Sunday, 15 March 2020

मेरी माँ -कहानी-देवेन्द्र कुमार


मेरी माँ--कहानी--देवेन्द्र कुमार
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  मुझे बाज़ार जाने के लिए रिक्शा की तलाश थी। आसपास कोई रिक्शावाला दिखाई नहीं दे रहा था।   मैं इधर उधर देखता खड़ा था,तभी एक रिक्शा मेरी ओर आती नजर आई। रिक्शा चालक को देख कर मैं चौंक गया। वह तो कोई बच्चा लगा मुझे। वह रिक्शा चला नहीं पा रहा था। आखिर एक बच्चे को इस छोटी उम्र में रिक्शा खींचने की क्या जरूरत आ पड़ी थी। वह मुझसे रिक्शा में बैठने को कह रहा था, पर मैंने मना कर दिया। इतने में एक और रिक्शा आ गई। मैं  उस में बैठने लगा तो पहले वाला मुझसे  चिरोरी करने लगा। बोला-‘बाबू, मेरी रिक्शा में बैठ जाओ न। आज तो मुझे खाना भी नहीं मिला है। 
  मैंने बाज़ार जाने का विचार छोड़ दिया। लगा कि पहले इस बच्चे से बात करनी चाहिए। मैंने कहा –‘तुम कह रहे थे न तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया है।‘ और मैं उसे सामने वाले ढाबे में ले गया।   उसके लिए खाना और अपने लिए चाय मंगवा ली। मैं उसकी कहानी जानना चाहता था। मैंने देखा वह खा नहीं रहा है। मैंने कहा-‘तुम कह रहे थे न कि सुबह से कुछ नहीं खाया है, फिर खा क्यों नहीं रहे हो!’
  ‘आप ने मेरी रिक्शा में सवारी तो की नहीं,मैं मुफ्त में नहीं खाऊंगा,’ वह बोला। उसकी बात मुझे                                                                          अच्छी लगी। मैंने कहा-‘ तुमने ठीक कहा, मुफ्त में किसी से कभी कुछ नहीं लेना चाहिए। मैं इस भोजन के बदले तुमसे कोई काम ले लूँगा। अब तो खा लो।’ वह खाने लगा। उसे खाते हुए देख कर लग रहा था कि वह सचमुच बहुत भूखा था। इस बीच मैं उसके परिवार के बारे में पूछता रहा।   उसका नाम जगन था। उसने बताया कि उसके पिता बहुत गुस्सैल हैं। बात बेबात उसके साथ मार पीट किया करते थे, इसीलिए वह घर से भाग आया है। माँ के बारे में पूछते ही उसकी आँखों में आंसू भर आये। बोला-‘पिता जितना मार पीट करते थे माँ उससे ज्यादा प्यार करती थीं। 
  ‘तो माँ ने तुम्हें नहीं रोका यहाँ आने से?’
  ‘पिता के आगे माँ क्या करती भला। उनका प्यार मुझे पिटने से तो नहीं बचा सकता था।  इसीलिए मैं भाग आया। 
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  ‘माँ की याद तो आती होगी? कभी उनसे बात करते हो?’

