Tuesday, 21 April 2020

पीपल वाला चबूतरा-कहानी-देवेन्द्र कुमार


पीपल वाला चबूतरा—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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सब चुप हैं। उदास हैं। अजय के पापा रमेश का  ट्रांसफ़र हुआ है। उनके परिवार में चार लोग हैं। रमेश, उनकी पत्नी छाया, रमेश के पिता रामचंद्र और अजय – रमेश का इकलौता बेटा। पुराना शहर छोड़्कर नई जगह आने में उलझन होती है। नए-पुराने दोस्त छूट जाते हैं। मन में डर रहता है कि नई जगह पता नहीं कैसी हो।
      रामचंद्र खिड़की में खड़े बाहर देख रहे हैं। रमेश बंद डिब्बों को खोलने में लगे हैं, छाया रसोई में चाय-नाश्ता तैयार कर रही है। अजय का एडमीशन पहले ही हो चुका है। उसे दो दिन बाद से स्कूल जाना है। अजय को कुछ काम नहीं है। वह खामोश बैठा गेंद को बार-बार दीवार से टकरा कर उछाल रहा है।
      तभी छाया नाश्ता लेकर आ गई। उसने पूछा –‘बाबूजी कहां गए?’
      अब रमेश ने भी इधर-उधर नज़र दौड़ाई। बोले—‘अरे हां, अभी तो खिड़की से बाहर देख रहे थे। पता नहीं, कहां चले गए।’
      ‘कहीं रास्ता न भटक जाएं। अभी दो दिन ही तो हुए हैं हमें आए हुए।’-- छाया ने परेशान स्वर में कहा। रमेश हंस पड़े। बोले –- ‘बाबूजी पुराने जमाने के नहीं, आज के हैं। जेब में मोबाइल रखते हैं। रास्ता भूलने का सवाल ही नहीं। चिंता न करो।’ और सच कुछ देर बाद रामचंद्र लौट आए।
      रमेश ने पूछा –‘कहां चले गए थे बाबूजी? आपकी चाय भी ठंडी हो गई|’
      ‘मैं दोबारा बना देती हूं।’-- छाया ने कहा।
      ‘मैं तो बस छाया के काम से गया था।’-- रामचंद्र बोले।
      छाया ने आश्चर्य भरी नज़र से बाबूजी को देखा।
      रामचंद्र हंस पड़े। बोले –-‘घर तुम्हारा है तो काम भी तुम्हारे ही हुए। मैं बस्ती में घूम-फ़िर आया हूं। देख लिया है कि दूध की डेयरी कहां है, केमिस्ट और डाक्टर को भी देख लिया। एक सब्जी वाला है, उसके पास खूब भीड़ थी। यानी उससे सब्जी लेना लोग पसंद                                          

करते हैं, और भी बहुत कुछ देख लिया। आगे मोड़ पर एक पीपल का पेड़ है। उसे घेर कर सफ़ेद पत्थर का एक चबूतरा बनाया गया है। मैं सोच रहा हूँ कि उसका क्या इस्तेमाल हो सकता है। पर अभी तो वहां कई लोग ताश खेल रहे थे।
      ‘और क्या देखा आपने?’-- अजय ने पूछा।
      ‘देखा, ढूँढा पर नहीं मिली।’-- रामचंद्र बोले।
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      ‘क्या नहीं मिली बाबूजी?’-- रमेश ने पूछा।
      ‘यही कि बाजार में स्टेशनरी की कई दुकानें हैं, पर किताबों की एक भी नहीं।’-- रामचंद्र ने कहा।
      रामचंद्र चाय पीने लगे। फ़िर खुद बोल उठे—‘चबूतरा बैठने की अच्छी जगह है।’
      ‘तो क्या आप अब बाजार में चबूतरे पर बैठा करेंगे?’-- अजय बोला।
      अगला दिन इतवार था। रमेश और छाया डिब्बों को खोल-खोलकर सामान लगाते जा रहे थे। तभी बाबूजी ने अजय से कहा –‘हमें तो यहां कुछ काम नहीं, आओ घूमने चलें’ आकाश में बादल घिरे थे। धीमी हवा बह रही थी। पहले बाबूजी ने अजय को वह सब दिखाया जो कुछ वह पिछ्ली शाम खुद देखकर आए थे। फ़िर अजय के साथ पीपल वाले चबूतरे पर जा पहुंचे। अजय ने देखा सफ़ेद पत्थरों का चबूतरा अच्छा लग रहा था। सड़क पर ट्रैफ़िक था, पर चबूतरा सड़क से थोड़ा हटकर बना था।
