Thursday, 7 January 2016

बाल कहानी : पीपलवाला चबूतरा

                                                               पीपल वाला चबूतरा


सब चुप हैं। उदास हैं। अजय के पापा रमेश का  ट्रांसफ़र हुआ है। उनके परिवार में चार लोग हैं। रमेश, उनकी पत्नी छाया, रमेश के पिता रामचंद्र और अजय – रमेश का इकलौता बेटा। पुराना शहर छोड़्कर नई जगह आने में उलझन होती है। नए-पुराने दोस्त छूट जाते हैं। मन में डर रहता है कि नई जगह पता नहीं कैसी हो।
      रामचंद्र खिड़की में खड़े बाहर देख रहे हैं। रमेश बंद डिब्बों को खोलने मे लगे हैं, छाया रसोई में चाय-नाश्ता तैयार कर रही है। अजय का एडमीशन पहले ही हो चुका है। उसे दो दिन बाद से स्कूल जाना है। अजय को कुछ काम नहीं है। वह खामोश बैठा गेंद को बार-बार दीवार से टकरा कर उछाल रहा है।
      तभी छाया नाश्ता लेकर आ गई। उसने पूछा –’बाबूजी कहां गए?’
      अब रमेश ने भी इधर-उधर नज़र दौड़ाई। बोले – ’अरे हां, अभी तो खिड़की से बाहर देख रहे थे। पता नहीं, कहां चले गए।
      ’कहीं रास्ता न भटक जाएं। अभी दो दिन ही तो हुए हैं हमें आए हुए।’ छाया ने परेशान स्वर में कहा। रमेश हंस पड़े। बोले – ’बाबूजी पुराने जमाने के नहीं,  के हैं। जेब में मोबाइल रखते हैं। रास्ता भूलने का सवाल ही नहीं। चिंता न करो।’ और सच कुछ देर बाद रामचंद्र लौट आए।
      रमेश ने पूछा –’कहां चले गए थे बाबूजी? आपकी चाय भी ठंडी हो गई.’
      ’मैं दोबारा बना देती हूं।’ छाया ने कहा।
      ’मैं तो बस छाया के काम से गया था।’ रामचंद्र बोले।
      ’मेरे काम से...पर मैं...’ छाया ने आश्चर्य भरी नज़र से बाबूजी को देखा।
      रामचंद्र हंस पड़े। बोले –’घर तुम्हारा है तो काम भी तुम्हारे ही हुए। मैं बस्ती में घूम-फ़िर आया हूं। देख लिया है – दूध की डेयरी कहां है, केमिस्ट और डाक्टर को भी देख लिया। एक सब्जी वाला है, उसके पास खूब भीड़ थी। यानी उससे सब्जी लेना लोग पसंद करते हैं। और भी बहुत कुछ देख लिया। आगे मोड़ पर एक पीपल का पेड़ है। उसे घेर कर सफ़ेद पत्थर का एक चबूतरा बनाया गया है। मैं सोच रहा हूँ कि उसका क्या इस्तेमाल हो सकता है। पर अभी तो वहां कई लोग ताश खेल रहे थे।‘
      ’और क्या देखा आपने?’ अजय ने पूछा।
      ’देखा, ढूँढा पर नहीं मिली।’ रामचंद्र बोले।
      ’क्या नहीं मिली बाबूजी?’ रमेश ने पूछा।
      ‘यही कि बाजार में स्टेशनरी की कई दुकाने हैं, पर किताबों की एक भी नहीं।‘ रामचंद्र ने कहा।
      रामचंद्र चाय पीने लगे। फ़िर खुद बोल उठे –‘चबूतरा बैठने की अच्छी जगह है।’
      ’तो क्या आप अब बाजार में चबूतरे पर जाकर बैठा करेंगे?’ अजय बोला।
      ’अरे नहीं, नहीं..लेकिन...बाबूजी ने बात अधूरी छोड़ दी और अखबार उलटने लगे।
      अगली सुबह इतवार था। रमेश और छाया डिब्बों को खोल-खोलकर सामान लगाते जा रहे थे। तभी बाबूजी ने अजय से कहा ‘–हमें तो यहां कुछ काम नहीं, आओ घूमने चलें।’ आकाश में बादल घिरे थे। धीमी हवा बह रही थी। पहले बाबूजी ने अजय को वह सब दिखाया जो कुछ वह पिछ्ली शाम खुद देखकर आए थे। फ़िर अजय के साथ पीपल वाले चबूतरे पर जा पहुंचे। अजय ने देखा सफ़ेद पत्थरों का चबूतरा अच्छा लग रहा था। सड़क पर ट्रैफ़िक था, पर चबूतरा सड़क से थोड़ा हटकर बना था।
