Thursday, 4 August 2016

शुभ विवाह



हम सभी अनेक विवाह समारोहों में शामिल होते हैं पर देवा को जिस शुभ विवाह में शामिल कर लिया गया था ,वह अनोखा था.  

सोसाइटी में बड़े पैमाने पर मरम्मत का काम चल रहा है.फ्लैटों के आगे लगी बल्लियों के ढाँचे पर खड़े होकर राज-मजदूर काम कर रहे हैं.जगह जगह मलबे के ढेर पड़े हैं. देवा भी एक मजदूर है. लेकिन वह काम नहीं कर रहा है,एक तरफ चुप खड़ा है.उसे ठेकेदार राजवीर का इन्तजार है. कुछ देर बाद राजवीर आता दिखाई दिया. उसने देवा को देखा तो चिल्ला कर बोला—‘खाली क्यों खड़ा है ? काम नहीं करना क्या?’
पहले पिछला हिसाब साफ़ करो.’ देवा ने कहा.
तेरा कुछ बकाया नहीं है. वैसे भी आगे मुझे तुझसे काम नहीं करवाना,’ –कह कर राजवीर आगे बढ़ गया. देवा समझ गया कि अब कहीं और काम ढूंढना होगा. उसने एक नज़र काम करते साथियों पर डाली फिर पार्क की ओर बढ़ गया. सर्दियों के दिन हैं. हरी घास और फूलों की क्यारियों पर धूप की सुनहरी चादर बिछी हुई है. आज रविवार् है. पार्क में बच्चे दौड़ -भाग कर रहे हैं ,हवा में उनकी खिल खिल गूँज रही है. अनचाहे देवा के होंठों पर हंसी आ गई. हँसते खेलते बच्चे उसे अच्छे लगते हैं . मन तुरंत उड़ कर अपने गाँव पहुँच जाता है. अपनी बेटी मुनिया का चेहरा आँखों के सामने चमक उठता है. देवा का परिवार दूर गाँव मैं रहता है,जहाँ देवा कई महीनों के बाद ही जा पाता है.
देवा बेंच पर जा बैठा और धूप में खेलते ,खिलखिलाते बच्चों को देखने लगा. पार्क में बैठे कई लोग अचरज से देवा को देख रहे थे. यह अजीब था कि काम के बीच कोई मजदूर धूप सेकने का आनंद ले. लेकिन साथी मजदूरों को पता था कि देवा को ठेकेदार ने काम से हटा दिया है.फिर वह चाहे जो करे. देवा सोच रहा था कि दूसरी जगह काम खोजना होगा.इस तरह धूप मैं बैठने से कुछ होने वाला नहीं . वह उठ कर मुख्य द्वार की ओर चल दिया. तभी किसी ने पुकारा –‘ ओ भैया,जरा रुकना.’
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देवा ने देखा एक छोटी लड़की मुस्कराती हुई उसकी तरफ आ रही है. साथ में शायद उसकी
माँ थी. देवा रुक गया. वे दोनों पास आ गयीं .लड़की ने कहा—‘ तुम वही हो न जो एक दिन हमारी बालकनी में काम कर रहे थे. तब माँ ने तुम्हें पानी पिलाया था.उस दिन खूब गर्मी थी.’’
देवा को कुछ याद न आया. पर ऐसा तो कई बार हुआ था जब किसी फ़्लैट की बालकनी में काम करते हुए प्यास लगने पर वह आवाज दे कर फ़्लैट वालों से पानी पिलाने को कह देता था. इसमें कुछ भी अजीब नहीं था. पर उसने तुरंत हाँ कह दी और आगे की तरफ चला तो बच्ची की माँ ने कहा –‘ मेरी बेटी तुमसे कुछ कहना चाहती है. ‘’
देवा ने मुस्करा कर बच्ची की और देखा.उसे देख कर देवा को गाँव में रहने वाली अपनी मुनिया की याद आ गई. बोला—‘ हाँ, बोलो क्या बात है?’