      बाबूजी ने कंधे पर लटके झोले से कपड़ा निकाला और एक जगह धूल साफ़ करके बैठ गए। अजय खड़ा रहा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसी जगह चुनी है बाबूजी ने। बाबूजी ने बताया था कि वहां लोग ताश खेलते थे, पर आज तो वहां बस कबूतर फ़ुदक रहे थे।
      ‘अजय!’-- बाबूजी ने आवाज दी तो अजय ने मुड़्कर देखा -–अरे यह क्या! चबूतरे पर कुछ किताबें, पत्रिकाएं और दो अखबार रखे थे। ‘यह सब कहां से आया?’ अजय ने अचरज से पूछा।
      ‘और कहां से आएगा यह सब? मैं घर से लाया हूं। मैंने कहा था न कि पीपल वाला चबूतरा अच्छी जगह है। एक तरफ़ कबूतर, दूसरी तरफ़ किताबें – है न बढिया मेल’.--  कह कर बाबूजी हंस दिए। जब बाबूजी बात कर रहे तो दो जने आकर खड़े हो गए। एक ने उनसे  पूछा क्या ये बिक्री के लिए हैं?’
      ‘नहीं, पढने के लिए।’-- बाबूजी ने कहा—‘आओ बैठो, पढो!’
      वे दोनों बैठकर किताबें उलटने-पलटने लगे, फ़िर एक-एक पत्रिका उठाकर पढ़ने लगे। पत्रिकाएं पुरानी थीं। इन्हें रामचंद्र अपने साथ पुराने शहर से लाए थे।
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      अजय खड़ा-खड़ा देख रहा था। अब वहां दो नहीं-तीन-चार लोग आ बैठे थे। तभी अजय ने एक लड़के को देखा। वह पढ़ नहीं रहा था, बस देख रहा था। एकाएक उसने एक किताब उठाई और तीर की तरह भाग गया।
      बाबूजी, चोर!... अजय ने रुंधे गले से कहा।
      ‘कहां...किधर...’ बाबूजी ने पूछा। अजय ने बताना चाहा, पर किताब ले भागने वाला छोकरा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
      चबूतरे से कुछ दूर पुलिस का बीट-बाक्स बना था। उसमें से एक सिपाही निकल कर आया। उसने अजय के मुंह से निकला ’चोर’ शब्द शायद सुन लिया था। बोला –‘यहां हर तरह के लोग घूमते हैं। क्या ले गया चोर?’ उसने पूछा।
      ‘जी, एक किताब!’
      सिपाही हंस पड़ा। ‘किताब बेचने से उसे एक-दो रुपए से ज्यादा मिलने वाले नहीं।’
      ‘हो सकता है, वह किताब पढ़ना चाहता हो|’ बाबूजी अब भी किताब ले भागने वाले छोकरे को चोर नहीं कह रहे थे।
      ‘अगर उसे किताब पढ़नी होती तो वह यहीं बैठकर पढ़ता..इस तरह लेकर क्यों भागा?’ अजय ने कहा। उसका मन दुखी हो रहा था। वह सोच रहा था –‘आखिर बाबूजी को यह क्या सूझा कि यहां किताबें फ़ैलाकर बैठ गए।’
      सिपाही बाबूजी से बात करते-करते एक किताब उठाकर पढने लगा। बोला –’मैं सारा दिन यहां ड्यूटी देता हूं। चबूतरे पर ताश का अड्डा जमाने वालों को खदेड़ता रहता हूं। कभी-कभी कुछ पढ़ने का  मन करता है, पर यहां कोई किताब या पत्रिका की दुकान है ही नहीं।’
      ‘सिपाही अंकल, क्या आप किताब चोर को पकड़ लेंगे?’ अजय ने पूछा।
      ‘हां, बेटा क्यों नहीं। हम सामान चुराने वालों को पकड़्ते हैं तो किताब चोर को क्यों नहीं’, कहकर वह हंस पड़ा।
      धीरे-धीरे शाम ढल चली। पेड़ के नीचे धुंधलका-सा छाने लगा। बाबूजी किताबें समेट कर थैले में डालने लगे, फ़िर कुछ देख कर रुक गए। अभी एक आदमी चबूतरे पर बैठा किताब पढ़ने में मगन था।
      बाबूजी ने उससे पूछा –‘क्या आपको किताब अच्छी लगी?’
