Saturday, 19 August 2017

आओ नाश्ता करें -



रविवार की सुबह नाश्ते की मेज पर पकवानों और खिलखिलाहट की सुगंध के साथ उतरती थी ,लेकिन बाबा उस दावत मैं शामिल नहीं होते थे.वह अपना नाश्ता छत पर परिंदों के साथ करते थे.आखिर क्यों? :-

‘मेरा नाश्ता ऊपर भेज देना.’—कह कर अमित के बाबा छत की ओर जाने वाली सीढियां चढ़ने लगे. अमित के बाबा यानि शामलाल जी. अमित की मम्मी अल्पना नाश्ते की प्लेट लगा रही थी.उन्होंने कहा—‘बाबूजी, छत पर क्यों,अपने कमरे में आराम से बैठ कर...’ लेकिन बात पूरी न हुई,शामलाल जी तब तक छत पर जा चुके थे. अल्पना ने अमित के पापा की ओर देखा तो उन्होंने कंधे उचका दिए – यानि जैसी बाबूजी की मर्जी.
 रसोई की हवा में मिठास तैर रहा है. हलवा बन रहा है. फिर कटलेट की बारी है. रविवार की सुबह का नाश्ता विशेष होता है. तब पूरा परिवार एक साथ नाश्ते का आनंद लेता है.वर्ना हर सुबह भागमभाग और हड़बड़ी में गुज़रती है. पहले अमित स्कूल जाता है फिर उसके पापा विनय निकलते हैं. इसके बाद अल्पना जल्दी-जल्दी काम निपटा कर आफिस चली जाती है, यह सोच विचार करती हुई कि क्या काम अधूरा छूट गया है. इन तीनों के जाने के बाद अमित के बाबा घर में अकेले रह जाते हैं. दोपहर में अमित के स्कूल से लौटने के बाद दोनों साथ साथ भोजन करते हैं, अब शामलाल जी आराम करते हैं. क्योंकि इससे पहले काम वाली बाई आती है,उसका ध्यान रखना होता है, ऐसे में  आँख मूँद कर आराम से तो लेटा नहीं जा सकता.
शाम चार बजे बाबा को दवाई देकर अमित ट्यूशन पर चला जाता है. अमित के पापा के लौटने के काफी देर बाद अल्पना आती है, और कुछ देर आराम के बाद शाम के भोजन की तैयारी में जुट जाती है. घर और दफ्तर की छह दिनों की भागदौड़ की थकान इतवार की सुबह नाश्ते की मेज पर स्वादिष्ट पकवानों का मज़ा लेते हुए उतरती है.कभी कभी कोई दोस्त या रिश्तेदार् भी आ जाता है तो नाश्ते का मज़ा कई गुना बढ़ जाता है. घर में खिलखिल की लहरें उठने लगती हैं.लेकिन शामलाल जी को नाश्ते में शामिल ही नहीं किया जाता.इसलिए रविवार के नाश्ते के साथ घुलीमिली हंसी उन्हें एकदम अच्छी नहीं लगती.आखिर ऐसा क्यों होता है उनके साथ?
   अमित के पापा विनय से पूछो तो वह जो कुछ कहेंगे उसका मतलब इतना ही है कि उनके पिता शामलाल जी को कई रोगों ने घेर रखा है. इसलिए दवाओं के साथ परहेज का भोजन दिया जाता है.पर वह स्वादिष्ट चटपटे खान-पान के शौकीन हैं इसलिए ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन उनके पिता शामलाल इस बात को नहीं मानते.इसलिए रविवार का नाश्ता वह छत पर करते हैं -- तरह तरह के स्वादिष्ट पकवानों से दूर. नाश्ते की मेज़ से उठने वाली खिलखिल उनके मन को गुस्से से भर देती है. यदि कोई उनसे पूछे तो वह कहेंगे –अगर रविवार को मैं सबके साथ नाश्ता कर लूँगा तो कोई आफत नहीं आ जाएगी. हाँ मैं हमेशा से स्वादिष्ट और चटपटा खाने का शौकीन हूँ . लेकिन  इसके लिए मेरे साथ ऐसा व्यवहार मुझे पसंद नहीं.