  हम दोनों के पास मोबाइल नहीं है,बात कैसे हो? यहाँ मेरे गाँव के कई जने हैं,वही मेरी बात माँ को बताते हैं और उनका संदेसा मुझे लाकर देते हैं। जगन ने बताया ’वैसे माँ जल्दी ही मुझसे मिलने आएँगी,अभी हाल में उन्होंने कहलवाया है।‘ 
  ‘यह तो बहुत अच्छा होगा। मुझे भी मिलवाना अपनी माँ से।‘ फिर मैं चला आया। पर जगन की बात मन में घूमती रही। जहाँ मैंने जगन को खाना खिलाया था उस ढाबे का मालिक मुझे अच्छी तरह जानता था। मैंने जगन के बारे में उससे बात की तो वह जगन को काम पर रखने को राजी हो गया। ढाबे में ही उसके सोने का इंतजाम भी हो गया। मुझे तसल्ली हो गई थी और जगन भी खुश था। जब भी मैं ढाबे के सामने से गुजरता तो उसका हाल चाल पूछ लेता। ढाबे का मालिक जगन के काम से संतुष्ट था।   
  एक दिन जगन ने मुझे मोबाइल दिखाया। प्रसन्न स्वर में बोला-‘मालिक ने मुझे यह मोबाइल दिया है,अब मैं माँ से भी बात कर सकता हूँ।‘ 
  ‘पर तुमने कहा था न कि तुम्हारी माँ के पास मोबाइल नहीं है। फिर..’ 
  ‘हाँ यह तो है। ’-जगन ने कहा। ‘लेकिन..’ तभी ढाबे वाले ने उसे आवाज दी और वह अंदर चला गया। पर माँ के प्रति उसकी ललक साफ़ झलक रही थी,क्या जगन अपनी माँ से कभी मिल पायेगा! मैं यही सोच रहा था।  
  उस दिन दरवाजे की घंटी बजी,देखा तो जगन खड़ा था। मुझे आश्चर्य हुआ, इससे पहले तो वह कभी नहीं आया था। मैं कुछ पूछता इससे पहले ही उसने उत्तेजित स्वर में कहा- ‘जल्दी चलिए, माँ आई है, ढाबे में चाय पी रही है। आप उनसे मिल लो।‘ 
  मैं उसके साथ ढाबे पर जा पहुंचा। जगन एक औरत को बाहर बुला लाया। मैंने नमस्ते करके उससे पूछा-‘क्या आप जगन की माँ हैं?
  ’हाँ।‘ उस  ने कहा। मुझे कुछ अजीब लगा। वह जगन से दूर खड़ी हुई थी जैसे उसे जानती न हो।   क्या यही प्यार था एक माँ का इतने समय से बिछड़े हुए बेटे के लिए!           
   ‘इसे अपने साथ ले जाओ या यहाँ इसके साथ रहो।’-मैंने कहा। जगन की माँ ने मेरी बात का कोई 
जवाब नहीं दिया। बोली- ‘मुझे काम है।‘ और फिर वह जगन की ओर देखे बिना चली गई। जगन ने जैसे मेरे मन को पढ़ लिया, बोला-‘माँ को कोई काम था इसलिए जाना पड़ा।‘ और ढाबे में चला गया।  मैं जगन की माँ के अजीब व्यवहार के बारे में सोच रहा था,तभी एक रिक्शावाला मेरे पास आया।  उसने कहा-‘तो जगन ने आपको अपनी नकली माँ से मिलवा दिया।’
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  ‘नकली माँ!’-मैंने अचरज के भाव से पूछा। 
  ‘और नहीं तो क्या। जगन ने जिस औरत से आपको मिलवाया, वह उसकी कोई नहीं है। वह मेरे एक साथी की माँ है। जगन ने मेरे साथी से कई बार कहा कि वह अपनी माँ को कुछ देर के लिए उस की माँ बनने को कह दे, ताकि उसे अपनी माँ कह कर आप से मिलवा सके। इसके लिए उसने हम सब को ढाबे में चाय भी पिलवाई। 
  ‘मेरे सामने इतना नाटक क्यों?’-मुझे जगन पर गुस्सा आ रहा था। 
  ‘बाबूजी, वह आपकी बहुत इज्जत करता है।आपने उसकी इतनी मदद जो की है।‘ 
  ‘झूठा,फरेबी।‘- मैंने कहा। 
  ‘जगन कई सालों से अनाथालय में रह रहा था, पर वहां से भी निकाल दिया गया उसे।‘ 
  ‘लेकिन वह तो गाँव से भाग कर यहाँ आने की बात बता रहा था मुझे।‘गुस्सैल पिता और ममतामयी माँ के बारे में कहे गए उसके शब्द कानों में गूंजने लगे। और एक दिन मैं उस अनाथालय में जा पहुंचा जहाँ से जगन को निकाल दिया गया था। वहां के मैनेजर ने बताया कि जगन दूसरे बच्चों के साथ अक्सर झगड़ा करता था। वह कहा करता था कि गाँव में उसकी माँ रहती हैं और वह उनके पास चला जाएगा। इस पर दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।बस आपस में मार पीट हो जाती थी। एक बार किसी बच्चे ने उसे ‘बिना माँ का झूठा जगन’ कहा तो जगन ने उसे खूब मारा। उसकी शरारतों से तंग आकर उसे अनाथालय से निकाल दिया गया।   
  ‘क्या सच में गाँव में उसकी माँ थी और गुस्सैल पिता ने ही उसे अनाथालय के बाहर छोड़ दिया  था? आखिर सच क्या था?उस शाम मैं यह निश्चय करके ढाबे पर गया था कि उसके झूठ की पोल खोल कर रहूँगा और इसके बाद फिर कभी उससे नहीं मिलूँगा। मुझे देखते ही वह बाहर आ गया।बोला-‘माफ़ करना बाबूजी,उस दिन माँ को जरूरी काम था इसलिये वह जल्दी चली गई थीं उन्होंने कहा है कि अगली बार आयेंगी तब वह आपसे खूब बातें करेंगी।’
  यानि वह अब भी अपनी उस माँ की कल्पना में खोया हुआ था जो शायद कहीं थी ही नहीं।क्या  मैं उसकी आँखों में ममतामयी माँ की छवि देख पा रहा था! पता नहीं क्यों मुझे अपना गुस्सा पिघलता हुआ लगा। वह अपनी कल्पना में खोया हुआ था। मैंने अपना इरादा बदल दिया। मैं उसके सपने को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था। मैंने कहा-‘ठीक है जब अगली बार तुम्हारी माँ आएँगी तो हम तीनों खूब बातें करेंगे।‘ 
  ‘वाह तब तो खूब मज़ा आएगा।’-कह कर जगन खिलखिला उठा। मुझे भी हंसी आ गई। मैं न चाहते हुए भी उसके सपने में शामिल हो गया था।  (समाप्त)       
 