      ’जी बहुत अच्छी! छोड़ने का मन नहीं है, लेकिन आपको जाना है न’, उस आदमी ने बाबूजी की ओर किताब बढ़ाते हुए कहा।
      ‘आप इसे घर ले जाकर आराम से पढ़ें। कल वापिस ले आएं। तब तक मैं और किताबें भी ले आऊंगा।’ बाबूजी ने कहा तो वह आदमी हंस पड़ा। बोला –‘क्या सच मैं इस किताब को घर ले जा सकता हूं?’ जैसे उसे बाबूजी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था|
      बाबूजी ने बाकी किताबें भी थैले में रख लीं। उससे बोले- ‘जरूर ले जा सकते हैं...’
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      सिपाही बीट बाक्स के बाहर खड़ा था। उसने हंसकर बाबूजी से पूछा –‘क्या कल भी आप किताबें लेकर आएंगे?’
      ‘हां, लाऊंगा।’ बाबूजी ने कहा – ‘आपको संदेह क्यों हो रहा है?’
      ‘इसलिए कि एक लड़का किताब उठाकर भाग गया।’ सिपाही ने कहा।
      ‘यह सब तो होता ही रहता है। पुस्तकालयों से भी किताबें चोरी होती हैं। लोग अच्छी महंगी पुस्तकें लेकर बैठ जाते हैं। वापस नहीं करते। लेकिन ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। ज्यादातर लोग तो किताबें पढकर सही सलामत लौटा देते हैं। क्या थोड़े-से पुस्तक--चोरों के कारण लायब्रेरियों को बंद कर देना चाहिए?’
      जी कभी नहीं।’ सिपाही बोला।
      अजय से रहा नहीं गया। उसने कहा –‘लेकिन आपने उस आदमी का नाम-पता तो पूछा ही नहीं जो किताब अपने घर ले गया है।’
      ‘हां, पूछना तो चाहिए था, पर अगर वह किताबें पढ़्ने का शौकीन है तो नई किताबें लेने के लिए कल जरूर आएगा।’ बाबूजी बोले।
      ‘अगर नहीं आया तो...?.’ अजय पूछ रहा था।
      ‘हो सकता है न आए। तब उसे किताबों से दूर रहना पडेगा जो शायद उसे पसंद न आए। इसीलिए कह रहा हूं कि वह आएगा।’ बाबूजी हंसकर बोले|
      ‘तो क्या आप रोज इसी तरह किताबें चबूतरे पर रखा करेंगे लोगों के पढ़ने के लिए?’   रामचंद्र ने कहा—‘तुमने देखा सड़क पर कितनी भीड़ है। कितने ठेले-खोमचे वाले हैं। लोग पैसे देकर उनसे चीजें खरीदते हैं, पर हमें तो कुछ नहीं चाहिए। हम तो बस किताबों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। शायद यह बात पढ़ने वालों और किताबों को अच्छी लगे।’
      ‘किताबों को ....’ अजय चौंक पड़ा। ‘क्या किताबें भी मेरी और आपकी तरह होती हैं?’
      ‘होती तो हैं अगर कोई उनकी बात सुनना-समझना चाहे।’ कहकर बाबूजी फिर से हंस दिए। बोले-‘किताबें मुझसे कहती हैं, हमें बंद अलमारी की कैद से बाहर निकालो।’
      ‘क्या सच?’ अजय पूछ रहा था।
       बाबूजी मुस्करा रहे थे।  (समाप्त )

Friday, 10 April 2020

बूढी छड़ी--कहानी--देवेन्द्र कुमार


बूढ़ी छड़ी—कहानी—देवेन्द्र कुमार

 

  अजीब है बाबा की छड़ी। घर में किसी ने कभी बाबा को छड़ी लेकर चलते हुए नहीं देखा। घर के बच्चे कई बार मजाक में पूछते हैं, ‘‘बाबा, क्या आप सिर्फ दिखाने के लिए छड़ी रखते हैं?’’