      बाबूजी ने कंधे पर लटके झोले से कपड़ा निकाला और एक जगह धूल साफ़ करके बैठ गए। अजय खड़ा रहा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसी जगह चुनी है बाबूजी ने। बाबूजी ने बताया था कि वहां लोग ताश खेलते थे, पर आज तो वहां बस कबूतर फ़ुदक रहे थे।
      ’अजय!’ बाबूजी ने आवाज दी तो अजय ने मुड़्कर देखा –’अरे यह क्या!’ चबूतरे पर कुछ किताबें, पत्रिकाएं और दो अखबार रखे थे। ‘यह सब कहां से आया?’ अजय ने अचरज से पूछा।
      ’और कहां से आएगा यह सब? मैं घर से लाया हूं। मैंने कहा था न कि पीपल वाला चबूतरा अच्छी जगह है। एक तरफ़ कबूतर, दूसरी तरफ़ किताबें – है न बढिया मेल.’  कह कर बाबूजी हंस दिए। जब बाबूजी बात कर रहे तो दो जने आकर खड़े हो गए। एक ने उनसे  पूछा –क्या ये बिक्री के लिए हैं?’
      ’नहीं, पढने के लिए।’ बाबूजी ने कहा –’आओ बैठो, पढो!’
      वे दोनों बैठकर किताबें उलटने-पलटने लगे, फ़िर एक-एक पत्रिका उठाकर पढ़ने लगे। पत्रिकाएं पुरानी थीं। इन्हें रामचंद्र अपने साथ पुराने शहर से लाए थे।
      अजय खड़ा-खड़ा देख रहा था। अब वहां दो नहीं-तीन-चार लोग आ बैठे थे। तभी अजय ने एक लड़के को देखा। वह पढ़ नहीं रहा था, बस देख रहा था। एकाएक उसने एक किताब उठाई और तीर की तरह भाग गया।
      बाबूजी, चोर!...’ अजय ने रुंधे गले से कहा।
      ’कहां...किधर...’ बाबूजी ने पूछा। अजय ने बताना चाहा, पर किताबें ले भागने वाला छोकरा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
      चबूतरे से कुछ दूर पुलिस का बीट-बाक्स बना था। उसमें से एक सिपाही निकल कर आया। उसने अजय के मुंह से निकला ’चोर’ शब्द शायद सुन लिया था। बोला –’यहां हर तरह के लोग घूमते हैं। क्या ले गया चोर?’ उसने पूछा।
      ’जी, एक किताब!’
      सिपाही हंस पड़ा। ’किताब बेचने से उसे एक-दो रुपए से ज्यादा मिलने वाले नहीं।’
      ’हो सकता है, वह किताब पढ़ना चाहता हो इसीलिए...’ बाबूजी अब भी किताब ले भागने वाले छोकरे को चोर नहीं कह रहे थे।
      अगर उसे किताब पढ़नी होती तो वह यहीं बैठकर पढ़ता..इस तरह लेकर क्यों भागा?’ अजय ने कहा। उसका मन दुखी हो रहा था। वह सोच रहा था –’आखिर बाबूजी को यह क्या सूझा कि यहां किताबें फ़ैलाकर बैठ गए।‘
      सिपाही बाबूजी से बात करते-करते एक किताब उठाकर पढने लगा। बोला –’मैं सारा दिन यहां ड्यूटी देता हूं। चबूतरे पर ताश का अड्डा जमाने वालों को खदेड़ता रहता हूं। कभी-कभी कुछ पढ़ने का  मन करता है, पर यहां कोई किताब या पत्रिका की दुकान है ही नहीं।’
      ’सिपाही अंकल, क्या आप किताब चोर को पकड़ लेंगे? अजय ने पूछा।
      ’हां, बेटा क्यों नहीं। हम सामान चुराने वालों को पकड़्ते हैं तो किताब चोर को क्यों नहीं’, कहकर वह हंस पड़ा।
      धीरे-धीरे शाम ढल चली। पेड़ के नीचे धुंधलका-सा छाने लगा। बाबूजी किताबें समेट कर थैले में डालने लगे , फ़िर कुछ देख कर रुक गए। अभी एक आदमी चबूतरे पर बैठा किताब पढ़ने में मगन था।
      बाबूजी ने उससे पूछा –’क्या आपको किताब अच्छी लगी?’