---
अमित नाश्ते की प्लेट लेकर छत पर गया तो शामलाल जी मुंडेर के पास खड़े थे. अमित ने  प्लेट मेज़ पर रख दी.छत पर एक गोल टेबल और दो कुर्सियां रखी हैं. सर्दियों के मौसम में रविवार की दोपहर सब लोग छत पर धूप का आनंद लेते हैं. फिर वह बाबा के पास जा खड़ा हुआ. अमित ने देखा कि बाबा मिटटी के बड़े प्याले में छत पर लगे नल से पानी भर रहे हैं. मुंडेर पर कई बड़ी -छोटी कटोरियाँ रखी हैं.बड़ी कटोरियों में परिंदों के लिए पानी और छोटी कटोरियों में दाने हैं. मुंडेर से लगा कर पौधों के गमले रखे गए हैं. हवा में पत्तियां हिलडुल रही थीं. सर्दियों की धूप अभी नीचे नहीं उतरी थी. हवा में परिदों के पंखों की फड़ फड़ और चूं चिर्र गूँज रही थी.
‘’बाबा, नाश्ता..’—अमित ने कहा तो बाबा ने नाश्ते की प्लेट की ओर देखा-- दो बिना मक्खन के टोस्ट,दो बिस्किट, एक कप दूध और एक छोटी कटोरी में दवा की गोलियां.हाँ यही हर दिन का नाश्ता है.रविवार को भी इसमें कोई बदलाव नहीं होता. उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—‘ हाँ देख रहा हूँ,  करना ही है. मैं परिंदों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. हम साथ साथ नाश्ता करेंगे.’’
‘ परिदों के साथ नाश्ता!’—अमित ने अचरज से कहा.
‘’ हाँ यह ठीक है कि परिंदे और हम एक दूसरे की बोली नहीं बोल सकते लेकिन एक दूसरे के भाव जरूर समझ सकते हैं. पशु- पक्षी जगत के प्राणी कब खुश या नाराज या डरे हुए होते हैं इसे समझा जा सकता है. क्या तुमने डाक्टर डू लिटिल के बारे में सुना है?’
अमित ने इनकार में सिर हिला दिया.
‘ वह एक ऐसे डाक्टर थे जिनके घर में अनेक पालतू पशु पक्षी रहते थे.इसलिए रोगी उनके पास आने से डरते थे. इसलिए उनका दवाखाना बंद हो गया. तब किसी ने उन्हें जानवरों का डाक्टर बनने की सलाह दी.एक तोते ने उन्हें जानवरों की बोलियाँ सिखाई और वह जानवरों के अनोखे डाक्टर बन गए. जानवरों का इलाज करने के लिए डू लिटिल ने दूर दूर की यात्राएँ की.’
‘यह तो कहानी है.’—अमित ने कहा.
       हर कहानी में कुछ सच्चाई भी होती है.’—कह कर बाबा हंसने लगे. बोले—‘ अनेक लोग घरों में पशु पक्षी पालते हैं ,वे उनके भाव अच्छी तरह समझते हैं.’’  
       ‘’हाँ.यह तो ठीक कहा आपने.’—अमित बोला.’
       ‘’तो बस हमारी छत पर उतरने वाले परिदों के बारे में भी यही सच है.’’
      ‘’पर छत पर आने वाले परिंदों के साथ कैसे नाश्ता करेंगे आप?’’—अमित ने पूछा.
       जब परिंदे दाना चुगेंगे तो भी टोस्ट खा लूँगा.’’—बाबा बोले.
       अमित देखता रहा पर कोई चिड़िया या कबूतर नीचे नहीं उतरा.उसने कहा—‘’अगर कोई पक्षी नहीं उतरा तब आप क्या करेंगे?’
        ‘’ तब तो मुझे नाश्ता अकेले ही करना होगा.खैर इसे छोड़ो,यह बताओ आज रसोई में क्या बन रहा है?’