  बाबा हंसकर कह देते, ‘‘अरे, छड़ी लेकर चलते हैं बूढ़े लोग, पर मैं तो बूढ़ा नहीं हूं।’’
  लेकिन बार-बार पूछने पर भी यह कभी न बताते कि जब छड़ी लेकर चलते नहीं तो रखते किसलिए हैं? बच्चे तो बच्चे, घर के बड़े लोग भी नहीं जानते कि आखिर छड़ी का रहस्य क्या है? और छड़ी भी कैसी-एकदम पुरानी, बदरंग! उस पर जगह-जगह, लकीरें और दरारें साफ दिखाई देती हैं। देखने पर ही बहुत पुरानी लगती है।
  बाबा से उनका पोता अमित बहुत प्यार करता है। औरों को चाहे वह कुछ भी कह दें पर अमित को कभी नहीं डांटते। शायद बाबा अपने पोते अमित को औरों से ज्यादा प्यार करते हैं। एक बार अमित की छोटी बहन रचना ने बाबा से यह पूछा तो उन्होंने रचना को गोद में उठाकर खूब प्यार किया। बोले, ‘‘घर में सबसे ज्यादा प्यार मैं अगर किसी से करता हूं तो रचना बिटिया से।’’
  हां, एक बात जरूर है, अगर कोई बच्चा उनकी छड़ी को हाथ लगा दे ते फिर बाबा नाराज होकर कहते हैं, ‘‘अरे नहीं, नहीं, उसे मत छुओ, वहीं रख दो।’’
 घर के लोगों ने देखा है-छड़ी बाबा के कमरे में एक कोने में रखी रहती है। बाकी हर चीज की जगह कई-कई बार बदल जाती है, लेकिन छड़ी का ठिकाना वहीं रहता है। लगता है बाबा के लिए उनकी छड़ी कुछ विशेष है। कोई ऐसा रहस्य जिसका भेद वह कभी खोलना नहीं चाहते। चाहे कोई कितना भी पूछे, कोई उत्तर न देकर मुस्करा उठते हैं, जवाब में कहते कुछ नहीं।
  बाबा का नाम रंजन राय है और उनका इकलौता बेटा है सुरेश। सुरेश की पत्नी दया खूब पढ़ी-लिखी है, पर वह नौकरी नहीं करती। दिन में कई बच्चे घर पर ही पढ़ने आ जाते हैं। उन्हें बहुत ध्यान से पढ़ाती है। बीच में घर का कोई काम याद आ जाए या बाबा पुकार लें, तो उनका भी ध्यान रखती है। लेकिन ऐसा नहीं कि इस तरह छात्रों की पढ़ाई में कभी बाधा पड़ जाए। उन्हें बहुत ध्यान से पढ़ाती है। पूरी बस्ती में लोग उसे मैडम पास कराने वालीकहकर सम्मान से बात करते हैं। और तारीफ झूठी नहीं होती। उसके पढ़ाए हुए छात्र सदा बहुत अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते हैं।
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  लेकिन एक दिन दया को गुस्सा आ ही गया। एक बच्चा अपने काम में लापरवाही कर रहा था। दया के बार-बार कहने पर भी वह पढ़ाई में मन नहीं लगा रहा था। फिर एक दिन तो हद ही हो गई। उसने दूसरे बच्चों के सामने दया का अपमान कर दिया। दया को भी गुस्सा आ ही गया। उसने कुछ सोचा फिर अपने ससुर के कमरे में गई और कोने में रखी छड़ी उठा लाई। उस समय बाबा घर में नहीं थे। छड़ी दिखाते हुए बच्चे को धमकाया, फिर एक बार मार भी दिया।
  उसी समय बाबा घर में लौट आए। उन्होंने दया के हाथ में छड़ी देखी, पर कुछ कहा नहीं। चुपचाप कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। दया ने तुरंत छड़ी को उनके कमरे के दरवाजे से टिकाकर रख दिया और बच्चों को पढ़ाने लगी। उसे खुद बुरा लग रहा था कि आखिर उसने बच्चे पर छड़ी कैसे उठाई!