      ’जी बहुत अच्छी! छोड़ने का मन नहीं है, लेकिन आपको जाना है न’, उस आदमी ने बाबूजी की ओर किताब बढ़ाते हुए कहा।
      ’आप इसे घर ले जाकर आराम से पढ़ें। कल वापिस ले आएं। तब तक मैं और किताबें भी ले आऊंगा।’ बाबूजी ने कहा तो वह आदमी हंस पड़ा। बोला –’क्या सच मैं इस किताब को घर ले जा सकता हूं?’  जैसे उसे बाबूजी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था .
      बाबूजी ने बाकी किताबें भी थैले में रख लीं। उससे बोले-’ जरूर ले जा सकते हैं...’
      सिपाही बीट बाक्स के बाहर खड़ा था। उसने हंसकर बाबूजी से पूछा –’क्या कल भी आप किताबें लेकर आएंगे?’
      ’हां, लाऊंगा।’ बाबूजी ने कहा – ’आपको संदेह क्यों हो रहा है?’
      ’इसलिए कि एक लड़का किताब उठाकर भाग गया।’ सिपाही ने कहा।
      ’यह सब तो होता ही रहता है। पुस्तकालयों से भी किताबें चोरी होती हैं। लोग अच्छी महंगी पुस्तकें लेकर बैठ जाते हैं। वापस नहीं करते। लेकिन ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। ज्यादातर लोग तो किताबें पढकर सही सलामत लौटा देते हैं। क्या थोड़े-से पुस्तक चोरों के कारण लायब्रेरियों को बंद कर देना चाहिए?’
      जी कभी नहीं।’ सिपाही बोला।
      अजय से रहा नहीं गया। उसने कहा –’लेकिन आपने उस आदमी का नाम-पता तो पूछा ही नहीं जो किताब अपने घर ले गया है।’
      ’हां, पूछना तो चाहिए था, पर अगर वह किताबें पढ़्ने का शौकीन है तो नई किताबें लेने के लिए कल जरूर आएगा।’ बाबूजी बोले।
      ’अगर नहीं आया तो...?.’ अजय पूछ रहा था।
      ’हो सकता है न आए। तब उसे किताबों से दूर रहना पडेगा जो शायद उसे पसंद न आए। इसीलिए कह रहा हूं कि वह आएगा।’ बाबूजी हंसकर बोले|
      ’तो क्या आप रोज इसी तरह किताबें चबूतरे पर रखा करेंगे लोगों के पढ़ने के लिए?’   रामचंद्र ने कहा  –’तुमने देखा सड़क पर कितनी भीड़ है। कितने ठेले-खोमचे वाले हैं। लोग उनसे पैसे देकर चीजें खरीदते हैं, पर हमें तो कुछ नहीं चाहिए। हम तो बस किताबों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। शायद यह बात पढ़ने वालों और किताबों को अच्छी लगे।’
      किताबों को ....’ अजय चौंक पड़ा।‘ क्या किताबें भी मेरी और आपकी तरह होती हैं?’