      ‘’माँ ने हलवा और कटलेट बनाए हैं. मेरी मौसी भी आ रही हैं मालपुए और समोसे लेकर.’’
       ‘’ वाह ,तब तो बढ़िया दावत होगी.जिस गली में मेरा जन्म हुआ था वहां के हलवाई बहुत अच्छे मालपुए बनाते थे.दूर दूर से लोग  लेने आते थे. उनका स्वाद मुझे आज भी याद है.’’ बाबा   बोले. यह कहते हुए उनकी आँखें बंद थीं जैसे अपने बचपन की गलियों में पहुँच गए हों.
     अभी तक छत पर कोई  परिदा नहीं उतरा था. अमित ने धीरे से कहा—‘ बाबा,नाश्ता.’
     शामलाल जी ने कहा—‘ मुझे लगता है एक ही तरह के दाने चुग कर बेचारे बोर हो गए हैं. इतवार को तो उनके भोजन में कुछ बदलाव होना ही चाहिए.क्या कहते हो ?’’
       ‘’बात तो आपकी ठीक है,लेकिन ...’ अमित ने कहना चाहा.
       ‘’अगर मेरी बात ठीक मानते हो तो कुछ करो परिंदों का जायका अच्छा करने के लिए.’  
         अमित कुछ सोच रहा था,फिर तेजी से नीचे चला गया.  तब तक सब नाश्ता कर चुके थे और मेज से उठ कर कमरे में जा बैठे थे. अमित रसोई में गया.उसने मालपुए, समोसे और कटलेट एक प्लेट में रखे और छत पर जा पहुंचा. देख कर बाबा हंसने लगे. उन्होंने कहा—‘ अमित, तुम इनके टुकड़े करो, हम इन्हें कटोरियों में रख कर परिंदों के आने की प्रतीक्षा करेंगे.’ अमित और बाबा ने मिल कर मालपुए,कटलेट और समोसे के टुकड़ों को मुंडेर पर रखी छोटी छोटी कटोरियों में रख दिया. अब बाबा मुंडेर के पास खड़े होकर दोनों हाथ हिलाते हुए बार बार  ‘आओ आओ नाश्ता करो’ कहने लगे. अमित ने भी बाबा का अनुसरण किया. लेकिन देर तक भी कोई परिंदा नहीं आया. एकाएक बाबा ने कहा—‘अब समझ में आया कि बात क्या है.’’
        ‘क्या?’
        ‘’जब तक हम मुंडेर के पास खड़े रहेंगे तब तक परिदे नीचे नहीं उतरेंगे.’’
      ‘’तब हम क्या करें?’—अमित ने पूछा .’’
       ‘’हमें पीछे या नीचे चले जाना चाहिए.’—बाबा ने कहा.
       बात अमित की समझ में आ गई. बाबा ने कहा—‘’ तुम नीचे चलो मैं भी नाश्ता करके आता हूँ.’’
अमित सीढियों से उतरने लगा.पर फिर ऊपर चला आया. उसने देखा बाबा मुंडेर के पास खड़े हुए थे,मुंडेर पर कोई परिंदा नहीं था, पर बाबा नाश्ता कर रहे थे. अमित का मन हुआ कि बाबा से कुछ पूछे लेकिन फिर रुक गया. उसे बाबा का नाश्ता करना अच्छा लग रहा था.कम से कम रविवार को तो बाबा चिड़ियों के साथ नाश्ता कर ही सकते थे. उसने तै कर लिया था कि वह इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहेगा,बाबा से भी नहीं.                        ( समाप्त)     

Monday, 10 April 2017

छड़ी कबूतर



छड़ी कबूतर
--देवेन्द्रकुमार
कबूतर तो वही कर रहे थे जो वे न जाने कब से करते आ रहे हैं. लेकिन अनुज और अजय क्यों उलझ गए! इस उलझन से निकलना आसान नहीं था.और फिर ऐसा क्या हुआ. ..