दिन ढल गया, पर बाबा के कमरे का दरवाजा बंद ही रहा। दया चाय बनाकर ले गई। दरवाजा खटखटाया तो बाबा ने दरवाजा खोल दिया। दया उनका गंभीर मुंह देखकर जान गई कि मामला गड़बड़ है। चाय का प्याला तिपाई पर रखकर वह दरवाजे के बाहर रखी छड़ी उठा लाई और उसे कोने में रखने लगी।
  तभी बाबा ने कहा, ‘‘दया, अब मैं इस छड़ी को अपने पास नहीं रखूंगा, अब मुझे इसकी जरूरत नहीं।’’
  दया ने देखा बाबा की आंखों में आंसू थे, उनके होंठ कांप रहे थे। इस तरह अपने बूढ़े ससुर को छोटे बच्चों की तरह रोते हुए उसने शायद पहली बार देखा था। उसने कहा, ‘‘पिताजी, मुझसे गलती हो गई। मुझे आपसे पूछकर छड़ी यहां से उठानी चाहिए थी।’’
  ‘‘लेकिन यह छड़ी’’ और बात को बीच में ही अधूरी छोड़कर रंजन राय फिर उदास हो गए।
  दया अचरज के भाव से अपने ससुर को देखती रह गई। आखिर उसने पूछ ही लिया, ‘‘पिताजी, पूरी बात बताइए, आप छड़ी के बारे में कुछ कह रहे थे।’’
  रंजन राय ने कहा, ‘‘दया, इस छड़ी का रहस्य मैंने अब तक सबसे छिपाकर रखा था, आज तुम्हें बता रहा हूँ ।यह छड़ी मेरे अध्यापक की है। बात मेरे बचपन के दिनों की है। वह अध्यापक मुझसे बहुत प्यार करते थे। मैं कक्षा में सबसे आगे भी रहता था । इस कारण क्लास के दूसरे साथी मुझसे नाराज रहते थे। एक बार उनमें से किसी ने मेरी झूठी शिकायत उनसे कर दी। सुनकर मास्टर साहब को बहुत गुस्सा आया। उन्हें लगा यह तो मेरी बहुत बड़ी गलती थी। बस, उन्होंने अपनी छड़ी से मुझे पीटना शुरू कर दिया।
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 ‘‘फिर?’’
  ‘‘वह मारते हुए कहते जा रहे थे-तूने मेरा अपमान किया है। मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी है। मैं कहता रहा-जी, किसी ने मेरी झूठी शिकायत की है। आप पता कर लें।-आखिर उन्होंने छड़ी फेंक दी और खुद रो पड़े। क्योंकि वह मुझसे बहुत स्नेह करते थे।बाद में तो उन्हें पता चल गया कि शिकायत झूठी थी। इसके कुछ दिन बाद ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। तब मुझे बहुत रोना आया।’’
  दया ध्यान से रंजन बाबू की बातें सुन रही थी। उन्होंने आगे कहा, ‘‘इसके कुछ दिन बाद की बात है। मैं मास्टरजी के घर के सामने से जा रहा था। एकाएक मैंने घर के बाहर पड़ी छड़ी देखी। मैं चौंक कर रुक गया। मैंने छड़ी को एकदम पहचान लिया । पहचानता कैसे नहीं! वह वही छड़ी थी जिससे पहली बार उन्होंने मेरी पिटाई की थी और फिर खूब रोए थे। शायद बेकार समझकर किसी ने उसे बाहर फेंक दिया था। मैंने चुपचाप छड़ी उठाई और घर ले आया। बस, तब से इसे सदा अपने साथ रखता हूं। इस बात को न जाने कितना समय बीत गया है। यह मुझे अपने प्रति मास्टरजी के स्नेह की याद दिलाती रहती है।’’ और रंजन बाबू की आंखों में फिर आंसू आ गए।