      ’होती तो हैं अगर कोई उनकी बात सुनना-समझना चाहे।’ कहकर बाबूजी फिर से हंस दिए। बोले-’किताबें मुझसे कहती हैं, हमें बंद अलमारी की कैद से बाहर निकालो।’
      ’क्या सच?’ अजय पूछ रहा था। 
      बाबूजी मुस्करा रहे थे।

Wednesday, 30 December 2015

बाल कहानी : दीवार


                                                                          दीवार


रेखा ने कॉल बेल बजा दी फिर दरवाज़ा खुलने का इन्तजार करती हुई इधर- उधर देखने लगी, दरवाजे के ठीक सामने वाली दीवार पर एक चित्र बना दिखाई दिया, किसी ने वहां नीली पेंसिल से दो आँखें बना दी थीं. तभी दरवाज़ा खुल गया और रेखा अंदर चली गई. रेखा वहां सफाई का काम करती है. काम करते हुए वही चित्र आँखों के सामने घूमता रहा. उसकी बेटी प्रिया दूसरी क्लास में पढ़ती है. वह बहुत अच्छी ड्राइंग बनाती है. रेखा सोच रही थी_ क्या प्रिया भी ऐसी सुंदर ड्राइंग बना सकती है. घर की मालकिन का नाम प्रेमा है.
अगले दिन रविवार था.रेखा बेटी को भी अपने साथ ले आई. उसे आँखों के चित्र के पास  सीढ़ी पर बैठा दिया. कहा- -‘स्लेट पर चाक से ऐसा ही सुंदर चित्र बना.’ फिर काम करने अंदर चली गई. कुछ देर बाद उसे प्रेमाजी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी. उसने बाहर निकल कर देखा प्रेमाजी प्रिया को डांट रही हैं- ‘ अरे तूने तो सारी दीवार गन्दी कर दी.’ प्रिया ने आँखों के चित्र के पास एक आदमी का चित्र बना दिया था. उसे एक बैसाखी के सहारे खड़ा दिखाया गया था. रेखा ने प्रिया के गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया और बोली-’ अरे यह क्या कर डाला. मैने तो स्लेट पर बनाने को कहा था,दीवार पर क्यों बना दिया.’  बेटी रोते हुए बोली-‘ स्लेट पर मिट जाता है.’
उसी समय अंदर से प्रेमा का बेटा अनुज बाहर निकल आया. वह स्कूल में ड्राइंग का अध्यापक है. उसने दीवार पर बने चित्रों को देखा - ‘ अरे वाह ! सुंदर. किसने बनाए हैं ये चित्र.’ तब तक प्रेमा अंदर चली गई थी.रेखा ने अनुज को पूरी बात बता दी. वह मुस्कराया और प्रिया का हाथ थाम कर अंदर ले गया. उसे बैठा कर उसके सामने ड्राइंग की शीट और रंगों वाली पेंसिलों का डिब्बा रख कर बोला -‘ प्रिया, आराम से ड्राइंग बंनाओ .’ कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया.रेखा भी काम में लग गई. प्रिया शीट पर ड्राइंग बनाने में जुट  गई.
कुछ देर बाद अनुज ने आकर देखा - प्रिया ने ड्राइंग शीट पर बैसाखी वाले आदमी का चित्र बना दिया था. एकदम वैसा जैसा बाहर दीवार पर बनाया था. वह कुछ समझ न सका ...आखिर उसने रेखा को बुला कर पूछा तो बोली –‘ पिछले साल इसके पिताजी का एक्सीडेंट हो गया था, उस कारण उनका एक पैर घुटने के नीचे काटना पड़ा था, प्रिया जब भी उन्हें बैसाखी के सहारे चलते हुए देखती है तो रोने लगती है. मैंने इसे कई बार समझाया है कि पिता का वैसा चित्र न बनाया करे पर यह सुनती ही नहीं. ‘ अनुज चुप रहा.वह वह कुछ सोच रहा था.
अगले दिन रेखा काम पर आई तो अनुज घर में मौजूद था. उसने रेखा को एक कागज़ दिया. उस पर एक पता लिखा था. उसने कहा-‘ तुम अपने पति को लेकर इनके पास जाना. वहां जाकर तुम्हें सब पता चल जाएगा. ‘ उस कागज पर एक संस्था का पता लिखा था, जहां अंगहीनों को कृत्रिम अंग लगाए जाते थे.
