठी तो डगमगा गई,लीला ने बढ़ कर उसे सहारा देकर लिटा दिया और बोली-‘अरे, तुम्हें तो तेज ज्वर है।’ जवाब देने की जगह लता ने हडबडा कर पूछा-‘आशु को चोट कैसे लगी!’
  वचन ने आशु को संभाल कर लता के पास लिटा दिया और कहा-‘ घबराओ मत, तुम्हारा बेटा एक दम ठीक है,बस दो दिन पट्टी करवानी होगी।’लीला ने धीरे से कहा-‘ आशु की माँ की तबीयत ठीक नहीं है।’
  इतने में जैराम भी आ पहुंचा। उसे सोसाइटी में किसी से आशु के बारे में पता चल गया था।
  लता जैराम से बोली-‘ दवा ख़त्म हो गई है, सुबह की खुराक भी नहीं ले सकी।इसीलिए मैंने आशु को  तुम्हारे पास भेजा था कि तुरंत दवा ले आओ।पर यह तुमसे मिलने से पहले ही चोट खा बैठा।’
  जैराम ने वचन से कहा-‘भैया,तुम्हारा उपकार रहेगा मुझ पर।’
    इस पर वचन ने लीला की ओर इशारा करते हुए कहा-‘ आशु को लीला ही मेरे पास लेकर आई थी। अगर इसने आशु को न  देखा होता तो परेशानी बढ़ सकती थी।
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  ‘जैराम भैया,आशु की चिंता छोड़ो,अभी तो इसकी माँ की दवा लेकर आओ।इनकी तबियत ठीक नहीं है,इन्हें दवा और देखभाल-दोनों की जरुरत है।’लीला बोली।
  जैराम ने कहा-‘लता की देखभाल के लिए मैंने इनकी छोटी बहन रश्मि को बुलाया है।वह आज शाम तक आ जाएगी। दिन के समय तो मैं घर में होता नहीं।’
  तभी वचन ने लीला से कहा-‘ मैं चलता हूँ, मेरी ड्यूटी गेट पर होती है इसलिए ज्यादा देर तक गायब नहीं रह सकता। तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? कितनी देर में आओगी।’
  लीला ने कहा-‘ मुझे शायद दिन में रुकना पड़ेगा,क्योंकि और तो कोई है नहीं इनकी देख भाल करने के लिए।आशु की मौसी तो शाम को ही आने वाली है। क्या तुम प्रभा मैडम को इस बारे में बता दोगे।क्योंकि    मैं सुबह उन्हें नहीं बता सकी थी।’ वचन दरवाजे से निकला, तभी लीला ने पुकारा-‘वचन,जरा रुकना। मैं सोचती हूँ कि मैडम को आशु की चोट वाली बात बताना सही नहीं होगा।तुम कह देना कि एकाएक मेरी तबियत खराब होने से मुझे बिना बताये चले जाना पड़ा।’ वचन चला गया. इसके बाद लीला काम में लग गई.    
    घर में सफाई के बाद लीला ने गैस ऑन की और दूध गरम करके आशु को पिला दिया. सब्जी काट कर चढ़ा दी और आटा गूंध कर रोटी  बनाने लगी। फिर जैराम के लिए भोजन पैक कर दिया।जैराम दवा लेकर आया तो लीला ने भोजन का डिब्बा उसे देकर कहा-‘भैया, तुम आराम से काम पर जाओ। मैं लता दीदी को दवा देकर खाना खिला दूँगी।‘ जैराम अचरज से देखता रह गया।लता ने लीला से कहा-‘बहन, हमारे  कारण तुम्हें बहुत तकलीफ हुई।’
  लीला ने हंस कर कहा –‘बहन कह कर गैर की तरह क्यों बोल रही हो।अब से तुम दो बहनों में मैं तीसरी भी शामिल हो गई हूँ।’और लता का सर सहलाने लगी।आशु अब ठीक लग रहा था। जब जैराम काम से लौटा तो रात का खाना बन चुका था।पर रश्मि अभी तक नहीं आई थी।लीला ने कहा-‘मैं सुबह काम पर जाते समय मिलती जाउंगी।’और वह अपने घर चली गई।सोच रही थी कि कल प्रभा मैडम से कैसे निपटेगी।पर मन में ख़ुशी थी कि आशु की चोट में आराम था और लता का ज्वर भी कुछ कम हो गया था।आज का दिन अच्छा बीता था।
  अगली सुबह लता से मिलने गई तो पता चला कि उसकी बहन रश्मि अभी तक नहीं आई थी।लीला ने कहा-‘तो चिंता क्यों?मैंने अपनी तबियत ठीक न होने का सन्देश प्रभा मैडम को कल ही भिजवा दिया था।ठीक होने में दो तीन दिन तो लग ही जाते हैं।’और मुस्कराने लगी,फिर जैराम से कहा-‘तुम बेफिक्र होकर काम पर जाओ।आज लता दीदी की तबियत पहले से ठीक लग रही है।मैं संभाल लूंगी।’ फिर साफ़ सफाई और कपडे बदलने में लता की मदद करने के बाद खाना बनाया और लता को खिला कर दवा दे दी।शाम तक लता की तबियत काफी सुधर गई।और फिर रश्मि भी आ गई। लता ने उसे लीला का परिचय दिया तो दोनों एक दूसरे से लिपट गई।
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     अगली सुबह वह प्रभा के पास गई तो उसने व्यंग्य से पूछा- ऐसी क्या तबियत बिगड़ गई थी जो मुझे बताने का भी ध्यान नहीं आया।मैं देख रही हूँ कि इन दिनों तुम कुछ ज्यादा ही लापरवाह हो गई हो।खैर,मेरी तरफ से तुम्हारी पूरी छुट्टी, अब जी भर के आराम करना। और हाँ दो दिन बाद आकर  अपनी पगार ले जाना।’
     लीला ने कहा-‘क्या मुझे बीमार होने का भी अधिकार नहीं है!वैसे सच कहूँ तो मैं बीमार नहीं थी। हाँ बीमार की देखभाल कर रही थी। मेरे लिए वह ज्यादा जरूरी था।’ कह कर वह नीचे उतर आई। माली से उस अनाथ पौधे के बारे में पूछा तो उसने गमलों की ओर संकेत कर दिया। हरियाली के बीच रंग बिरंगे फूल मुस्करा रहे थे। अब कोई पौधा अनाथ नहीं था।
    लीला को देख कर लता चौंक गई।पूछा –‘इतनी जल्दी क्यों लौट आईं।’
    ‘तुम्हारा हालचाल पूछने  और रश्मि की बनाई  चाय का आनंद लेने।’फिर लता के पीछे बैठ कर उसके केश संवारने लगी।(समाप्त)