             
अनुज दोपहर में दो बजे स्कूल से लौटता है. आते ही माँ गरम भोजन परोस कर कहती हैं –खाकर कुछ देर आराम कर ले,फिर..’ फिर उसे ट्यूशन पर जाना होता है- ठीक चार बजे. इस दिनचर्या से रविवार को ही छुटकारा मिलता है. भोजन के बाद अनुज जैसे जबरदस्ती लेट जाता है. कभी नींद लग जाती है तो कभी इसी सोच में समय बीत जाता है कि रविवार के दिन दोस्तों के साथ कैसे मस्ती करेगा.                                         
इधर एक नई परेशानी खड़ी हो गई है कबूतरों की. जिस कमरे में अनुज खाना खा कर आराम करता है उसकी छत का कुछ प्लास्टर गिर गया है. वहां मरम्मत हो रही है, इसलिए अनुज को दूसरे कमरे में जाना पड़ा ,  लेकिन पहले ही दिन कबूतरों की गुटर गूं और पंखों की फड़ फड़ के शोर ने उसे परेशान कर दिया.  कबूतर कमरे के बाहर बालकनी में शोर कर रहे थे. अनुज लेटा न रह सका. उठ कर बालकनी का दरवाजा खोला तो कबूतर उड़ गए. अनुज ने सोचा—कबूतर अब नहीं आएंगे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही गुटरगूं और पंखों की फड़ फड़ फिर सुनाई देने लगी. अनुज ने दरवाज़ा खोला तो कबूतर उड़ गए. कबूतरों और अनुज के बीच यह लुका छिपी इतनी बार हुई कि वह थक कर दूसरे कमरे में चला गया,तब तक ट्यूशन पर जाने का समय हो गया.
दूसरी दोपहर भी कबूतरों ने वही किया जो वे न जाने कब से करते आ रहे थे. अनुज ने जैसे ही बालकनी का दरवाजा खोला कबूतर फड़ फड़ करते उड़ गए, लेकिन पिछले दिन की तरह फिर लौट आये. अनुज ने लेटे हुए ही हाथ बढ़ा कर बालकनी का बंद दरवाजा खडखडा दिया.  वह सोच रहा था कि इस तरह शैतान कबूतर उड़ जायेंगे, लेकिन कबूतर वैसे ही शोर करते रहे. आखिर अनुज को उठ कर बालकनी में जाना ही पड़ा. अब कबूतर उड़ गए. जितनी देर वह बालकनी में खडा रहा कबूतर नहीं आये, लेकिन जैसे ही अन्दर लौटा, उसके कुछ देर बाद ही पंखों की फड़ फड़ फिर शुरू हो गई. अनुज समझ नहीं पाया कि इस मुश्किल से छुटकारा कैसे मिले. आखिर वह उसी कमरे में चला आया जहां छत की मरम्मत हो रही थी.
माँ ने पूछा—‘’क्या हुआ?’
1
‘’कबूतर परेशान कर रहे हैं.’—अनुज ने बताया तो माँ हंसने लगीं—‘ कबूतर तो शोर करते ही हैं. तुम आँखें बंद करके लेटो तो नींद आ जायेगी.’’
‘ मैं भी परेशान करूंगा शैतान कबूतरों को.’’ –अनुज ने गुस्से से कहा और ट्यूशन के लिए चला गया. उसने कह तो दिया लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि कबूतरों को उनकी शैतानी के लिए क्या और कैसे सजा दे. एकाएक उसे लगा जैसे उसके पंख निकल आये हैं और वह अपने कमरे की बालकनी के आसपास उड़ रहा है. जैसे ही कई कबूतर बालकनी की तरफ उड़ते हुए आते हैं वह उनकी ओर झपटता है, कबूतर दूर उड़ जाते हैं और फिर कमरे की बालकनी की ओर नहीं आते. अपनी इस कल्पना पर वह मुस्कराया फिर बुदबुदा उठा —‘ऐसा तो सिर्फ कहानी में होता है.’ जब वह घर लौटा तो शाम ढल चुकी थी. वह सीधा बालकनी में गया. वहाँ सन्नाटा था, कबूतर कहीं नहीं थे. उसने चैन महसूस किया.तभी उसकी नजर एक तरफ पड़ी बांस की पतली छड़ी पर गई. अनुज ने तुरंत उसे उठा लिया. कुछ पल सोचता रहा फिर उसे हवा में इधर उधर घुमाने लगा.
