Saturday, 6 August 2016

जादूगर




पार्क के बाहर रास्ते पर एक टोकरा उल्टा रखा था. बच्चों ने पूछा तो माली ने कहा-‘ शाम को जादूगर आकर खेल दिखाएगा ‘’ शाम को बच्चे फिर आये तो टोकरा गायब था, माली ने कहा-‘’ जादूगर खेल दिखा कर चला गया.कौन था वह जादूगर?

सबको पता है उधर से नहीं जाना है। पूरी काॅलोनी के बच्चे एक-दूसरे को बता रहे हैं-अरे देखो, उधर से मत जाना। काॅलोनी के बीच में छोटा-सा बाग है। बाग के चारों ओर पक्की सड़क बनी हुई है। बाईं ओर वाली सड़क के बीचोंबीच एक टोकरा उल्टा रखा है। बच्चे बाग में काम करते हुए माली के पास जाकर बार-बार पूछते हैं,  ‘‘माली भैया, उस टोकरे के नीचे क्या है?’’
माली जवाब देता-देता परेशान हो गया है। वह बार-बार कहता है, ‘‘कोई उस टोकरे को न छुए। शाम को यहां जादू का खेल दिखाया जाएगा। जादूगर खुद आकर इस टोकरे को उठाएगा और फिर जादू दिखाएगा।’’
अब बच्चे शाम को होने वाले जादू के खेल के बारे में बातें कर रहे हैं। सब एक-दूसरे को बता रहे हैं कि शाम को काॅलोनी में जादू का खेल होगा।
तभी एक ठेले वाला अपने ठेले पर सामान लादकर लाया। उसने अपनी जेब से पते वाला परचा निकालकर माली से पूछा। माली ने सामने वाले मकान की ओर संकेत करके बता दिया कि उस घर में जाना है। ठेले वाले ने सामान पहुंचा दिया फिर खाली ठेला ढकेलता हुआ बाहर की तरफ लौट चला। उसने भी पार्क के पास वाली सड़क पर उल्टा पड़ा टोकरा देखा। ठेले वाला रुक गया। वह सोच रहा था, ‘इस टोकरे के नीचे क्या है?’
तभी दो बच्चे वहां से गुजरे। उन्होंने ठेले वाले से कहा, ‘‘उस तरफ मत जाना। उस टोकरे को मत छूना। शाम को जादूगर इस टोकरे के नीचे से खरगोश निकालकर दिखाएगा। तुम भी आना जादू का खेल देखने के लिए।’’
ठेले वाला टोकरे के पास ही जमीन पर बैठकर पसीना पोंछने लगा। पेड़ की छाया भली लग रही थी। तभी उसके कानों में हल्की-सी आवाज आई। ठेले वाले ने देखा-आस-पास कोई परिंदा नहीं था, तब फिर आवाज कैसी थी। कहीं आवाज इस टोकरे के नीचे से तो नहीं आ रही है, जो सड़क पर औंधा रखा हुआ है।
ठेले वाले ने बाग में पेड़ की छाया के नीचे लेटे माली की ओर देखा। उससे पूछा, ‘‘क्यों भैया, इस टोकरे के नीचे क्या है?’’ उसे बच्चों की बात याद थी कि शाम को जादूगर इस टोकरे के नीचे से कोई अजीब चीज निकालेगा।
माली ने ठेले वाले को इशारे से पास बुलाया, खुद पेड़ की छाया में लेटा रहा। बोला, ‘‘बच्चों की बातें! क्या कहू। मैंने एक बार जादूगर का नाम क्या ले दिया, बस तभी से पूरी बस्ती के बच्चे जादू का खेलऔर जादूगरचिल्लाते घूम रहे हैं।’’ और धीरे से मुस्कराया।
‘‘जादूगर, जादू का खेल।’’ ठेले वाला बुदबुदाया। उसने भी कई बार बचपन में जादू के खेल देखे थे, लेकिन वह सब तो पुरानी बात हो गई थी। आजकल तो सारा दिन ठेला खींचना पड़ता था। मन में आया-अगर शाम को जादू का खेल होगा तो वह भी देखेगा।
माली फिर हंसा। उसने कहा, ‘‘अरे कैसा जादू! यह तो मैंने बच्चों से वैसे ही कह दिया। अब पछता रहा हूं कि क्यों कहा। थोड़ी-थोड़ी देर में पूछने आ जाते हैं, ‘कब आएगा जादूगर! कब दिखाएगा खेल?’ असल में सड़क पर एक मरा हुआ कबूतर पड़ा है। जब मैं काम पर आया तो मैंने देखा उसे। आज सफाई वाला आया नहीं। इसलिए मैंने टोकरे से ढक दिया ताकि किसी का पैर न पड़ जाए।’’
ठेले वाले को याद आया उसने टोकरे के नीचे से हल्की-सी  आवाज सुनी थी। उसने कहा, ‘‘माली भैया, मुझे लगता है कबूतर मरा नहीं। जरा चलकर तो देखो।’’