लड़की की माँ ने कहा –‘भैया ,यह मेरी बेटी रमा है.इसने कई दिनों से अपनी गुडिया की शादी की धुन  लगा रखी है. गुड्डा इसकी सहेली लता का है.’
‘वाह ,तब तो खूब मज़ा आयेगा,’—देवा हंस पडा.
‘ वो तो ठीक है  लेकिन गुड्डे- गुडिया के इस खेल में घर खूब फैल जाएगा. इसलिए मैं इससे कह रही हूँ कि यह खेल बालकनी में खेले लेकिन बालकनी में अभी सफाई नहीं हुई है.वहां मलबा पड़ा हुआ है. ‘
अब देवा पूरी बात समझ गया. उसने कहा—‘ तब तो गुडिया की शादी के लिए बालकनी की सफाई करनी होगी. ‘’
रमा झट बोल उठी –‘ हाँ तो तुम कर दो न .’
देवा ने फ्लैटों की तरफ देखा. आखिर कौन सा फ़्लैट होगा इनका.
रमा की माँ ने कहा-मैं ऊपर जाकर अपने फ़्लैट की बालकनी से तुम्हें इशारा करुँगी तो तुम्हें पता चल जाएगा.’

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माँ के साथ जाते हुए रमा ने देवा से कहा—‘ चले मत जाना. नहीं तो मेरी गुडिया की शादी कैसे होगी.’
देवा को मजा आ रहा था.बोला—‘   रमा बिटिया,  तुमने मुझे गुडिया की शादी का काम सौंपा  है.उसे पूरा किये बिना कैसे जा सकता हूँ भला. मुझे एक लड्डू तो जरूर मिलेगा .’’
रमा की माँ ने हँसते हुए कहा –‘ एक खाना और दो ले जाना.’
देवा खड़ा हुआ ऊपर की तरफ देखता रहा.वह भी शादी के खेल में शामिल हो गया था. कुछ देर बाद दूसरी मंजिल की एक बालकनी में रमा अपनी माँ के साथ दिखाई दी.
देवा ने कहा—‘ मैं अभी ऊपर आकर बालकनी की सफाई कर देता हूँ. ‘ और वह पाड पर चढ़ कर बालकनी मैं जा उतरा. सचमुच वहां बहुत मलबा पडा था. उसने रमा की माँ से झाड़ू लाने को कहा फिर पास वाले फ़्लैट के बाहर  काम करते हुए अपने साथी से तसला देने को कहा. साथी ने अचरज से कहा—‘ देवा, तुझे तो राजवीर ने काम से हटा दिया था न. ‘
‘मुझे उसके साथ काम नहीं करना है. यह तो मैं  अपना काम कर रहा हूँ ‘’
‘’अपना काम!’’
देवा ने उत्तर नहीं दिया और सफाई करने लगा. उसने मलबे को तसले में भर कर साथ की बालकनी पर काम करते हुए साथी को पकड़ा दिया. फिर रमा की माँ से कहा—‘बाल्टी मैं पानी और झाड़ू चाहिए. ‘ देवा ने अच्छी तरह धो कर बालकनी साफ़ कर दी .फिर दरवाजे के पीछे से देखती रमा से कहा—‘’बिटिया, अब तुम यहाँ आराम से अपनी गुडिया की शादी कर सकती हो.’’ और फिर जैसे ऊपर चढ़ा था उसी तरह नीचे उतर  कर चल दिया.अब उसे काम की तलाश में जाना था. लेकिन आज का दिन तो बेकार हो गया. अब तो कल ही कुछ होगा. बाग़ मैं बच्चे खिलखिला रहे थे. वह फिर से  बेन्च पर जा बैठा .बच्चों की खिल खिल का आनंद  लेने का ऐसा अवसर न जाने कितने समय बाद मिला था. वर्ना तो हर समय काम में ही पूरा दिन बीत जाता है.