दो दिन बाद रेखा काम पर आई तो बहुत खुश लग रही थी, प्रेमा ने पूछा-‘ क्या कोई खज़ाना मिल गया है जो इतनी खुश लग रही है.’ पर रेखा ने कुछ न कहा. वह प्रेमा का स्वभाव  अच्छी तरह जानती थी. वैसे भी अनुज ने अभी किसी को भी कुछ बताने से मना किया था. अगले दिन रेखा उस संस्था में गई तो अनुज भी वहां मौजूद था. डॉक्टर ने रेखा के पति की  अच्छी तरह जांच की.  तभी रेखा ने अनुज से कहा-‘ आपसे कुछ कहना है.’ अनुज ने हंस कर कहा-‘ तुम्हे कुछ कहने की जरुरत नहीं है. इसका पूरा खर्च संस्था और मैं मिल कर उठाएंगे. ‘ रेखा के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गई.
संस्था में रेखा अपने पति के साथ कई दिनों तक जाती रही, इस बीच वह काम पर  नहीं आ सकी. प्रेमा जी से उसने बीमार होने का बहाना बनाया था. और फिर एक रविवार के दिन वह बेटी के साथ काम पर आई तो उसके पोर पोर से हंसी फूट रही थी. अनुज ने प्रिया से कहा-‘ ,आज तुम्हे अपने पापा का नहीं , फूलों का चित्र बनाना है,’ और उसने सामने रखे गमले की ओर संकेत किया जिसमें फूल मुस्करा रहे थे. प्रिया हंस कर फूलों की ड्राइंग बनाने लगी. लेकिन अनुज को पता नहीं था कि फ्लैट में आने से पहले उसने दीवार पर बने पिता के रेखा चित्र में कुछ परिवर्तन कर दिया था. अब चित्र में बैसाखी कहीं नज़र नहीं आ रही थी. उसमे दिखाई देता आदमी अपने दोनों पैरों पर खड़ा था.
बाद में जब प्रेमाजी ने दीवार को दोबारा पेंट करवाने की बात कही तो अनुज ने मना कर दिया. उसने कहा-‘ मां , यह दीवार अब सदा ऐसे ही रहेगी . इन दो चित्रों के पास मैं भी ड्राइंग किया करूंगा. ‘ बात प्रेमाजी की समझ में नहीं आ रही थी. पर जिन्हे समझना था वह जान चुके थे. हाँ, यह पता नहीं चल सका कि दो आँखों का चित्र किसने बनाया था. ( समाप्त )                                 

बाल कहानी : मेरा बस्ता





                                                                    
                                                                      मेरा बस्ता
                                                                     


विनोद और अजय कूड़ा घर में काम कर रहे हैं. दोनों दोस्त हैं. यह दोस्ती किसी स्कूल में नहीं एक कूड़ा घर में शुरू हुई है. दोनों के परिवार नगर के बाहरी हिस्से में एक गन्दी बस्ती में रहते हैं. दोनों के पिता भी कूड़ा घरों में कागज तथा ऐसी चीजें बटोरते हैं जिन्हें कबाड़ वाले को बेच कर कुछ पैसा जुटाया जा सके. यह सिलसिला काफी दिनों से इसी तरह चलता आ रहा है. बाप बेटा बड़े –बड़े बोरे लेकर सुबह मुंह अँधेरे घर से निकल पड़ते हैं. विनोद की मां भी कुछ  घरों में जाकर काम करती है . तब जाकर परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ हो पाता है.
अजय ने देखा कि विनोद कूड़े में से कुछ चुन कर एक फटे बस्ते में डालता जा रहा है. उसने पूछा तो विनोद टाल गया, पर अजय ने बस्ते की तलाशी ले ही डाली. उसमे थी मनकों की एक माला ,एक लाल रिबन, हेयर पिन का एक पत्ता और एक फटी हुई किताब. अजय ने पूछा –  ‘’तो स्कूल की तैयारी है?’’  विनोद ने कहा कि बहन माँ से रिबन के लिए पैसे मांग रही थी और माँ मनकों की माला चाहती है. फिर उसने बस्ते को पास खड़ी वैन के हैंडल से लटका दिया और काम में जुट गया. कुछ देर बाद जो वैन की तरफ देखा तो सन्न रह गया. वैन वहां नहीं थी. ‘अरे वैन कहाँ चली गई? ‘ सोचने लगा- अब माँ से क्या कहेगा, मन उदास हो गया. कुछ देर चुप बैठा रहा फिर काम में लग गया. शाम को घर गया तो चुप चुप था. कहता भी क्या. रात में नींद नहीं आई पर सुबह रोज के समय पर पिता के साथ बोरा लेकर निकल पड़ा. कूड़ाघर में उसके हाथ काम कर रहे थे पर आँखें उधर ही लगी थीं जहाँ कल वैन खड़ी थी. कुछ देर बाद उसने वैन को आते देखा. वह तुरंत उस तरफ भाग चला. वैन के रुकते ही उसने ड्राइवर से कहा -‘ कल आप मेरा बस्ता अपने साथ क्यों ले गए.’