‘‘जाओ जी, अपना काम करो। हमने खुद अपनी आंखों से देखा था मरा हुआ कबूतर। यों पंख फैलाए पड़ा था। पंखों पर खून के धब्बे थे। वह एकदम मरा हुआ था, तभी तो मैंने टोकरे से ढक दिया उसको।’’ माली ने तेज आवाज में कहा और फिर आंखें मूंद लीं। वह नहीं चाहता था कि मरे हुए कबूतर के बारे में ठेले वाला कोई और बात करे। शायद बच्चों के जवाब देता-देता परेशान हो चुका था।
लेकिन ठेले वाले को तसल्ली नहीं हुई। वह जाकर फिर से सड़क पर औंधे पड़े टोकरे के पास बैठ गया। उसने कान लगाए तो हल्की-सी आवाज फिर सुनाई दी। यह भ्रम नहीं था। ठेले वाले ने झपटकर टोकरा उठाया तो उसके नीचे पड़ा कबूतर दिखाई दिया। हां, उसके पंखों पर खून लगा था, पर वह एकदम मरा नहीं था। उसके एक पंख रह-रहकर कांपता तो जमीन से टकराकर हल्की-सी आवाज होती। ठेले वाले के कानों ने घायल कबूतर का पंख जमीन से टकराने की वही हल्की-सी आवाज सुन ली थी।
ठेले वाले ने हौले-से कबूतर को उठा लिया। माली को पुकारा, ‘‘अरे भाई, कबूतर मरा नहीं जिंदा है। जल्दी आओ।’’
माली झटके से उठा अैर दौड़ता हुआ वहां आ गया। घायल कबूतर ठेले वाले के हाथों में हौले-हौले हिल रहा था। माली अचरज से आंखें फाड़े देखता रह गया। ठेले वाले ने घायल कबूतर को माली के चेहरे के एकदम सामने कर दिया। बोला, ‘‘लो खुद ही देख लो। इसे तुमने मरा कहकर टोकरे से ढककर छोड़ दिया था।
माली को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने कहा,‘‘सच कहता हूं भैया, सुबह जब मैंने इसे देखा था तो यह मरा हुआ था।’’
‘‘तो क्या यह जादू के जोर से जिंदा हो गया?’’ ठेले वाले ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में कहा,‘‘अच्छा, बाकी बातें बाद में, पहले पानी लाओ।’’
माली दौड़ा हुआ गया और एक बरतन में पानी ले आया। ठेले वाले ने कपड़े के टुकड़े को पानी में भिगोया फिर घायल कबूतर की चोंच खोलकर बूंद-बूंद पानी मुंह में डालने लगा। पानी पीकर कबूतर में जैसे नई ताकत आ गई। वह पहले के मुकाबले अधिक तेजी से पंख फड़फड़ाने लगा। ठेले वाले ने गीले कपड़े से धीरे-धीरे उसके पंखों पर लगा खून पोंछ दिया। अब कबूतर का पूरा शरीर हिल रहा था, शायद उसके घावों में तकलीफ हो रही थी।
माली ने कहा, ‘‘ओ ठेले वाले भाई!यह कबूतर बस थोड़ी देर का मेहमान है। इसे आराम से वहीं पड़ा रहने दो।’’
ठेले वाले ने दोनों हाथों में घायल कबूतर के संभालते हुए कहा, ‘‘यह बच भी सकता है। और मैं इसकी जान बचाने की पूरी कोशिश करूंगा।’’
‘‘लेकिन...’’ माली कहता-कहता रुक गया। ठेले वाला घायल कबूतर को संभाले हुए ठेले के खींचता हुआ वहां से चल दिया। उसने माली की ओर बिना देखे कहा, ‘‘मैं नहीं जानता कि कैसे क्या होगा, पर मैं इसे मरने नहीं दूंगा।’’
माली गुमसुम खड़ा रह गया, फिर धीरे-धीरे चलकर पेड़ के नीचे जा बैठा। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वह बड़बड़ाया, ‘‘मरा हुआ कबूतर फिर से जिंदा कैसे हो सकता है। क्या यह कोई जादू था।’’
धूप हल्की हुई तो बच्चे घरों से निकल आए। सड़क पर पड़े टोकरे के पास घेरा बनाकर खड़े हो गए। वे माली से पूछने लगे, ‘‘जादूगर कब आएगा माली भैया!’’ बच्चे बार-बार एक ही बात दोहरा रहे थे।
माली कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘जादूगर आया था। वह जादू का खेल दिखाकर चला गया।’’
‘‘चला गया!’’ बच्चों ने चकित स्वर में पूछा।
माली चुप खड़ा था।                                               