        गुनगुनी धूप बदन को जैसे सहला रही थी. वह अलसा गया. शायद नींद लग गई थी. फिर   झटके से उठ बैठा. उसे तो नए काम की तलाश मैं निकलना है.अलसाने से कैसे चलेगा. उठ कर बाहर की तरफ चला तो फिर गुडिया के ब्याह की बात याद आ गई. एक बार
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 देखना चाहिए कि ब्याह का खेल कैसा रहा. देवा फिर से बालकनी मैं जा पहुंचा . देखा जमीन पर कुछ फूल बिखरे हुए हैं. छोटी छोटी कटोरियों मैं रो
ली,हल्दी और चावल रखे थे.एक तरफ एक दीपक जल रहा था.’ मतलब शादी पूरी हो गई थी. वह वापस चलने के लिए घूमा  तो आवाज़ आई—‘शादी तो हो गई. तुम कहाँ चले गए थे.’ और कमरे का दरवाजा खुल गया.’वहाँ रमा मुस्करा रही थी.
देवा बोला—‘’ वह तो देख ही रहा हूँ.’’
‘’शादी हो गयी पर दावत अभी चल रही है.’’यह रमा की माँ बोल रही थीं. ‘’आओ अंदर आओ.’’उन्होंने देवा से अंदर आने को कहा.
देवा सकुचा गया.उसने अपने मैंले कपड़ों पर नजर डाली. हाथ-पैर भी धूल मिटटी से गंदे हो रहे थे. बोला—‘मैडम, मैं फिर आ जाऊँगा. कपडे बदलकर .’’
रमा की माँ ने हंस कर कहा—‘ तुमने बालकनी की सफाई की है. तुम सफाई न करते तो रमा की गुडिया की शादी कैसे होती .मेंहनती आदमी के कपडे तो  काम मैं  गंदे होते ही हैं. आ जाओ. ‘’
अब देवा  मना न कर सका. उनके पीछे पीछे अंदर चला गया. वहाँ कई बच्चे भोजन कर रहे थे. एक तरफ झूले मैं गुड्डा-गुडिया झूल रहे थे, खूब चमक दार वस्त्रों में सजे धजे. झूले पर फूल मालाएं लटक रही थीं. बल्ब टिमटिमा रहे थे. माँ
ने  रमा से कहा—‘’देवा भैया के हाथ पैर धुलवा दो.’
रमा देवा को बात रूम मैं ले गई.जब देवा बाहर आया तो उसे आसन पर बैठने को कहा गया. फिर उसके सामने एक प्लेट मैं भोजन परोस दिया गया. छोटी छोटी कटोरियों में सब्जी और नन्ही नन्ही पूरियां . साथ में थे छोटे छोटे लड्डू. छोटी पूरियों को देख कर देवा को बचपन के दिन याद  आगये. उसकी माँ नन्ही नन्ही दो रोटी बना कर एक आग में डालती थीं और दूसरी उसे देकर कहतीं थीं यह पंख पखेरू के लिए. बच्चे उसी की तरफ देख रहे थे.रमा  की माँ उन्हें  बता रही थी कि  कैसे  देवा के कारण ही गुड्डे –गुडिया की शादी हो सकी है.
वह सकुचा कर खड़ा हो गया. देखा एक तरफ रंगीन पन्नी में लिपटे कई पैकेट रखे थे  ,जरूर गुडिया की शादी मैं आये बच्चे लाये होंगे. पर वह तो खाली  हाथ था. उसने रमा से कहा—‘गुडिया ,मैं तो शादी में कुछ लेकर नहीं आया. ‘
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रमा की माँ ने कहा- देवा भाई, तुम्हारे कारण ही रमा की गुडिया की शादी हो सकी है.  यही  तुम्हारा उपहार है. ‘
रमा ने कहा—भैया, गुड्डा-गडिया को देखो तो सही .कितने सुंदर दिख रहे हैं.’ देवा ने पास जाकर देखा. सचमुच संदर जोड़ी थी. देवा ने रमा के सर पर धीरे से हाथ रख दिया. मन ही मन आशीर्वाद  दियारमा से बोला –गुडिया के लिए  मैं एक दिन उपहार लेकर आऊंगा,’’.रमा की माँ ने चलते समय देवा के हाथ मैं एक थैली थमा दी.बोलीं--; इसमें लड्डू हैं.रमा और इसकी सहेलियों ने बनाए हैं.अपने छोटे हाथों से. घर जाकर बच्चों को जरूर खिलाना.’