  दया की आंखें भी गीली हो गईं। उसने छड़ी उठाकर कोने में पुरानी जगह रख दी और कहा, ‘‘पिताजी, अब चाहे मुझे कितना भी गुस्सा क्यों न आए, मैं किसी बच्चे को हाथ नहीं लगाऊंगी।’’दया जान गई थी कि रंजन बाबू के लिए वह छड़ी उनके अध्यापक के स्नेह, पिटाई और पश्चात्ताप का प्रतीक थी।
  उस छड़ी के बारे में घर में किसी को कुछ पता नहीं चला। दया छड़ी का रहस्य जान गई थी। पर रंजन बाबू ने उससे कह दिया था कि वह इस घटना के बारे में किसी से कुछ न कहे। उसके बाद अनेक बार घर के बच्चों ने छड़ी के बारे में जानना चाहा, पर रंजन बाबू हमेशा की तरह चुप ही रहे। वह जानते थे कि उनके मास्टरजी की छड़ी का रहस्य दया के पास सुरक्षित था।                     ( समाप्त)
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Sunday, 5 April 2020

रोटी माँ और बेटियां-कहानी-देवेन्द्र कुमार


 रोटी माँ’ और बेटियां—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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  रोटी परेशान थी।  उसे बहुत गुस्सा आ रहा था।  बात ही कुछ ऐसी थी।  वह कई दिन से ऐसे ही डिब्बे में पड़ी थी।  घर के सब लोग ताज़ी गरम रोटियाँ खाते थे पर उसे कोई छूता नहीं था। क्यों भला! असल में एक दिन जब माँ ने रोटी को तवे पर डाला तो उनका नन्हा जोर से रो पड़ा। माँ ने झट उसे गोद में उठा लिया, इतने में रोटी जल गई। माँ ने देखा तो गैस बंद कर दी और बच्चे को बहलाने लगी। फिर जली हुई रोटी को तवे से उठा कर रोटियों के डिब्बे में डाल दिया।
    इस बात को कई दिन बीत गए। जली हुई रोटी मन मसोस कर डिब्बे में पड़ी रही। एक दिन ऐसा भी हुआ जब भोजन तैयार होने के बाद किसी बच्चे की फरमाइश पर  घर के लोग होटल में खाना खाने चले गए। और गरम रोटियां डिब्बे में पड़ी रह गईं। तब उन्होंने जली हुई रोटी से बात की,उसकी हालत पर दुःख जताया, उसे अपनी दीदी कहा।  लेकिन इससे ज्यादा वे और कुछ न कर सकीं। अगली सुबह पिछली शाम को बनी रोटियों को गरम करके खा लिया गया लेकिन जली हुई रोटी अकेली डिब्बे में पड़ी रह गई। वह एक ही बात सोच रही थी—क्या मैं किसी काम की नहीं। रोटी का सबसे बड़ा सुख होता है किसी  की भूख मिटाना।  पर उस दिन तो हद ही हो गई,मालकिन ने सब्जी के छिलकों के साथ जली हुई बासी रोटी को भी प्लास्टिक की थैली में डाल दिया,फिर कामवाली से कहा कि जाते समय थैली को कूड़ेदान में डालती जाए।
  कामवाली ने थैली को कूड़ेदान की तरफ फेंक दिया और चली गई। थैली कूड़ेदान के बाहर गिर कर फट गई। रोटी को मौका मिला और वह थैली के फटे हिस्से से बाहर आ गई।  अब वह आज़ाद थी और सोच रही थी कि क्या वह किसी भूखे पेट के काम आ सकती थी।  लेकिन कैसे! यह तभी हो सकता था जब कोई भूख से परेशान बड़ा या बच्चा उसे खा ले।  तभी सफाई वाला आया और कूड़े को हाथ गाडी में भर कर ले गया।  रोटी सोच रही थी-‘ मैं कूड़े का हिस्सा बनने से तो बच गई,अब मुझे किसी भूखे पेट की खोज करनी चाहिए। ’
