Tuesday, 24 March 2020

कान और हाथ-कहानी-देवेन्द्र कुमार


 कान और हाथ—कहानी—देवेन्द्र कुमार
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  आज रविवार है,एग्रो पब्लिक स्कूल में त्यौहार का वातावरण है, सरदी की गुनगुनी धूप में स्कूल के मैदान में बच्चों के रंग बिरंगे परिधान इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहे थे। स्कूल में बच्चों की चित्र कला  प्रतियोगिता हो रही थी। बाल चित्रकारों के हाथ और चेहरों पर रंग लग गए थे,पर इस सबसे बेखबर बच्चे चित्र बनाने में जुटे थे। स्कूल की अध्यापिकाएं बच्चो के बीच घूम घूम कर उनका उत्साह बढ़ा रही थीं। 

  आखिर प्रतियोगिता समाप्त हुई। बाल कलाकारों ने अपने अपने चित्र निर्णायकों को सौँप दिए।   अब सबको परिणाम घोषित होने की प्रतीक्षा थी। सबसे अच्छे चित्र को प्रथम पुरस्कार के रूप में बहुत अच्छा इनाम मिलने वाला था। दस सांत्वना पुरस्कार भी दिए जाने वाले थे। चित्रकारी के बाद अब बच्चे नाश्ता कर रहे थे, लेकिन सबकी निगाहें निर्णायकों  की ओर लगी थीं जो एक एक चित्र को परख रहे थे। लेकिन एक समस्या थी--कई बच्चों ने अपने बनाये चित्र पर अपने नाम नहीं लिखे थे।लेकिन परिणाम तो घोषित करने ही थे।   

  सब जजों की राय में एक चित्र सबसे अच्छा था। लेकिन उसे बनाने वाले बच्चे ने एक विचित्र विषय चुना था, और उस चित्र पर कोई नाम भी नहीं था। चित्र में दो कान बनाये गए थे जिन्हें दो हाथों ने पकड़ा हुआ था। निश्चय ही चित्र में एक संकेत छिपा हुआ था। क्या बच्चा यह बता रहा था कि उसे दंड दिया जा रहा था अथवा उसने किसी को दंड मिलते देखा था। आखिर सच क्या था? क्या नाम न लिखने के पीछे यह डर काम कर रहा था कि उसकी पहचान उजागर होने पर उसे सजा मिल सकती थी।   
  कुछ देर तक आपस में विचार करने के बाद स्कूल की प्रिंसिपल लताजी माइक पर आईं। उन्होंने कहा- ‘बच्चो,निर्णायकों ने सबसे अच्छे चित्र का चुनाव कर लिया है,लेकिन एक समस्या है, चित्र पर उसे बनाने वाले ने अपना नाम नहीं लिखा है। हम चाहेंगे कि इसका चित्रकार सामने आकर प्रथम पुरस्कार प्राप्त करे।’ प्रिंसिपल ने ‘कान पकड़ हाथ’ वाला चित्र नोटिस बोर्ड पर लगा दिया। वहां मौजूद सब बच्चे तालियाँ बजाने लगे। सबको प्रथम पुरस्कार जीतने वाले अनाम बच्चे का इन्तजार था।   लेकिन काफी समय तक प्रतीक्षा करने के बाद भी कोई बच्चा पुरस्कार लेने नहीं आया। 
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  सब छात्र हैरान थे कि प्रथम पुरस्कार विजेता इनाम लेने क्यों नहीं आ रहा है, लेकिन प्रिंसिपल लताजी  तथा अन्य अध्यापिकाएं इसका कारण अच्छी तरह समझ चुकी थीं। निश्चय ही वह अपनी पहचान उजागर होने से डर रहा था। तब उस बच्चे को पहचानने का क्या उपाय था?यह एक गंभीर बात थी। लताजी ने स्कूल की सब टीचर्स की मीटिंग बुलाई। उन्होंने प्रत्येक टीचर से पूछा कि क्या उन्होंने कभी किसी छात्र को कोई सजा दी है, उसके साथ मारपीट की है?क्योंकि स्कूल में इस पर प्रतिबन्ध था। टीचर्स ने एक स्वर से छात्रों को कैसा भी दंड देने से इनकार किया। कहा-‘ अगर कोई छात्र कभी गलत आचरण करता है तो वे प्यार और समझाने का तरीका अपनाती हैं, दंड का नहीं।’