जी,जरूर.—कह कर देवा दरवाजे से बाहर आगया. उसने नन्हे लड्डुओं की थैली कास कर थाम ली. अभी तक उसका इरादा काम के लिए किसी के पास जाने का था. पर लड्डू की थैली ने उसका मन बदल दिया. अब देवा बस अड्डे की तरफ चल दिया अपने गाँव जाने के लिए. उसका मन अपनी गुडिया से मिलने को मचल उठा. वह उसे गुड्डे गुडिया की शादी के नन्हे लड्डू आज ही खिलाना चाहता था. गाँव मैं भी तो ऐसा खेल हो सकता है. ;’’हाँ, जरूर हो सकता है.’’ वह बुदबुदाया और तेजी से बढ़ चला.(समाप्त )

Saturday, 30 July 2016

चिड़ियों की टोली



ग्यारह चिड़ियों की टोली हर दोपहर स्कूल बस से उतरती थी और उनका स्वागत करते थे उनके और सबके बाबा-दादी. लेकिन एक दिन दोनों ही दरवाजे पर नहीं थे,आखिर क्या हो गया था?


चिडि़यों की टोली उतरती है दोपहर में एक बजे। स्कूल बस ग्लोरी अपार्टमेंट्स के सामने रुकती है। सबसे पहले रजत की आवाज गूंजती है, ‘‘दादी, हम आ गए।’’ हम यानी ग्लोरी अपार्टमेंट्स के ग्यारह फ्लैटों में अलग-अलग रहने वाले अणिमा, नागेश, अनामिका, संतोष, रवि, तरला, अपर्णा, ललित, रमेश, विनय और रजत। बच्चे भले ही अलग-अलग हैं, पर दादी सबकी एक हैं। उन्होंने ही बच्चों को नाम दिया है-चिडि़यों की टोली।
बस का दरवाजा खुलता है। पहले सबसे छोटा संतोष उतरता है। दादी हाथ पकड़कर उतारती हैं। सिर पर हाथ फिराती हैं। फिर दूसरा बच्चा उतरता है, फिर तीसरा और सबसे अंत में रजत। वह चिडि़यों की टोली का मुखिया है। उम्र में सबसे बड़ा है। कुछ सवाल बच्चों से रोज पूछे जाते हैं-होमवर्क मिला, नाश्ता किया, डांट तो नहीं खाई? शिकायतें शुरू हो जाती हैं- ‘‘दादी, आज अणिमा ने मुझे धक्का दिया,’’ तरला कहती है।
‘‘और तूने जो मेरा कान पकड़ा था वह भी तो बता!’’ अणिमा ने मुंह फुलाकर कहा। नन्हा संतोष चुप है। आज उसकी कापी खो गई। दादी यानी उमा देवी हंसती हुई सबको एक-एक थैली पकड़ाती हैं। ‘‘अच्छा अब शिकायतें बंद। जाओ, हाथ-मुंह धोकर इसे खाना। आज मैंने तुम्हारी मनपसंद मिठाई बनाई है। शाम को आना नई कहानी सुनाएंगे तुम्हारे बाबा।“
बच्चों के बाबा हैं उमादेवी के पति अजयसिंह। वह भी एक तरफ खड़े हंस रहे हैं। बच्चे धम-धम करते, बस्ते झुलाते, एक-दूसरे को धकियाते भागते हैं। बस चली जाती है। अजयसिंह के साथ उमादेवी भी अपने फ्लैट में लौट आती हैं। उनकी चिडि़यों की टोली सही-सलामत लौट आई है।
उमादेवी और अजयसिंह एक फ्लैट में अकेले रहते हैं। उनके दो बेटे हैं-श्यामल और सुरेश। दोनों अपने-अपने परिवार के साथ अमरीका जाकर बस गए हैं। बीच में जब भारत आते हैं तो माता-पिता से एक बार जरूर कहते हैं-‘‘यहां क्या रखा है? अमरीका चलकर रहिए न।’’ दोनों मुस्कराकर चुप रहते हैं-यानी उत्तर साफ है कि उन्हें कहीं नहीं जाना। दादी और बाबा चिडि़यों की टोली को कैसे छोड़ें! उनका यह मौन उत्तर घर के नौकर बिलासी  को भी अच्छा लगता है। आखिर वह कहां जाएगा उमादेवी और अजयसिंह के अमरीका जाने के बाद? जिस दिन कहीं न जाने का यह फैसला सुनाया जाता है उस दिन बिलासी शाम को बहुत बढि़या खाना बनाकर खिलाता है।