Thursday, 27 February 2020

वह कौन थी-कहानी-देवेन्द्र कुमार


वह कौन थी—कहानी—देवेन्द्र कुमार

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बाबा, परियाँ क्या सचमुच होती हैं?”  रामू ने बाबा से पूछा।
बाबा ने रोज की तरह रामू को परी की कहानी सुनाई थी। रोज रात में सोने से पहले रामू बाबा से कहानी सुनाने के लिए कहता था और फिर उनसे कहानी सुनते-सुनते सो जाता था, पर उसके बाबा को रात में बहुत देर तक नींद नहीं आती थी। तब वह लाठी लेकर घर के बाहर घूमने लगते थे।
कहानी सुनकर रामू सो गया और उसके बाबा हमेशा की तरह लाठी लेकर घर से बाहर निकल आए। बाबा टहल रहे थे तभी अचानक दूर रोशनी दिखाई दी।
रोशनी देखकर बाबा चौंक उठे। डर किस चिड़िया का नाम है, इसे तो वह जानते ही नहीं थे। उन्होंने लाठी सँभाली और दूर चमकती रोशनी की तरफ बढ़ चले। तभी पीछे से आवाज आई, “बाबा, रुको मैं भी रहा हूँ।
बाबा ने मुड़कर देखा, रामू पीछे-पीछे रहा था।
अरे शैतान, तेरी नींद कैसे खुल गई।जाओ, घर के अंदर जाओ, मैं अभी आता हूँ।लेकिन रामू ने बढ़कर उनका हाथ थाम लिया। बोला, “मैंने सपने में एक परी को आकाश से उतरते देखा था। वह हमारे गाँव के पास ही धरती पर उतरी है। मैंने सुना, वह कह रही थी, ‘रामू, मैं तुम्हारे गाँव के पास नीचे उतरूँगी। तुम मुझसे मिलने जरूर आना।बस फिर मेरी नींद टूट गई। आप उस परी से ही मिलने जा रहे हैं ! मैं भी चलूँगा आप के साथ।
 बाबा समझ गए कि रामू उनके साथ जरूर जाएगा। घर में कोई नहीं था। रामू के माँ-बाप दो दिन पहले शहर गए थे और एक सप्ताह बाद ही लौटने वाले थे।
                           