   तो क्या उस बच्चे को घर पर या कहीं और परेशान किया जाता है? इस बात को पता करने का क्या तरीका था? लताजी ने काफी सोच विचार के बाद एक तरीका अपनाया। उन्होंने ‘कान और हाथ’ वाला चित्र स्कूल के प्रवेश द्वार पर एक नोटिस बोर्ड पर लगा दिया। और फिर कुछ टीचर्स से वहां नज़र रखने को कहा। उन्हें यह देखना था कि क्या कोई छात्र बार बार उस चित्र के सामने आकर खड़ा होता है। यह उपाय कारगर साबित हुआ। ऐसे तीन छात्र थे जो बार बार आकर उस चित्र को देखते थे। उनके नाम थे-अमर, विनीत और रजत।   
  लताजी उन तीनों के के पेरेंट्स से बात चीत करना चाहती थीं लेकिन स्कूल में नहीं। वह समझ रही थीं इस बात का पता स्कूल में किसी को भी नहीं लगना चाहिए। उन्होंने तीनों के माँ बाप को बारी बारी से अपने घर बुलाया। और उन्हें सावधान कर दिया कि इस बारे में किसी से कुछ न कहें।   अमर और विनीत के माता पिता ने कसम खाकर कहा कि वे अपने बच्चे को कभी कैसा भी दंड नहीं देते। हमेशा प्यार से पेश आते हैं। लेकिन रजत के पैरेंट्स लताजी के इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे सके। आखिर रजत की माँ ने पति के सामने ही बताया—‘ इन्हें जल्दी गुस्सा आ जाता है। मेरे बार बार समझाने पर भी उसे मारने लगते हैं।‘ जब रजत की माँ लताजी से बात कर रही थी तो रजत के पिता एकदम चुप बैठे थे।   
   लताजी ने रजत के पिता से प्रश्न किया तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा—‘ मैं मानता हूँ कि मुझे जल्दी गुस्सा आ जाता है। मैं अपने गुस्से पर काबू करने की बहुत कोशिश करता हूँ   लेकिन फिर भी... ’ कमरे में कुछ देर मौन छाया रहा। रजत के पिता के अटपटे व्यवहार से सारी  बात साफ़ हो गई। लताजी ने उन्हें शांत करते हुए कहा-‘ आपके गलत व्यवहार का रजत के कोमल मन पर बुरा प्रभाव पड रहा है। यह उसके लिए अच्छा नहीं है।’ मुझे आशा है कि आप रजत के साथ प्यार और समझदारी से पेश आयेंगे।‘ 
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  मैं उससे माफ़ी मांग लूँगा।’ रजत के पिता ने कहा तो लताजी ने उन्हें टोकते हुए कहा-‘ ऐसी गलती भूल कर भी मत करना। इस बारे में रजत को कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए। हम सबको इस बात को एकदम भूल जाना चाहिए।’
  और ऐसा ही हुआ। स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लगा चित्र गायब हो गया। सुबह की प्रार्थना सभा में लताजी ने कहा–‘ न जाने वह चित्र कहाँ गया। पता नहीं यह किसने किया है। हम बहुत कोशिश करने पर भी उस चित्र को बनाने वाले बच्चे की पहचान नहीं कर पाए।’
   लताजी रजत के माता पिता से निरंतर बात करती रहीं। रजत की माँ के अनुसार उसके पिता का व्यवहार एकदम बदल गया था। रजत के ‘कान पकड़ हाथ’ वाले चित्र ने अपना काम कर दिया था।  और कोई कुछ भी नहीं जान पाया था। वैसे रजत के बनाये चित्र को लताजी ने अपने पास        संभाल कर रख लिया था। लताजी किसी को कुछ बताने वाली नहीं थीं।   ( समाप्त)                                         

Saturday, 21 March 2020

डबल ड्यूटी --कहानी-देवेन्द्र कुमार


डबल ड्यूटी—कहानी—देवेन्द्र कुमार 
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लखमा तेजी से हाथ चला रही है. आज उसे जल्दी घर जाना है. कोई  मेहमान आने वाला हैं. लेकिन काम तो पूरा करना ही है. लखमा बाज़ार में तीन दुकानों में सफाई का काम करती है. पति मजदूर है. दोनों के काम करने पर भी घर मुश्किल से चलता है. एक बेटा है अमर.  