  रात हो गई,सब तरफ सन्नाटा था।  रोटी किसी भूखे पेट की खोज में चल दी।  कुछ आगे उसने फुटपाथ पर एक परिवार को बैठे देखा,माँ बाप और बच्चा।  ‘माँ, रोटी दो, भूख लगी है। ’बच्चे ने कहा। पर जली हुई रोटी को किसी ने नहीं उठाया।  वह निराश होकर आगे चल दी। रोटी किसी छोटे पहिये की तरह घूमती हुई बढ़ रही थी। अगर कोई रोटी को इस तरह चलते हुए देखता तो भूत भूत कहता हुआ भाग जाता, लेकिन कहीं कोई नहीं था। आगे एक ढाबा था।  काम खतम करके नौकर सो रहे थे लेकिन बची हुई तन्दूरी रोटियां जाग रही थीं। तभी उन्होंने जले हुए चेहरे वाली रोटी को देख लिया और पास आकर पूछने लगीं, वे समझ नहीं पा रही थीं एक अकेली रोटी उस समय वहां क्या कर रही थी। उन्होंने पूछा तो जवाब मिला-‘मैं दीदी हूँ,’ घर के डिब्बे में रोटियों ने इसी नाम से तो पुकारा था उसे,वैसे तो हर रोटी को केवल ‘रोटी’ ही कहा जाता है। लेकिन जली हुई रोटी चाहती थी कि उसे दीदी ही कहा जाये। आखिर सब रोटियों में वही तो उम्र में सबसे बड़ी थी।
                                   
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   उसका  हाल सुन कर तंदूरी रोटियां अफ़सोस करने लगीं। लेकिन दीदी ने कहा-‘वह सब छोड़ो, हमें उस भूखे परिवार की मदद करनी चाहिए। ’ सबको मालूम था कि दुनिया में कितने सारे बच्चे और बड़े हर दिन भूखे रह जाते हैं। दीदी के साथ तंदूरी रोटियां उस परिवार के पास जा पहुंची।  अपनी भूख मिटा कर वह परिवार फुटपाथ पर ही सो गया।  इतने दिनों में दीदी को पहली बार कुछ चैन मिला। लेकिन यह तो आरम्भ था। दुनिया भर के भूखों के खाली पेट की आग बुझाना बहुत बड़ा काम था।  उसके लिए ये थोड़ी सी रोटियां भला क्या कर सकती थीं। पर दीदी के सपने बहुत बड़े थे।  वह कुछ कहने को हुई तभी एक रोटी ने कहा-‘क्या तुमने ‘रोटी—माँ’ के बारे में सुना है?हमारे ढाबे में काम करने वाले छोकरे उनके बारे में कई तरह की बातें करते हैं। कहते हैं रोटी-माँ की कुटिया से कोई खाली पेट नहीं जाता। ’
  ‘रोटी-माँ’—कितना अजीब नाम है। दीदी ने सोचा और रोटियों की टोली के साथ ‘रोटी माँ’ के नाम से प्रसिद्ध बूढी माई की झोंपड़ी पर जा पहुंची।  बिना दरवाजे वाली कुटिया में एक दीपक जल रहा था और ‘रोटी माँ’ जमीन पर सो रही थी। कुटिया के बाहर एक थाली में कई रोटियां रखी थी । ’कुटिया के बाहर रोटियां!’दीदी के मुंह से निकला’ तभी थाली में रखी एक रोटी ने कहा-‘यह क्या!यहाँ तो हर रोज भूखे लोग पेट भरने के लिए आते हैं पर आप सब...’
  दीदी ने कहा—‘हम सब ‘रोटी माँ’ से मिलने आये हैं।  उन्हें लोग इस विचित्र नाम से क्यों पुकारते हैं। उनका असली नाम क्या है?’