अगली दोपहर उसने बालकनी के पल्ले खोलकर पर्दा डाल दिया. फिर उसके पीछे छिप कर खड़ा हो गया. उसे छज्जे की रेलिंग दिखाई दे रही थी. उसने बांस की छड़ी को मजबूती से थामा हुआ था,उसने सोच लिया था कि जैसे ही कबूतर छज्जे की रेलिंग पर उतरेंगे वह छड़ी से वार करेगा. किसी न किसी कबूतर को तो जरूर चोट लगेगी. अगर दो तीन बार ऐसा हुआ तो शैतान कबूतर इधर आने की भूल नहीं करेंगे.  लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा अनुज ने सोचा था. जैसे ही कबूतर रेलिंग पर उतरे अनुज ने छड़ी से वार किया लेकिन शायद किसी कबूतर को छड़ी की चोट नहीं लगी. क्योंकि कबूतर फिर लौट आये. अनुज ने कई बार छड़ी से वार किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. क्योकि थोड़ी देर बाद शैतान कबूतर फिर लौट आते थे. बस छड़ी हर बार रेलिंग से टकरा कर रह जाती थी.
परेशान होकर अनुज बालकनी में निकल आया. हाथ की छड़ी हिलाते हुए वह इधर उधर देखने लगा. उसका प्लान फेल हो गया था. शैतान कबूतर जीत गए थे. अब क्या करे? अनेक कबूतर कई फ्लेटों के छज्जों में उतर-उड़ रहे थे पर कोई अनुज की तरफ नहीं आ रहा था. शैतान कबूतर चालाक भी थे. कुछ पल इसी तरह खड़े रहने के बाद वह कमरे में जाने के लिए मुड़ने लगा तो किसी की हंसी सुनाई दी. उसने आवाज़ की दिशा में देखा तो सामने वाले ब्लाक के फ़्लैट की खिड़की में एक लड़का दिखाई दिया. वही हंस रहा था. नजर मिलते ही उसने कहा—‘ तुम्हारी छड़ी कबूतरों का कुछ नहीं कर सकती. हाँ मेरे पास एक तरकीब है.’
‘’ कैसी तरकीब?’—अनुज ने पूछ लिया. आखिर कौन था वह लड्का और उसे क्यों देख रहा था!
जवाब में उस लड़के ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर दिखाया.उसके हाथ में एक गुलेल थी.
‘’ गुलेल से क्या करोगे?’’—अनुज ने पूछा.
‘’ गुलेल से निशाना लगाऊंगा तो किसी न किसी कबूतर को जरूर चोट लगेगी. फिर वे कभी तुम्हारी बालकनी की तरफ नहीं आयेंगे.’’—उस लड़के ने कहा और गुलेल का रबर खींचते हुए बोला तुम अंदर चले जाओ नहीं तो..’
2

अनुज ने हडबडा कर कहा—‘ अरे नहीं ऐसा मत करना. गुलेल की चोट से कबूतर घायल हो सकते हैं.शायद कोई मर भी जाए.’      
‘’ तो फिर कबूतर तुम्हें परेशान करना बंद नहीं करेंगे. तुम अपनी छड़ी से चाहे कितने भी वार क्यों न करो ,कबूतरों का कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे,’’—उस लड़के ने कहा. ‘’इन शैतानों को गुलेल से ही भगाया जा सकता है.’
‘’ रुको अभी गुलेल मत चलाना.’’—अनुज ने कहा. वह कुछ घबरा गया था. गुलेल की चोट से कबूतर घायल हो सकते थे. शायद कोई मर भी जाये. नहीं नहीं उस लड़के को रोकना होगा. यह ठीक है कि वह कबूतरों के शोर से परेशान था लेकिन गुलेल से कबूतरों को चोट पहुंचाने की तो सोच भी नहीं सकता था. उसने लड़के का नाम और फ़्लैट नम्बर पूछ लिया. वह तुरंत उससे मिलकर कहना चाहता था. चलने से पहले उसने एक किताब ले ली. अनुज के जन्मदिन पर उसके मामाजी ने पुस्तकें उपहार में दी थीं. उसके पापा कहते थे –किसी के घर खाली हाथ कभी न जाओ. लड़के का नाम अजय था.