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एक दिन उमादेवी ने बच्चों के लिए मिठाई के छोटे-छोटे ग्यारह लिफाफे तैयार किए। हर दिन टाफी, चाकलेट,कोई-न-कोई मिठाई बच्चों को बस से उतरने के बाद देती हैं उनकी दादी। लेकिन तभी उनके पेट में दर्द शुरू हो गया। अजयसिंह तुरंत डॉक्टर से दवा लेने चले गए।
एक बजे स्कूल बस सोसायटी के मुख्य द्वार के सामने रुकी। रजत ने पुकारा, ‘‘दादी, हम आ गए?’’
‘‘दादी कहां हैं?’’ नागेश ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
‘‘और बाबा भी दिखाई नहीं दे रहे हैं,’’ तरला ने कहा।
‘‘पता नहीं, क्या बात है?’’ अणिमा अनामिका से फुसफुसा रही थी।
बच्चे कुछ देर अपार्टमेंट के मुख्य द्वार पर खड़े रहे, फिर धीरे-धीरे दादी के फ्लैट की तरफ बढ़े।
‘‘दादी, क्या बात है?’’ रजत की आवाज आई तो उमादेवी झट उठ बैठीं।
‘‘आज आपकी गैरहाजिरी लग गई,’’ अणिमा बोली।
‘‘दादी मिठाई!’’ संतोष जाकर उमादेवी की गोद में चढ़ गया।
‘‘जरा पेट में दर्द हो गया। तुम्हारे बाबा जल्दी घबरा जाते हैं। झट डॉक्टर से दवा लेने चले गए। तुम्हारी मिठाई तैयार है। चलो, पहले बस्ते रखकर हाथ-मुंह धो लो। फिर...’’
तभी अजयसिंह हड़बड़ाए से अंदर घुसे, ‘‘अब दर्द कैसा है?’’ देखा उमादेवी बच्चों से घिरी बैठी हैं। हंस रही हैं। वह भी हंस दिए, ‘‘तो यह क्यों नहीं कहा कि चिडि़यों की टोली को बुला लाओ। मैं डॉक्टर के पास न जाकर स्कूल चला जाता।’’
‘‘देख रहे हैं न, एक साथ कितने डॉक्टर मेरा इलाज कर रहे हैं। दर्द की क्या मजाल ठहर सके। कान दबाकर ऐसा भागा... कि...’’ कहकर उमादेवी जोर से हंस पड़ीं। सचमुच अब दर्द में आराम महसूस हो रहा था।
बिलासी बोला, ‘‘बाबूजी, अम्माजी के दर्द की दवा हमें भी पता चल गई है। आप चिंता मत करो।’’
एक सप्ताह बाद की बात है। एक दिन सुबह-सुबह उमादेवी चाय पीकर प्याला रसोईघर में रखने गईं तो फिर बाहर न आई। अजयसिंह ने जाकर देखा फर्श पर बेहोश पड़ी थीं। तुरंत बिलासी डॉक्टर को बुला लाया, लेकिन उमादेवी फिर न उठीं। बच्चों को दोपहर की मिठाई खिलाने से पहले ही सदा के लिए चली गईं।
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फ्लैट के नीचे लोग आ जुटे। अमरीका टेलीफोन कर दिया गया। लेकिन वहां से कोई भी इतनी जल्दी नहीं आ सकता था। तय हुआ कि क्रियाकर्म कर दिया जाए।
एक बजे स्कूल बस आकर रुकी। रजत ने आने की खबर दी, ‘‘दादी, हम आ गए!’’