  जवाब मिला-‘ यही अम्मा का असली नाम है। ’और फिर रोटी ने एक अजीब कथा सुनाई--
 अम्मा इस दुनिया में एकदम अकेली है। कभी भरा पूरा परिवार था,लेकिन अब कोई नहीं है। अम्मा पूरे गाँव को अपना परिवार मानती है।  हर सुबह वह बारी बारी से घरों में जाकर कहती है-‘ आज मैं तुम सबको अपने हाथों से बना खाना खिलाने आई हूँ। ’ और हाथ धोकर रसोई में खाना बनाने में जुट जाती है।  पूरे गाँव को मालूम है कि अम्मा कितना स्वादिष्ट भोजन बनाती है। सबको भोजन कराने के बाद अम्मा कहती है-‘तुम सबकी भूख तो शांत हो गई।  अब दूसरों की भूख मिटाने के लिए कुछ दो।’’फिर चार रोटियां लेकर दूसरे घर में भोजन बनाने चली जाती है। जब थकी हारी अपनी कुटिया पर लौटती है तो साथ लाई रोटियां एक थाली में कुटिया के बाहर रख कर आराम करने लेट जाती है।  फिर धीरे धीरे  भूखे लोग रोटियां लेकर जाने लगते हैं।  कुछ देर आराम के बाद अम्मा फिर गाँव के घरों में जाकर खाना बनाने में जुट जाती है।  और सवेरे की तरह शाम को भी रोटियां लेकर लौटती है।  शाम को भी भूखे लोग रोटियां ले जाते हैं।
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  बड़ी विचित्र थी ‘रोटी माँ’ की सच्ची कहानी।  तब दीदी ने कहा-‘यहाँ भूखे लोग रोटियां लेने आते हैं,अगर हम मिलकर भूखे लोगों की खोज में जाएँ तो कैसा रहे।’ और फिर वैसा ही हुआ। सब रोटियां दीदी के पीछे भूखे लोगों की खोज में चल दीं। ’रोटी माँ’ की कुटिया के बाहर रखी रोटियां भी साथ चल पड़ी।  उस रात रोटियों ने कई भूखे लोगों की भूख मिटाई,तब तक सुबह होने लगी थी।  सबकी लीडर दीदी ने कहा-‘दिन  में हम इस तरह सड़क पर पहियों की तरह चलेंगे तो लोग भूत प्रेत समझ कर डर जायेंगे।  हमें दिन भर कहीं छिप कर रहना होगा। ’
  ‘क्यों न हम ‘रोटी माँ’ की कुटिया में छिप जाएँ। ’ एक रोटी ने कहा और सब रोटियां जाकर अम्मा की कुटिया के छप्पर में जा छिपी। किसी को कुछ पता न चला।  किसी ने सड़क पर घूमती रोटियों को नहीं देखा।  कुछ देर में अम्मा की नींद खुली तो उसे छप्पर में सर सर की आवाज सुनाई दी।  अम्मा ने कहा—‘लगता है छप्पर में चूहे घुस गए हैं। ’ अम्मा की बात सुन कर रोटियों को हंसी आ गई। लगा जैसे बहुत सारी लड़कियां खिल खिला रही हों। हैरान अम्मा कुटिया बाहर निकल कर इधर उधर देखने लगी। पर कहीं कोई नहीं था।  अम्मा ने इसे अपने बूढ़े कानों का वहम समझा और साफ़-सफाई में जुट गई। और कुछ देर बाद गाँव की तरफ चल दी। उसने सोच लिया था कि आज किन घरों में भोजन बनाना है। दिन भर रोटियां छप्पर में छिपी रहीं।
  रात में अम्मा के सो जाने के बाद रोटियां भूखों की भूख मिटाने के सफ़र पर चलीं तो कुटिया के बाहर थाली में रखी रोटियों ने भी साथ चलना चाहा,पर दीदी ने मना कर दिया,कहा-‘यहाँ हर दिन कई जनेभूख    मिटाने के लिए आते हैं।  उन्हें निराश नहीं होना चाहिए।  तुम सब रोज की तरह यहीं रहो। ’
  उस रात भी रोटियों ने कई लोगों को भूखे पेट सोने से बचाया। एक रोटी ने कहा—दीदी, आखिर हम कितने लोगों की भूख मिटा सकते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह रोज भूखों की भूख मिटाते मिटाते सारी रोटियां खत्म न हो जाएँ। ’ दीदी कुछ कहती इससे पहले किसी ने कहा—‘ऐसा कभी नहीं होगा। ’ यह मक्का की रोटी बोल रही थी, जो अभी अभी उन सबके बीच आई थी। उसने बताया-‘इस ‘भूख मिटाओ’ यात्रा की खबर अब हमारी पूरी बिरादरी को मिल चुकी है। उसकी यह बात सच लग रही थी,क्योंकि उसके साथ और भी कई रोटियां थीं जो पहली बार वहां आई थीं।  और यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं था। शहर की सब रोटियों ने पक्का निश्चय कर लिया था कि जब भी मौका मिलेगा वे दीदी के साथ ‘भूख मिटाओ’ सफ़र में जरूर शामिल होंगी।  
   दीदी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उसे अपना सपना सच होता हुआ लग रहा था।  (समाप्त)