दुकानों के बाहर बरामदे में पोंछा लगाते हुए लखमा की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो कुछ आगे एक दुकान के बाहर सफाई कर रहा था. लखमा देखती रही. बच्चा सात आठ साल का लग रहा था. वह उसे देखती रही. बच्चा कोशिश कर रहा था पर सफाई उससे हो नहीं रही थी. पानी की बाल्टी खिसकाते हुए वह फिसल गया और बाल्टी उलट गई. अब लखमा रुक न सकी. उसने बढ़ कर बच्चे को गोदी में उठा लिया और सिर सहलाते हुए बोली-‘’ तेरा नाम क्या है?’’
‘’ जानी.’’ उसने कहा.
‘’ तू यह काम क्यों कर रहा है? यह तेरे बस का नहीं है. ‘’ पूछने पर लखमा ने जान लिया कि जानी की माँ रेशमा बीमार है. वह भी लखमा की तरह दुकानों में सफाई का काम करती है. और उसने ही जानी को सफाई करने भेजा था. ऐसी स्थिति से कई बार लखमा को भी गुजरना पड़ा था. वह जानती थी कि ऐसे में काम हाथ से निकल जाता है. इसीलिए जानी की माँ ने बेटे को काम करने भेजा होगा.
लखमा ने जानी से कहा-‘’ बेटा, तू रहने दे. जा बच्चों के संग खेल. मैं अभी निपटा देती हूँ. ‘’ जानी हंसने लगा और सडक पर खेलते बच्चों के बीच चला गया. हालांकि लखमा को घर जाने की जल्दी थी, पर उसे जानी का अधूरा काम पूरा करना ही था. उसने जल्दी जल्दी काम निपटाया फिर घर की तरफ चल दी. उसने देखा जानी सड़क पर दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा था, लखमा के होठों पर मुस्कान आ गई. उसे अच्छा लग रहा था. पर घर पहुँच कर मूड बिगड़ गया, उसे घर लौटने में देर हो गई थी. इसलिए मेहमान बिना मिले चला गया था.
अगली सुबह लखमा काम पर पहुंची तो जानी फिर वहाँ दिखाई दिया. इसका मतलब था कि जानी की माँ अभी बीमार थी. ‘ मुझे न जाने कितने दिन डबल ड्यूटी करनी होगी.’ वह यह सोच कर पछता रही थी कि उसने क्यों यह मुसीबत अपने ऊपर ले ली. वह जानी को सफाई करते देखती रही. वह ठीक तरह से काम कर नहीं पा रहा था. पर लखमा ने उसकी मदद नहीं की. लेकिन पोंछा लगाते हुए जब जानी दो बार फिसल गया तो लखमा रह न सकी. उसने जानी
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का हाथ पकड़ कर जोर से अपनी ओर खींचा और चिल्ला कर बोली--‘’ कल तुझे मना किया था न कि तू यह काम नहीं कर सकता. बता फिर क्यों आया ?’’
हाथ खींचने से जानी रो पड़ा. सुबकते हुए बोला--‘’ माँ ने भेजा है. उनकी तबीयत ठीक जो नहीं है.’’
‘’ चल मैं चलती हूँ तेरी माँ के पास, चाहे जो हो बस तुझे यहाँ नहीं आना है.’’ लखमा ने कहा और जानी के साथ उसकी माँ से मिलने चल दी. उसने जानी का काम अधूरा छोड़ दिया.वह   कुछ सोच रही थी.