फ़्लैट का दरवाज़ा अजय की मम्मी ने खोला. अजय खिड़की के सामने बैठा था. उसके पैर पर पट्टी बंधी थी. उसने बताया कि फिसल कर गिरने से चोट लग गई थी. अब पहले से ठीक है. पास  ही गुलेल रखी थी. अनुज ने उसे किताब दी. कहा –‘ मेरे जन्म दिन पर मामाजी ने उपहार में दी हैं कई पुस्तकें.’’ अजय किताब उलटपलट कर देखने लगा. इतने में अनुज ने गुलेल उठा ली. वहां से अपने फ़्लैट की बालकनी और रेलिंग पर बैठे कबूतर दिखाई दे रहे थे. अजय बोला—‘देखो यहाँ से कबूतरों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है.’
अनुज ने अपने मन की बात कह दी—‘ मैं यही कहने आया हूँ कि कबूतरों पर गुलेल मत चलाना. ‘’
‘’लेकिन ...’
‘’ कबूतरों को चोट पहुंचाना ठीक नहीं. हाँ यह तो बताओ तुमने गुलेल कब खरीदी?’
‘’ मैंने नहीं खरीदी मेरे मामाजी ने दी थी.’—अजय ने बताया.
अनुज ने कुछ सोचा फिर बोला –‘मैंने तुम्हे किताब दी है. क्या तुम मुझे कुछ नहीं दोगे ?
क्या दे सकता हूँ मैं?’’ – अजय पूछ रहा था.
‘’ गुलेल.’’—अनुज ने कहा.
‘ गुलेल किसलिए? तुम क्या करोगे इसका?’ –अजय ने अचरज से पूछा. और गुलेल अनुज को थमा दी.
‘’ कुछ तो जरूर करूंगा लेकिन अभी नहीं बता सकता..—अनुज ने कहा और मुस्करा उठा. ‘’वादा करो कि गुलेल को वापस नहीं मांगोगे और दूसरी खरीदोगे भी नहीं.’’
3  
‘’ तो तुम भी यह किताब वापस मत लेना.’’—अजय ने कहा और मुस्कराने लगा.
‘’ यह किताब तो तुम्हारे लिए लाया हूँ. अगली बार और पुस्तकें लेकर आऊंगा. मेरे पापा पढने के शौकीन हैं. वह मेरे लिए नई नई किताबें लाते रहते हैं. मेरे पास भी बहुत किताबें जमा हो गई हैं. कभी आओ तो दिखाऊंगा, पढने को भी दे सकता हूँ.’—अनुज बोला. यह कहते हुए उसकी आँखें अपनी बालकनी पर टिकी थीं.वहां कई कबूतर रेलिंग पर बैठे थे. बार बार उड़ते और फिर लौट आते. सचमुच अजय की खिड़की से कबूतरों को गुलेल से निशाना बनाया जा सकता था. लेकिन वह ऐसा कभी नहीं होने देगा.
‘’ अजय ने कहा—‘ पैर की चोट ठीक होने पर जरूर आऊंगा. तब देखूंगा तुम्हारी पुस्तकें.’’