दादी के फ्लैट के नीचे भीड़ जमा थी। रजत ने देख लिया बाबा चुपचाप बैठे थे। दादी कहां है?’ वह सोच रहा था।
शाम को बच्चों ने दादी को सदा के लिए जाते देखा। वे सब एक झुंड में एक तरफ चुप खड़े थे।
अमरीका से उमादेवी के दोनों बेटे परिवार के साथ आ गए। और भी कई रिश्तेदार आ पहुंचे।
अगली दोपहर बिलासी एक बजे दरवाजे पर खड़ा था। उसे देखते ही बच्चों ने घेर लिया। सब एक साथ पूछने लगे-क्या हुआ था दादी को?’
बिलासी ने सब-कुछ बता दिया। ‘‘और बाबा?’’ रजत ने पूछा थ।
जवाब देने से पहले कुछ देर चुप रहा बिलासी। रजत ने देखा उसकी आंखें डबडबा आई थीं। रुंधे गले से बोला, ‘‘बाबू तो एकदम चुप हो गए हैं। किसी से कुछ नहीं बोलते।’’
‘‘खाना खाते हैं?’’ अणिमा ने पूछा।
बिलासी ने सिर हिला दिया। बोला, ‘‘सबके कहने पर थाली के सामने बैठ जरूर जाते हैं, पर खाते कुछ नहीं। अनछुई थाली मैं ही तो उठाता हूं। पता नहीं क्या होगा अब?’’
उस शाम रजत ने अपने साथियों को बुलाया और कहा, ‘‘हमें एक बार बाबा के पास जरूर जाना चाहिए।’’
‘‘मैं कैसे बात करूंगी उनसे? मुझे तो एकदम रोना आ जाएगा!’’ तरला बोली।
‘‘तुमने सुना, बिलासी क्या कह रहा था, बाबा ने खाना-पीना छोड़ दिया है। दादी के सिवा उनका था ही कौन?’’
शाम को रजत और बच्चे डरते-डरते सीढि़यां चढ़कर ऊपर पहुंचे। घर में काफी लोग थे, पर बाबा कहीं नजर नहीं आए। बच्चे कुछ देर झिझकते से खड़े रहे, फिर नीचे उतर आए।
तेरहवीं की शाम को सब मेहमान चले गए। अजयसिंह के बेटे श्यामल और सुरेश ने पिता से कहा, ‘‘अब यहां क्या है आपका? हमारे साथ चलते क्यों नहीं?’’
अजयसिंह ने कहा, ‘‘सोचकर बताऊंगा।’’
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बेटे पिता का उत्तर समझ गए और दो दिन बाद वे दोनों अमरीका वापस चले गए। अब अजयसिंह अकेले रह गए थे।
रजत बिलासी से उनके बारे में पूछता रहता था। खुद बिलासी ही आकर बता जाता था कि ‘‘आज बाबू ने चाय नहीं पी, खाना भी नहीं खाया। रात को जब-जब आंख खुली तो उन्हें कमरे में अम्माजी की तस्वीर के सामने खड़े पाया, जैसे उनसे बात कर रहे हों।’’
स्कूल बस सुबह बच्चों को ले जाती थी, दोपहर में ठीक समय पर छोड़ जाती थी। एक दिन रजत ने अणिमा से कहा, ‘‘ऐसे कैसे रहेंगे बाबा? न खाते हैं, न बोलते हैं। और तो और हमसे भी बात नहीं करते!’’