जानी की माँ रेशमा छोटे से कमरे में जानी के साथ रहती थी. उसका पति दूसरे शहर में नौकरी करता था ओर कभी कभी ही यहाँ आया करता था. बीमारी में जानी की माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. लखमा जानी की माँ को देख कर समझ गई कि उसकी तबीयत जल्दी ठीक नहीं होगी. उसने कहा –‘’ जानी की माँ , तुम काम की चिंता मत करो. पर जानी को मत भेजा करो. अभी तो इसके पढने –- खेलने के दिन हैं. ‘’ जानी की माँ रेशमा ने कोई जवाब नहीं दिया,
अगली सुबह लखमा ने देखा कि जानी फिर वहां खड़ा था. लखमा को देखकर वह दूर चला गया, शायद जानी लखमा से डर गया था. लखमा उस दुकान वाले के पास गई जहाँ जानी सफाई कर रहा था. उसने कहा-‘’ जानी की माँ तो बीमार है. शायद वह काफी समय तक काम करने नहीं आ सकेगी ‘’ दुकान वाले ने कहा –- ‘’ तो तुम कर लो उसकी जगह. हमारी दो दुकानें और हैं.’’ लखमा खुश हो गई. उसे अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद हो गई. डबल ड्यूटी में मेहनत  ज्यादा थी पर पगार भी तो दुगनी मिलने वाली थी. हाथों के साथ दिमाग भी भाग रहा था. वह सोच रही थी कि अतिरिक्त पैसों से क्या कुछ हो सकेगा. अब जानी दुकान पर नहीं आता था. बस एक चबूतरे पर बैठा लखमा को देखता रहता था. लखमा सोचती थी जानी यहाँ क्या कर रहा है. रेशमा के पास क्यों नहीं बना रहता. मन हुआ कि जानी से रेशमा का हाल पूछे पर चुप रह गई.
लखमा ने महीने के आखिरी सप्ताह में रेशमा के बदले काम किया था. दुकानवाले ने पैसे दिए तो बोली-‘’ रेशमा के पैसे भी दे दो, उसे जरुरत होगी.’’ दुकानवाले ने कहा-‘’ रेशमा के पैसे उसी को दूंगा.’’ सुन कर लखमा सोच में पड़ गई. वह रेशमा के बारे में सोच रही थी. एक तो काम नहीं ऊपर से बीमारी का खर्च. पिछले काम के पैसे भी नहीं मिल रहे हैं. बाज़ार में जानी दिखा तो पूछा-‘’ यहाँ क्या कर रहा है ? माँ के पास क्यों नहीं टिकता?’’
‘’ माँ ने काम खोजने को कहा है. ‘’ –- जानी बोला.
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‘’ तुझे कौन काम देगा भला. ‘’ लखमा ने व्यंग्य से कहा. ‘’ चल मैं तेरी माँ से बात करती हूँ.’’ और उसके साथ रेशमा से मिलने चल दी. लखमा ने देखा कि रेशमा की तबीयत पहले से ज्यादा ख़राब है. साफ़ था कि उसे तुरंत काफी पैसे चाहिएं ताकि ठीक से दवा -- दारु और देख   भाल हो सके. लखमा ने कहा-‘’ तुम जानी को पढने भेजो न कि काम की तलाश में. ‘’
“मैं क्या करूँ?’’ - रेशमा ने उदास स्वर में कहा
.’’सब ठीक हो जायेगा.अभी तुम मेरे साथ चलो.’’ कह कर लखमा उसे सहारा देती हुई दुकानदार के पास ले गई.  
दुकानदार ने पैसे देते हुए लखमा से  कहा-‘’ तुम तो इसकी ऐसे सिफारिश कर रही हो जैसे तुम दोनों आपस में बहनें हों. लेकिन तुम दोनों के धर्म तो अलग अलग हैं, फिर बहनें कैसे हो सकती हो.’’ लखमा से पहले रेशमा बोल उठी-‘’ बहन होने के लिए  धर्म एक होना जरुरी नहीं.’’ और मुस्करा दी. लखमा सोच रही थी कि कहीं दुकानदार काम के बारे में उसकी बात रेशमा को न बता दे. तब तो रेशमा उसे लालची समझ बैठेगी. पर वैसा कुछ न हुआ. लखमा रेशमा को उसके घर ले आई. रास्ते भर वह कुछ सोचती रही थी. और फिर उसने फैसला कर लिया. रेशमा ने उसे अपनी बहन कहकर उसके मन को छू लिया था. लखमा को अपनी छोटी बहन याद आ गई जो गाँव में रहती थी. लखमा काफी समय से बहन से मिल नहीं पाई थी.