Thursday, 4 August 2016

शुभ विवाह



हम सभी अनेक विवाह समारोहों में शामिल होते हैं पर देवा को जिस शुभ विवाह में शामिल कर लिया गया था ,वह अनोखा था.  

सोसाइटी में बड़े पैमाने पर मरम्मत का काम चल रहा है.फ्लैटों के आगे लगी बल्लियों के ढाँचे पर खड़े होकर राज-मजदूर काम कर रहे हैं.जगह जगह मलबे के ढेर पड़े हैं. देवा भी एक मजदूर है. लेकिन वह काम नहीं कर रहा है,एक तरफ चुप खड़ा है.उसे ठेकेदार राजवीर का इन्तजार है. कुछ देर बाद राजवीर आता दिखाई दिया. उसने देवा को देखा तो चिल्ला कर बोला—‘खाली क्यों खड़ा है ? काम नहीं करना क्या?’
पहले पिछला हिसाब साफ़ करो.’ देवा ने कहा.
तेरा कुछ बकाया नहीं है. वैसे भी आगे मुझे तुझसे काम नहीं करवाना,’ –कह कर राजवीर आगे बढ़ गया. देवा समझ गया कि अब कहीं और काम ढूंढना होगा. उसने एक नज़र काम करते साथियों पर डाली फिर पार्क की ओर बढ़ गया. सर्दियों के दिन हैं. हरी घास और फूलों की क्यारियों पर धूप की सुनहरी चादर बिछी हुई है. आज रविवार् है. पार्क में बच्चे दौड़ -भाग कर रहे हैं ,हवा में उनकी खिल खिल गूँज रही है. अनचाहे देवा के होंठों पर हंसी आ गई. हँसते खेलते बच्चे उसे अच्छे लगते हैं . मन तुरंत उड़ कर अपने गाँव पहुँच जाता है. अपनी बेटी मुनिया का चेहरा आँखों के सामने चमक उठता है. देवा का परिवार दूर गाँव मैं रहता है,जहाँ देवा कई महीनों के बाद ही जा पाता है.
देवा बेंच पर जा बैठा और धूप में खेलते ,खिलखिलाते बच्चों को देखने लगा. पार्क में बैठे कई लोग अचरज से देवा को देख रहे थे. यह अजीब था कि काम के बीच कोई मजदूर धूप सेकने का आनंद ले. लेकिन साथी मजदूरों को पता था कि देवा को ठेकेदार ने काम से हटा दिया है.फिर वह चाहे जो करे. देवा सोच रहा था कि दूसरी जगह काम खोजना होगा.इस तरह धूप मैं बैठने से कुछ होने वाला नहीं . वह उठ कर मुख्य द्वार की ओर चल दिया. तभी किसी ने पुकारा –‘ ओ भैया,जरा रुकना.’
1


देवा ने देखा एक छोटी लड़की मुस्कराती हुई उसकी तरफ आ रही है. साथ में शायद उसकी
माँ थी. देवा रुक गया. वे दोनों पास आ गयीं .लड़की ने कहा—‘ तुम वही हो न जो एक दिन हमारी बालकनी में काम कर रहे थे. तब माँ ने तुम्हें पानी पिलाया था.उस दिन खूब गर्मी थी.’’
देवा को कुछ याद न आया. पर ऐसा तो कई बार हुआ था जब किसी फ़्लैट की बालकनी में काम करते हुए प्यास लगने पर वह आवाज दे कर फ़्लैट वालों से पानी पिलाने को कह देता था. इसमें कुछ भी अजीब नहीं था. पर उसने तुरंत हाँ कह दी और आगे की तरफ चला तो बच्ची की माँ ने कहा –‘ मेरी बेटी तुमसे कुछ कहना चाहती है. ‘’
देवा ने मुस्करा कर बच्ची की और देखा.उसे देख कर देवा को गाँव में रहने वाली अपनी मुनिया की याद आ गई. बोला—‘ हाँ, बोलो क्या बात है?’
लड़की की माँ ने कहा –‘भैया ,यह मेरी बेटी रमा है.इसने कई दिनों से अपनी गुडिया की शादी की धुन  लगा रखी है. गुड्डा इसकी सहेली लता का है.’
‘वाह ,तब तो खूब मज़ा आयेगा,’—देवा हंस पडा.
‘ वो तो ठीक है  लेकिन गुड्डे- गुडिया के इस खेल में घर खूब फैल जाएगा. इसलिए मैं इससे कह रही हूँ कि यह खेल बालकनी में खेले लेकिन बालकनी में अभी सफाई नहीं हुई है.वहां मलबा पड़ा हुआ है. ‘
अब देवा पूरी बात समझ गया. उसने कहा—‘ तब तो गुडिया की शादी के लिए बालकनी की सफाई करनी होगी. ‘’
रमा झट बोल उठी –‘ हाँ तो तुम कर दो न .’
देवा ने फ्लैटों की तरफ देखा. आखिर कौन सा फ़्लैट होगा इनका.
रमा की माँ ने कहा-मैं ऊपर जाकर अपने फ़्लैट की बालकनी से तुम्हें इशारा करुँगी तो तुम्हें पता चल जाएगा.’