‘‘हां, पहले तो दादी के साथ दोपहर में रोज आकर खड़े होते थे बाहर,’’ तरला बोली।
एक सुबह बस बच्चों को लेकर ग्लोरी अपार्टमेंट्स से चली तो रजत ने चिल्लाकर कहा, ‘‘मैंने बाबा को देखा था। दरवाजे से दूर एक खंभे के पीछे खड़े हुए थे। वहां क्या कर रहे थे वह?’’
‘‘बाबा! भला वहां इस तरह छिपकर क्या करेंगे! कोई और होगा!’’ अपर्णा बोली।
रजत ने कहा, ‘‘मैं क्या बाबा को पहचानता नहीं जो धोखा खा जाऊं! मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि जिन्हें मैंने खंभे की ओट में खड़े हुए देखा था, वह हमारे बाबा ही थे।’’    
बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी। उस दिन स्कूल की आधी छुट्टी  में भी इसी बात पर चर्चा होती रही।
‘‘बाबा को भला छिपकर खड़े होने की क्या जरूरत है? क्या वह आकर दरवाजे पर खड़े नहीं हो सकते?’’ अनामिका ने रजत से कहा।
‘‘हमसे बात क्यों नहीं करते?’’ रमेश बोला।
‘‘अगर यह बात है तो हमने ही उनसे कब बात की है। वह अकेले हो गए हैं, परेशान हैं। हम ही उनके पास कितनी बार गए?’’ रजत ने कहा। उसका गुस्सा सबके साथ-साथ खुद पर भी था।
दोपहर में बस दरवाजे पर रुकी। रजत की तेज नजर ने बाबा को खंभे की आड़ में खड़े देख लिया था।
अजयसिंह सुबह बच्चों को स्कूल जाते समय और दोपहर में लौटते समय खंभे की ओट में छिपकर देखा करते थे।
अगली सुबह बस घुरघुराती हुई चली गई। खंभे के पीछे खड़े अजयसिंह अंदर जाने के लिए मुड़े तो सब बच्चे उनके सामने मौजूद थे, एकटक देखते हुए। बच्चे स्कूल गए ही नहीं थे।
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अजयसिंह हड़बड़ा गए। इधर-उधर देखने लगे।
‘‘आज हमने चोरी पकड़ ली।’’ रजत ने रमेश की तरफ मुड़कर कहा।
‘‘हम भी तो कहें कि हमें छिपकर कौन देखता है, सामने क्यों नहीं आता?’’ अपर्णा बोली।
‘‘चोरी!’’ अजयसिंह के मुंह से बस एक ही शब्द निकल सका। वह कुछ समझ नहीं पा रहे।
‘‘हां, चोर,आप क्यों देखते हैं हमें यों छिपकर?’’
‘‘मैं तो बस...’’ अजयसिंह ने कहना चाहा फिर बोले,‘‘लेकिन तुम सब आज स्कूल क्यो नहीं गए? बस तो चली भी गई। क्या बात है?