अगली सुबह काम पर जाने से पहले वह रेशमा के पास जा पहुंची. कहा-‘’ रेशमा, आराम कर, तेरा काम मैं संभाल लूंगी. पर एक शर्त है. आज के बाद जानी को काम पर कभी मत भेजना. उसे पढना चाहिए.‘’
‘’ कौन पढ़ाएगा जानी को?’’-- रेशमा ने उदास स्वर में कहा.
‘’मैं इसे मास्टरजी के पास ले जाऊँगी जो मेरे बेटे को पढ़ाते हैं. ‘’-- लखमा ने कहा. उसने आगे बताया कि मास्टरजी बच्चों को पढ़ाने के पैसे नहीं लेते. किताबें और कॉपी-- पेंसिल भी अपनी जेब से देते हैं. वे उन बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं जो स्कूल नहीं जा पाते.’’
रेशमा को लखमा की बात माननी पड़ी. लखमा जानी को मास्टरजी के पास ले गई. और जब जानी पहले दिन मास्टरजी से पढ़ कर आया तो वह ख़ुशी से रो पड़ी. लखमा रेशमा के बदले काम करती रही. महीना पूरा हुआ तो लखमा ने रेशमा की दुकानों के पैसे लाकर रेशमा के हाथ में रख दिए. वह लेने को तैयार नहीं हुई. तब लखमा ने कहा--‘’ मान ले कल अगर मैं बीमार हो जाऊं तो क्या तू मेरी मदद नहीं करेगी?’’ इस बात ने रेशमा को चुप कर दिया. अब कहने को कुछ नहीं था, लखमा अपने घर की ओर चली तो मन पर बैठा बोझ उतर गया था.( समाप्त)                     

Sunday, 15 March 2020

मेरी माँ -कहानी-देवेन्द्र कुमार


मेरी माँ--कहानी--देवेन्द्र कुमार
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  मुझे बाज़ार जाने के लिए रिक्शा की तलाश थी। आसपास कोई रिक्शावाला दिखाई नहीं दे रहा था।   मैं इधर उधर देखता खड़ा था,तभी एक रिक्शा मेरी ओर आती नजर आई। रिक्शा चालक को देख कर मैं चौंक गया। वह तो कोई बच्चा लगा मुझे। वह रिक्शा चला नहीं पा रहा था। आखिर एक बच्चे को इस छोटी उम्र में रिक्शा खींचने की क्या जरूरत आ पड़ी थी। वह मुझसे रिक्शा में बैठने को कह रहा था, पर मैंने मना कर दिया। इतने में एक और रिक्शा आ गई। मैं  उस में बैठने लगा तो पहले वाला मुझसे  चिरोरी करने लगा। बोला-‘बाबू, मेरी रिक्शा में बैठ जाओ न। आज तो मुझे खाना भी नहीं मिला है। 
  मैंने बाज़ार जाने का विचार छोड़ दिया। लगा कि पहले इस बच्चे से बात करनी चाहिए। मैंने कहा –‘तुम कह रहे थे न तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया है।‘ और मैं उसे सामने वाले ढाबे में ले गया।   उसके लिए खाना और अपने लिए चाय मंगवा ली। मैं उसकी कहानी जानना चाहता था। मैंने देखा वह खा नहीं रहा है। मैंने कहा-‘तुम कह रहे थे न कि सुबह से कुछ नहीं खाया है, फिर खा क्यों नहीं रहे हो!’