 बाबा ने रामू का हाथ कसकर पकड़ लिया। बोले, “डरेगा तो नहीं?’’
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जब आप नहीं डरते तो भला मैं क्यों डरने लगा। और आप तो परी से मिलने जा रहे हैं। परियाँ तो अच्छी होती हैं|’’ बाबा समझ गए रामू के मन पर परियों का खासा असर पड़ा है, पर वह समय कुछ कहने का नहीं था। रामू का हाथ पकड़े हुए बाबा दूर चमकती रोशनी की ओर बढ़े जा रहे थे।
 चलते-चलते दोनों उस रोशनी के पास जा पहुँचे। रोशनी एक खंडहर में जल रही थी। उस खंडहर मकान में कोई नहीं रहता था। बाबा सोच रहे थे, ‘कहीं कोई चोर डाकू हो। तब तो मुसीबत हो सकती है।बाबा रामू के साथ खंडहर के अंदर चले गए। बिना छत और बिना दरवाजे वाले कमरे में उन्हें एक बुढ़िया  दिखाई दी।
बाबा, देखो परी।रामू धीरे से बोला।
बाबा ने देखा वह आग के सामने बैठी हाथ ताप रही थी। बाबा ने इधर-उधर देखा पर वहाँ और कोई नजर नहीं आया।
बाबा और रामू को देखकर बुढ़िया मुस्कराई। बोली, “आप लोग कौन हैं?”
यह तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।“  
बुढ़िया ने कहा, “मैं अगले गाँव जा रही थी पर मेरे पास पैसे कम पड़ गए। इसलिए गाड़ीवान ने यहीं उतार दिया। मैंने सोचा, रात में गाँव वालों को क्यों परेशान करूँ। इसलिए इसी खंडहर में रुक गई। पता नहीं आपने कैसे जान लिया मेरे बारे में?”
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रामू सोच रहा थाजानते कैसे नहीं तुम्हारे बारे में। मैंने सपने में देखा था तुम्हें। तभी तो गया हूँ यहाँ अपने बाबा के साथ।
बाबा ने बताया कि उन्होंने अँधेरे में दूर से रोशनी देखी थी और इसलिए चले आए थे।
रामू ने धीरे से कहा, “बाबा, यही परी है जो बुढ़िया बनकर आई है।
बुढ़िया ने बाबा से पूछा, “बच्चा क्या कह रहा है?”
बाबा हँसकर बोले, “बच्चे का दिमाग ठहरा। मैंने कुछ देर पहले इसे एक परी कथा सुनाई थी, फिर यह सो गया था। जब मैं यहाँ के लिए निकला तो यह भी जाग गया और जिद करके मेरे साथ चला आया।
तभी बुढ़िया जोर से कराह उठी और जमीन पर लेट गई। बाबा ने पूछा, “माई, क्या बात है।
पेट में दर्द हो रहा है।बुढ़िया ने कहा।
लेकिन परी को दर्द कैसे हो सकता है।रामू बोला। सुनकर बाबा हँस पड़े। पर  
बुढ़िया दर्द से कराह रही थी। बाबा समझ गए कि वह बुढ़िया को इस हालत में छोड़कर गाँव वापस नहीं नहीं जा सकते। लेकिन यहाँ खंडहर में वह कुछ कर भी नहीं सकते थे।
उन्होंने कहा, “माई, यह जगह गाँव से बाहर है। यहाँ हमें कोई मदद नहीं मिलेगी। तुम मेरे साथ गाँव चलो तो दवा दे सकता हूँ।उन्होंने  बुढ़िया का हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे गाँव की तरफ लौट चले।
रामू ने भी बुढ़िया का दूसरा हाथ पकड़ लिया। वह रह-रहकर पूछ रहा था, “अम्मां, सच बताओ न। कह दो कि तुम परी लोक से आई हो।पर बुढ़िया  ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया.
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बाबा उसे अपने घर ले आए, बिस्तर पर लिटा दिया और गरम पानी के साथ कोई दवा दी। उससे बुढ़िया का दर्द कम हो गया और वह सो गई। फिर बाबा ने कहा, “रामू, अब तुम सो जाओ, बहुत रात हो गई है।पर उसने तो जिद ठान ली। कहने लगा, “मैं तो परी के पास ही बैठूँगा।फिर भी कुछ देर बाद उसे नींद ने अपनी गांद में ले ही लिया।
बुढ़िया सारी रात आराम से सोती रही, पर बाबा जागते रहे। सुबह बुढ़िया की नींद खुली तो वह ठीक थी। उसने अपनी पोटली उठाई चलने लगी।
क्या परियाँ ऐसी होती हैं? वह तो बच्चों को उपहार देती हैं। पर इस परी ने...” रामू ने बाबा से कहा तो बुढ़िया ने पूछा...“बच्चा क्या कह रहा है?”
अब बाबा को पूरी बात बतानी पड़ी। बोले, “यह तो आपको आकाश से उतरी कोई परी समझ रहा है जो बुढ़िया का रूप बनाकर आई है। इसने सुना है परियाँ बच्चों से प्यार करती हैं, उन्हें उपहार देती हैं। इसीलिए कुछ निराश हो रहा हैं। पूछ रहा है क्या परियाँ ऐसी होती हैं?”
बुढ़िया ने बढ़कर रामू को प्यार किया। बोली, “परियाँ मेरे जैसी भी तो हो सकती हैं। मैं ऐसी परी हूँ जिसके प्राण तुमने और तुम्हारे बाबा ने बचाए हैं। अगर तुम लोग खंडहर में आते तो हो सकता है मैं पेट के दर्द से बेहोश हो जाती। मैं मर भी सकती थी।
क्या परी ऐसी भी हो सकती है जिसकी हम मदद करें?” रामू बोला।
हाँ, एकदम नई परी।बाबा और बुढ़िया, दोनों हँसकर बोले। इसके बाद वह  अपनी पोटली लेकर चली गई। रामू देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।
ऐसी परी कथा आपने तो कभी नहीं सुनाई।रामू ने बाबा से कहा।
यह नई परी कथा तो परीलोक से बुढ़िया बनकर आई परी ने अपने मुँह से सुनाई है।कहकर बाबा हँस पड़े। रामू भी हँस रहा था।( समाप्त)