ड्राइवर वैन से बाहर निकला और विनोद को देख कर बोला -- ‘ तो तुम्हारा है वह बैग ?’
‘ हाँ, मेरा है वह बस्ता.’- विनोद बोला.
‘मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था,’- ड्राइवर ने कहा. ‘ घर जाकर देखा तो एक फटा बस्ता हैंडल से लटक रहा था.
‘ लाओ मेरा बस्ता दो मुझे.’ – विनोद बोला.
‘ वह तो घर पर है. आओ मेरे साथ चलो. ‘ – कह कर ड्राइवर ने वैन का दरवाज़ा खोल दिया. विनोद को कुछ डर लगा. क्या इस अनजान आदमी के साथ जाना ठीक होगा? उसने  सोचा लेकिन फिर अजय का हाथ थाम कर वैन में बैठ गया. कुछ देर बाद वैन एक मकान के सामने रुक गई. दोनों ड्राइवर के पीछे अंदर चले गए. दरवाज़े से होकर आँगन में पंहुंचे . विनोद और अजय ने देखा कि वहां कई बच्चे पढ़ रहे थे. ‘ क्या यह स्कूल है?’ विनोद ने अजय से पूछा  जवाब उसने दिया जो दोनों को वहां लेकर आया था-‘ हाँ, यह स्कूल ही है. तुम चाहो तो पढ़ सकते हो यहाँ.’’
‘’ लेकिन हम...’’ विनोद  आगे कुछ नहीं कह सका .
‘’ हाँ तुम दोनों इन बच्चों जैसे हो और ये सब भी तुम जैसे हैं. पहले ये भी तुम्हारी तरह कूड़ा घरों में काम करते थे . पर अब उस तरफ झांकते भी नहीं. ‘’ कह कर उसने अपना परिचय दिया. उसका नाम रमन था . वह एक संस्था चलाता था.  कूड़ा घरों में काम करने वाले बच्चों को उस गंदगी से हटा कर उनकी पढाई का इंतजाम करता था,
विनोद और अजय पढ़ते हुए साफ़ सुथरे बच्चों को एकटक देखते रहे. दोनों एक ही बात सोच रहे थे – क्या हम भी इन जैसे बन सकते हैं? अपने गंदे हाथ पैरों और मैले कपड़ों पर लज्जा आ रही थी.
रमन उनके मन की बात जान गया. पत्नी निशि से कहा तो वह उन दोनों को बाथ रूम में ले गई. कहा-‘ तुम हाथ मुंह साफ़ कर लो . में तुम्हारे बदलने के लिए कपडे ले आती हूँ. ‘’ निशि ने अजय और विनोद को अपने बेटे श्याम के कपडे ला दिए और कहा-‘ ये शायद कुछ बड़े हैं तुम दोनों के लिए , बस आज भर की बात है. ‘’ अजय और विनोद ने कपडे बदल लिए . अब उन्हें अच्छा लग रहा था. रमन ने कहा-‘ आओ अब चाय पीते हैं ,फिर तुम्हें घर छोड़ आऊंगा.’’ दोनों ने निशि और रमन के साथ बैठ कर चाय पी. ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी ने उनके साथ इतना अच्छा व्यवहार किया था.