  ‘आप ने मेरी रिक्शा में सवारी तो की नहीं,मैं मुफ्त में नहीं खाऊंगा,’ वह बोला। उसकी बात मुझे                                                                          अच्छी लगी। मैंने कहा-‘ तुमने ठीक कहा, मुफ्त में किसी से कभी कुछ नहीं लेना चाहिए। मैं इस भोजन के बदले तुमसे कोई काम ले लूँगा। अब तो खा लो।’ वह खाने लगा। उसे खाते हुए देख कर लग रहा था कि वह सचमुच बहुत भूखा था। इस बीच मैं उसके परिवार के बारे में पूछता रहा।   उसका नाम जगन था। उसने बताया कि उसके पिता बहुत गुस्सैल हैं। बात बेबात उसके साथ मार पीट किया करते थे, इसीलिए वह घर से भाग आया है। माँ के बारे में पूछते ही उसकी आँखों में आंसू भर आये। बोला-‘पिता जितना मार पीट करते थे माँ उससे ज्यादा प्यार करती थीं। 
  ‘तो माँ ने तुम्हें नहीं रोका यहाँ आने से?’
  ‘पिता के आगे माँ क्या करती भला। उनका प्यार मुझे पिटने से तो नहीं बचा सकता था।  इसीलिए मैं भाग आया। 
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  ‘माँ की याद तो आती होगी? कभी उनसे बात करते हो?’

  हम दोनों के पास मोबाइल नहीं है,बात कैसे हो? यहाँ मेरे गाँव के कई जने हैं,वही मेरी बात माँ को बताते हैं और उनका संदेसा मुझे लाकर देते हैं। जगन ने बताया ’वैसे माँ जल्दी ही मुझसे मिलने आएँगी,अभी हाल में उन्होंने कहलवाया है।‘ 
  ‘यह तो बहुत अच्छा होगा। मुझे भी मिलवाना अपनी माँ से।‘ फिर मैं चला आया। पर जगन की बात मन में घूमती रही। जहाँ मैंने जगन को खाना खिलाया था उस ढाबे का मालिक मुझे अच्छी तरह जानता था। मैंने जगन के बारे में उससे बात की तो वह जगन को काम पर रखने को राजी हो गया। ढाबे में ही उसके सोने का इंतजाम भी हो गया। मुझे तसल्ली हो गई थी और जगन भी खुश था। जब भी मैं ढाबे के सामने से गुजरता तो उसका हाल चाल पूछ लेता। ढाबे का मालिक जगन के काम से संतुष्ट था।   
  एक दिन जगन ने मुझे मोबाइल दिखाया। प्रसन्न स्वर में बोला-‘मालिक ने मुझे यह मोबाइल दिया है,अब मैं माँ से भी बात कर सकता हूँ।‘ 
  ‘पर तुमने कहा था न कि तुम्हारी माँ के पास मोबाइल नहीं है। फिर..’ 
  ‘हाँ यह तो है। ’-जगन ने कहा। ‘लेकिन..’ तभी ढाबे वाले ने उसे आवाज दी और वह अंदर चला गया। पर माँ के प्रति उसकी ललक साफ़ झलक रही थी,क्या जगन अपनी माँ से कभी मिल पायेगा! मैं यही सोच रहा था।  
  उस दिन दरवाजे की घंटी बजी,देखा तो जगन खड़ा था। मुझे आश्चर्य हुआ, इससे पहले तो वह कभी नहीं आया था। मैं कुछ पूछता इससे पहले ही उसने उत्तेजित स्वर में कहा- ‘जल्दी चलिए, माँ आई है, ढाबे में चाय पी रही है। आप उनसे मिल लो।‘ 
  मैं उसके साथ ढाबे पर जा पहुंचा। जगन एक औरत को बाहर बुला लाया। मैंने नमस्ते करके उससे पूछा-‘क्या आप जगन की माँ हैं?
  ’हाँ।‘ उस  ने कहा। मुझे कुछ अजीब लगा। वह जगन से दूर खड़ी हुई थी जैसे उसे जानती न हो।   क्या यही प्यार था एक माँ का इतने समय से बिछड़े हुए बेटे के लिए!           