2

माँ के साथ जाते हुए रमा ने देवा से कहा—‘ चले मत जाना. नहीं तो मेरी गुडिया की शादी कैसे होगी.’
देवा को मजा आ रहा था.बोला—‘   रमा बिटिया,  तुमने मुझे गुडिया की शादी का काम सौंपा  है.उसे पूरा किये बिना कैसे जा सकता हूँ भला. मुझे एक लड्डू तो जरूर मिलेगा .’’
रमा की माँ ने हँसते हुए कहा –‘ एक खाना और दो ले जाना.’
देवा खड़ा हुआ ऊपर की तरफ देखता रहा.वह भी शादी के खेल में शामिल हो गया था. कुछ देर बाद दूसरी मंजिल की एक बालकनी में रमा अपनी माँ के साथ दिखाई दी.
देवा ने कहा—‘ मैं अभी ऊपर आकर बालकनी की सफाई कर देता हूँ. ‘ और वह पाड पर चढ़ कर बालकनी मैं जा उतरा. सचमुच वहां बहुत मलबा पडा था. उसने रमा की माँ से झाड़ू लाने को कहा फिर पास वाले फ़्लैट के बाहर  काम करते हुए अपने साथी से तसला देने को कहा. साथी ने अचरज से कहा—‘ देवा, तुझे तो राजवीर ने काम से हटा दिया था न. ‘
‘मुझे उसके साथ काम नहीं करना है. यह तो मैं  अपना काम कर रहा हूँ ‘’
‘’अपना काम!’’
देवा ने उत्तर नहीं दिया और सफाई करने लगा. उसने मलबे को तसले में भर कर साथ की बालकनी पर काम करते हुए साथी को पकड़ा दिया. फिर रमा की माँ से कहा—‘बाल्टी मैं पानी और झाड़ू चाहिए. ‘ देवा ने अच्छी तरह धो कर बालकनी साफ़ कर दी .फिर दरवाजे के पीछे से देखती रमा से कहा—‘’बिटिया, अब तुम यहाँ आराम से अपनी गुडिया की शादी कर सकती हो.’’ और फिर जैसे ऊपर चढ़ा था उसी तरह नीचे उतर  कर चल दिया.अब उसे काम की तलाश में जाना था. लेकिन आज का दिन तो बेकार हो गया. अब तो कल ही कुछ होगा. बाग़ मैं बच्चे खिलखिला रहे थे. वह फिर से  बेन्च पर जा बैठा .बच्चों की खिल खिल का आनंद  लेने का ऐसा अवसर न जाने कितने समय बाद मिला था. वर्ना तो हर समय काम में ही पूरा दिन बीत जाता है.
        गुनगुनी धूप बदन को जैसे सहला रही थी. वह अलसा गया. शायद नींद लग गई थी. फिर   झटके से उठ बैठा. उसे तो नए काम की तलाश मैं निकलना है.अलसाने से कैसे चलेगा. उठ कर बाहर की तरफ चला तो फिर गुडिया के ब्याह की बात याद आ गई. एक बार
3