‘‘आपको पकड़ने के लिए ही हमने यह योजना बनाई थी, बाबा!’’ रजत ने कहा।
‘‘हां, आप दादी की तरह मेन गेट पर भी तो खड़े हो सकते हैं। यह लुका-छिपी क्यों?’’ अनामिका कह रही थी।
‘‘दादी की तरह...?’’ अजयसिंह की आंखों से आंसू बह चले।
बच्चे उन्हें घेरकर खड़े हो गए। ‘‘बाबा, आप रोते क्यों हैं?’’ नन्हे संतोष ने कहा और उनका हाथ पकड़कर हिलाने लगा। अजयसिंह ने उसे गोद में उठा लिया, उसका सिर सहलाने लगे।
उन पर एक के बाद दूसरा सवाल बरस रहा था। रजत ने कहा, ‘‘हमें पता है आप सुबह चाय भी नहीं पीते। रात को कमरे में घूमते रहते हैं...क्यों?’’ बाबा हैरान! बच्चे सच कह रहे हैं कि चाय छोड़ दी, खाने का मन नहीं करता और रात में नींद भी नहीं आती। पर बच्चों को यह सब कैसे पता? उन्हें क्या मालूम था कि बिलासी उनकी पूरी दिनचर्या का हिसाब बच्चों को बता देता था।
संतोष उनकी गोद में था। बाकी सब उन्हें घेरकर फ्लैट की तरफ ले चले। अजयसिंह रह-रहकर इतना भर कह उठते, ‘‘अरे यह क्या...रुको, ठहरो तो सही।’’
कुछ देर बाद दादी की चिडि़यों की टोली बाबा अजयसिंह के साथ बड़े कमरे में बैठी चहचहा रही थी, जहां दादी की हंसती हुई तस्वीर लगी थी।
थोड़ी देर में अपर्णा अपनी सहेलियों के साथ चाय व नाश्ता बाबा के सामने ले आई।
‘‘और तुम लोग?’’ बाबा ने पूछा।
‘‘अब दादी तो हैं नहीं जो हमें मिठाई खिलाएं। आपको मिठाई बनानी नहीं आती तो...चाकलेट और टाफियां ही दे दीजिए हमें, लेकिन रोज देनी होंगी।’’ रजत मुस्करा रहा था।
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‘‘कौन कहता है कि मैं मिठाई बनाना नहीं जानता कुछ मिठाइयां तो तुम्हारी दादी को मैंने ही सिखाई थी,’’ कहकर बाबा हंस पड़े।
‘‘तो बनाकर खिलाइए। तभी आपकी बात पर विश्वास होगा।’’ अपर्णा ने कहा।
रजत बोला, ‘‘बाबा, आपको परीक्षा में पास होकर दिखाना होगा। दादी की तरह हर रोज हमारे लिए मिठाई का जुगाड़ करना होगा आपको।’’
बिलासी एक तरफ खड़ा मुस्कराते हुए कह रहा था, ‘‘मैं भी तो जानता हूं, मिठाई बनाना।’’
चिडि़यों की टोली चहचहा रही थी। रजत बोला, ‘‘बाबा, आप सुबह उठते ही चाय पीकर हमें स्कूल के लिए छोड़ने बाहर आएंगे।’’ अपर्णा बोली, ‘‘दिन में सही समय पर नाश्ता करेंगे।’’ संतोष बोला, ‘‘दोपहर में आप हमें दादी की तरह सोसायटी के दरवाजे पर मिलेंगे।’’ अणिमा बोली,‘‘दोपहर का भोजन हमारे साथ करेंगे आप।’’
‘‘और हां, इस तरह खंभे के पीछे छिपकर नहीं देखेंगे।’’ रजत बोला।
बच्चों की बातें सुन अजयसिंह जोर से हंस पड़े-शायद बहुत दिन बाद पहली बार. “ ठीक है, अब ऐसी गलती नहीं होगी।’’
‘‘बाबा मान गए...’’ शोर मचाते, धम-धम करते बच्चे नीचे उतर गए।
अगली दोपहर स्कूल बस आकर रुकी तो बस का दरवाजा बाबा ने खोला। चिडि़यों की टोली चहचहा रही थी, ‘‘रात का खाना खाया? नींद ठीक से आई?’’
बाबा मुस्करा उठे, उन्होंने जवाब देने के बाद सवाल दाग दिए, ‘‘नाश्ता किया? होमवर्क मिला? डांट तो नहीं खाई?’’
हर बच्चे को लिफाफा थमाते समय बाबा यह कहना नहीं भूले, ‘‘मिठाई मैंने अपने हाथों से बनाई है। बिलासी ने मेरी कोई मदद नहीं की।’’
दादी गई नहीं थी, बाबा में लौट आई थीं। ( समाप्त )
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