   ‘इसे अपने साथ ले जाओ या यहाँ इसके साथ रहो।’-मैंने कहा। जगन की माँ ने मेरी बात का कोई 
जवाब नहीं दिया। बोली- ‘मुझे काम है।‘ और फिर वह जगन की ओर देखे बिना चली गई। जगन ने जैसे मेरे मन को पढ़ लिया, बोला-‘माँ को कोई काम था इसलिए जाना पड़ा।‘ और ढाबे में चला गया।  मैं जगन की माँ के अजीब व्यवहार के बारे में सोच रहा था,तभी एक रिक्शावाला मेरे पास आया।  उसने कहा-‘तो जगन ने आपको अपनी नकली माँ से मिलवा दिया।’
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  ‘नकली माँ!’-मैंने अचरज के भाव से पूछा। 
  ‘और नहीं तो क्या। जगन ने जिस औरत से आपको मिलवाया, वह उसकी कोई नहीं है। वह मेरे एक साथी की माँ है। जगन ने मेरे साथी से कई बार कहा कि वह अपनी माँ को कुछ देर के लिए उस की माँ बनने को कह दे, ताकि उसे अपनी माँ कह कर आप से मिलवा सके। इसके लिए उसने हम सब को ढाबे में चाय भी पिलवाई। 
  ‘मेरे सामने इतना नाटक क्यों?’-मुझे जगन पर गुस्सा आ रहा था। 
  ‘बाबूजी, वह आपकी बहुत इज्जत करता है।आपने उसकी इतनी मदद जो की है।‘ 
  ‘झूठा,फरेबी।‘- मैंने कहा। 
  ‘जगन कई सालों से अनाथालय में रह रहा था, पर वहां से भी निकाल दिया गया उसे।‘ 
  ‘लेकिन वह तो गाँव से भाग कर यहाँ आने की बात बता रहा था मुझे।‘गुस्सैल पिता और ममतामयी माँ के बारे में कहे गए उसके शब्द कानों में गूंजने लगे। और एक दिन मैं उस अनाथालय में जा पहुंचा जहाँ से जगन को निकाल दिया गया था। वहां के मैनेजर ने बताया कि जगन दूसरे बच्चों के साथ अक्सर झगड़ा करता था। वह कहा करता था कि गाँव में उसकी माँ रहती हैं और वह उनके पास चला जाएगा। इस पर दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।बस आपस में मार पीट हो जाती थी। एक बार किसी बच्चे ने उसे ‘बिना माँ का झूठा जगन’ कहा तो जगन ने उसे खूब मारा। उसकी शरारतों से तंग आकर उसे अनाथालय से निकाल दिया गया।   
  ‘क्या सच में गाँव में उसकी माँ थी और गुस्सैल पिता ने ही उसे अनाथालय के बाहर छोड़ दिया  था? आखिर सच क्या था?उस शाम मैं यह निश्चय करके ढाबे पर गया था कि उसके झूठ की पोल खोल कर रहूँगा और इसके बाद फिर कभी उससे नहीं मिलूँगा। मुझे देखते ही वह बाहर आ गया।बोला-‘माफ़ करना बाबूजी,उस दिन माँ को जरूरी काम था इसलिये वह जल्दी चली गई थीं उन्होंने कहा है कि अगली बार आयेंगी तब वह आपसे खूब बातें करेंगी।’
  यानि वह अब भी अपनी उस माँ की कल्पना में खोया हुआ था जो शायद कहीं थी ही नहीं।क्या  मैं उसकी आँखों में ममतामयी माँ की छवि देख पा रहा था! पता नहीं क्यों मुझे अपना गुस्सा पिघलता हुआ लगा। वह अपनी कल्पना में खोया हुआ था। मैंने अपना इरादा बदल दिया। मैं उसके सपने को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था। मैंने कहा-‘ठीक है जब अगली बार तुम्हारी माँ आएँगी तो हम तीनों खूब बातें करेंगे।‘ 
  ‘वाह तब तो खूब मज़ा आएगा।’-कह कर जगन खिलखिला उठा। मुझे भी हंसी आ गई। मैं न चाहते हुए भी उसके सपने में शामिल हो गया था।  (समाप्त)