रमन दोनों को वैन में बैठा कर उनके घर जा पंहुंचा . विनोद और अजय के घर पास पास थे. दोनों के माता पिता अजय और विनोद के इस तरह बिन कहे काम को बीच में छोड़ कर चले जाने से परेशान थे. दोनों के लौट आने से उन्हें तसल्ली हो गई. पर उन्हें नए कपड़ों में और साफ़ सुथरा देख कर हैरान रह गए. रमन ने कहा-.’ हैरान न हों. इन दोनों का कायाकल्प हो गया है. अब आप लोगों की बारी है.’’ और फिर उसने पूरी बात विस्तार से समझा दी.
विनोद्  के पिता ने कहा –‘’ आपकी बात तो ठीक है पर हमारा घर कैसे चलेगा?’’
‘’ उसका इंतजाम भी हो जाएगा .’’ रमन ने कहा. फिर दोनों परिवारों से वैन



‘में बैठने को कहा. रमन दोनों परिवारों को एक नई जगह ले गया. वहां एक बड़े कमरे में कई स्त्री पुरुष काम में जुटे थे . दो औरतें सिलाई मशीनों पर काम कर रहीं थीं. फर्श पर बैठे कई लोग तरह तरह की चीजें बना रहे थे. एक आदमी लकड़ी के खिलौने पर पॉलिश कर रहा था . विनोद का पिता उसके पास बैठ गया और ध्यान से कुछ देर देखता रहा फिर रमन से बोला – ‘’मेरे बापू लकड़ी के बहुत अच्छे खिलौने बनाया करते थे. पूरे गाँव में मशहूर था उनका नाम.   उनकी मौत के बाद मैं शहर चला आया फिर कब कूड़ा घर में पहुँच गया पता ही न चला.’’
‘’ आप फिर से शुरू कर  सकते हैं.’’-रमन  बोला.
विनोद की माँ ने कहा-‘’ सिलाई तो मुझे भी आती है पर मशीन खरीदने के पैसे कभी न जुटे.’’
रमण ने कहा –‘यहाँ  सब इंतजाम है. आप अपना मनचाहा काम कर सकती हैं.’’
‘’लेकिन सारा दिन तो कूड़ाघर में बीत जाता है. ‘’- अजय के पिता ने कहा.
‘’ लेकिन कूड़ा घर में तो अब जाना नहीं है. न आप लोगों को और न आप के बच्चों को’. आप लोग यहाँ काम करेंगे और बच्चे हमारे पास पढाई .’’-  रमन बोला. ‘’ आप चारों यहाँ ट्रेनिंग लेंगे और फिर काम शुरू होगा.’’
अजय और विनोद के माता पिता को रमन ने अच्छी तरह समझा दिया. वे चारों सारा दिन वहीँ रहकर लोगों को काम करते देखते और सीखते रहे. शाम को रमन ने दोनों परिवारों को कुछ पैसे दिए तो वे बोले –‘’ हमने तो कुछ किया ही नहीं.’’ तब रमन ने कहा –‘’ आप लोग रोज कमाते हैं तब घर में रोटी बनती है. आज तो कुछ कमाया नहीं. मैं तो थोड़े ही पैसे दे रहा हूँ. जब ट्रेनिंग के बाद काम शुरू कर देंगे तो ज्यादा मिलने लगेंगे.’ फिर उन्हें बताया कि बाज़ार में उनकी संस्था की एक दुकान है जहाँ इन सामानों को बेचा जाता है. ‘’ हम खरीदारों                             
 को बतलाते हैं कि इन चीजों को किन लोगों ने बनाया है. तब वे जरूर लेते हैं’’
इसके बाद रमन उन को अपने घर ले गया. पत्नी निशि से मिलवाया. निशि ने कहा-‘’ आप लोग बच्चों की चिंता न करें. हम बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर रहे हैं. बाद में उन्हें स्कूल में दाखिल करवा देंगे. लेकिन एक शर्त है कि आप लोग या आपके बच्चे फिर कभी कूड़ा घर में काम नहीं करेंगे.’’
‘’ कभी नहीं.’’- उन चारों ने एक साथ कहा . उस रात विनोद और अजय के घर में किसी को नींद नहीं आयी; उन्हें कूड़े के दानव से मुक्ति मिल गई थी. ( समाप्त )