 देखना चाहिए कि ब्याह का खेल कैसा रहा. देवा फिर से बालकनी मैं जा पहुंचा . देखा जमीन पर कुछ फूल बिखरे हुए हैं. छोटी छोटी कटोरियों मैं रो
ली,हल्दी और चावल रखे थे.एक तरफ एक दीपक जल रहा था.’ मतलब शादी पूरी हो गई थी. वह वापस चलने के लिए घूमा  तो आवाज़ आई—‘शादी तो हो गई. तुम कहाँ चले गए थे.’ और कमरे का दरवाजा खुल गया.’वहाँ रमा मुस्करा रही थी.
देवा बोला—‘’ वह तो देख ही रहा हूँ.’’
‘’शादी हो गयी पर दावत अभी चल रही है.’’यह रमा की माँ बोल रही थीं. ‘’आओ अंदर आओ.’’उन्होंने देवा से अंदर आने को कहा.
देवा सकुचा गया.उसने अपने मैंले कपड़ों पर नजर डाली. हाथ-पैर भी धूल मिटटी से गंदे हो रहे थे. बोला—‘मैडम, मैं फिर आ जाऊँगा. कपडे बदलकर .’’
रमा की माँ ने हंस कर कहा—‘ तुमने बालकनी की सफाई की है. तुम सफाई न करते तो रमा की गुडिया की शादी कैसे होती .मेंहनती आदमी के कपडे तो  काम मैं  गंदे होते ही हैं. आ जाओ. ‘’
अब देवा  मना न कर सका. उनके पीछे पीछे अंदर चला गया. वहाँ कई बच्चे भोजन कर रहे थे. एक तरफ झूले मैं गुड्डा-गुडिया झूल रहे थे, खूब चमक दार वस्त्रों में सजे धजे. झूले पर फूल मालाएं लटक रही थीं. बल्ब टिमटिमा रहे थे. माँ
ने  रमा से कहा—‘’देवा भैया के हाथ पैर धुलवा दो.’
रमा देवा को बात रूम मैं ले गई.जब देवा बाहर आया तो उसे आसन पर बैठने को कहा गया. फिर उसके सामने एक प्लेट मैं भोजन परोस दिया गया. छोटी छोटी कटोरियों में सब्जी और नन्ही नन्ही पूरियां . साथ में थे छोटे छोटे लड्डू. छोटी पूरियों को देख कर देवा को बचपन के दिन याद  आगये. उसकी माँ नन्ही नन्ही दो रोटी बना कर एक आग में डालती थीं और दूसरी उसे देकर कहतीं थीं यह पंख पखेरू के लिए. बच्चे उसी की तरफ देख रहे थे.रमा  की माँ उन्हें  बता रही थी कि  कैसे  देवा के कारण ही गुड्डे –गुडिया की शादी हो सकी है.
वह सकुचा कर खड़ा हो गया. देखा एक तरफ रंगीन पन्नी में लिपटे कई पैकेट रखे थे  ,जरूर गुडिया की शादी मैं आये बच्चे लाये होंगे. पर वह तो खाली  हाथ था. उसने रमा से कहा—‘गुडिया ,मैं तो शादी में कुछ लेकर नहीं आया. ‘
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रमा की माँ ने कहा- देवा भाई, तुम्हारे कारण ही रमा की गुडिया की शादी हो सकी है.  यही  तुम्हारा उपहार है. ‘
रमा ने कहा—भैया, गुड्डा-गडिया को देखो तो सही .कितने सुंदर दिख रहे हैं.’ देवा ने पास जाकर देखा. सचमुच संदर जोड़ी थी. देवा ने रमा के सर पर धीरे से हाथ रख दिया. मन ही मन आशीर्वाद  दियारमा से बोला –गुडिया के लिए  मैं एक दिन उपहार लेकर आऊंगा,’’.रमा की माँ ने चलते समय देवा के हाथ मैं एक थैली थमा दी.बोलीं--; इसमें लड्डू हैं.रमा और इसकी सहेलियों ने बनाए हैं.अपने छोटे हाथों से. घर जाकर बच्चों को जरूर खिलाना.’
जी,जरूर.—कह कर देवा दरवाजे से बाहर आगया. उसने नन्हे लड्डुओं की थैली कास कर थाम ली. अभी तक उसका इरादा काम के लिए किसी के पास जाने का था. पर लड्डू की थैली ने उसका मन बदल दिया. अब देवा बस अड्डे की तरफ चल दिया अपने गाँव जाने के लिए. उसका मन अपनी गुडिया से मिलने को मचल उठा. वह उसे गुड्डे गुडिया की शादी के नन्हे लड्डू आज ही खिलाना चाहता था. गाँव मैं भी तो ऐसा खेल हो सकता है. ;’’हाँ, जरूर हो सकता है.’’ वह बुदबुदाया और तेजी से बढ़ चला.(समाप्त )