कुछ देर बाद अनुज वहां से चला आया. अपने घर की ओर चलते हुए उसने गुलेल का रबर निकाल कर फैंक दिया. फिर गुलेल भी नाली में डाल  दी. गुलेल पानी में खो गई. घर लौट कर सीधा  बालकनी में गया. वहां गुटर गूं करते कबूतर तुरंत उड़ गए. वह मुस्करा कर अजय के फ़्लैट की ओर देखने लगा, वहां कोई नहीं था. उसे उम्मीद थी कि चोट ठीक होने पर अजय किताबों से मिलने आएगा. कुछ देर बाद कबूतर फिर लौट आये थे.अनुज ने दरवाज़ा खोल कर कबूतरों को भगाने की कोशिश नहीं की. माँ उसे समझाती हैं – कबूतर जो करते हैं वही करेंगे ,तुम अपना काम करो. अनुज ने पापा से मिली नई किताब खोल ली. बाहर बालकनी में गुटर गूं हो रही थी. ( समाप्त )
  

Sunday, 11 September 2016

अध्यापक , देवेन्द्र कुमार,बाल कहानी



बस में उस लड़के ने ऐसा क्या किया जो रामेश्वर का खेल ही बिगड़ गया. वह बहुत गुस्से में था. और फिर दोनों हंसने लगे .हँसते गए. बस में बैठे लोग हैरान थे. आखिर हुआ क्या था.

बस में बहुत भीड़ थी और उस पर गरमी का मौसम। घुटन के मारे लोगों का बुरा हाल था, लेकिन फिर भी वे भेड़-बकरियों की तरह यात्रा करने को विवश थे। अगर आराम से यात्रा करने की सोचें तो बस में चढ़ने के लिए एक-दो घंटे नहीं, शायद कई दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़े।
पर रामेश्वर के लिए यों सफर करना कोई मजबूरी नहीं थी और उस भीड़-भाड़ में उसका जी भी नहीं घबराता था, बल्कि वह एक तरह का आराम अनुभव कर रहा था।
रामेश्वर कभी खाली बस में नहीं चढ़ता। वह हमेशा उस बस में चढ़ता है, जिसमें यात्री ठसाठस भरे होते हैं। कोई उससे इसका  कारण जानना चाहे तो वह हँसकर रह जाएगा। जवाब उसकी आंखें दे रही होंगी, ‘क्या किया जाए अपना धंधा ही ऐसा है।
बस में रामेश्वर की आंखें उस काली टोपी वाले की ओर लगी हुई थीं, जो इस समय उससे थोड़ा आगे खड़ा था। बस में चढ़ते समय रामेश्वर उस व्यक्ति के बिलकुल पीछे था। बाद में धक्का-मुक्की के कारण बीच में दो व्यक्ति और आ गए थे।
वह काली टोपी वाला व्यक्ति काफी देर से रामेश्वर की नजरों में था। कुछ देर पहले जब रामेश्वर बस-स्टैंड पर खड़ा ठसाठस भरीबस का इंतजार कर रहा था तो वह आदमी नजर आया था। रामेश्वर ने उसे सड़क के पार वाले बैंक से निकलते देखा था। बाहर आते ही उस व्यक्ति ने अपने कोट की अंदर वाली जेब पर हाथ रखा था और फिर तुरंत हटा भी लिया था, लेकिन रामेश्वर के लिए इतना ही संकेत बहुत था। रामेश्वर दिलचस्पी से उस आदमी को परखता रहा। वह आदमी
1
बैंक की सीढि़यों पर खड़ा-खड़ा इधर-उधर देखता रहा, फिर अनिश्चित कदमों से टैक्सी-स्टैंड की तरफ चल दिया। यह देखकर रामेश्वर थोड़ा निराश हो गया, लेकिन फिर उसने देखा कि काली टोपी वाला आदमी टैक्सी में नहीं बैठ रहा है। वह कुछ इस तरह खड़ा थ कि टैक्सी वाले उसे सवारी मान भी सकते थे  और नहीं भी
वह टैक्सी में नहीं बैठेगा। वह डर रहा है।रामेश्वर ने मन ही मन कहा।
रामेश्वर का अनुमान ठीक निकला। कुछ देर टैक्सी-स्टैंड पर खड़े रहने के बाद वह आदमी बस स्टैंड पर आ गया। वह रामेश्वर के पास आ खड़ा हुआ और उसने गहरी नजरों से रामेश्वर को देखा। इसके बाद टोपी वाले ने जल्दी-जल्दी कोट के बंद बटनों पर हाथ फिराया। बीच में उसकी उंगलियां अंदर वाली जेब पर रुकीं। रामेश्वर ने ध्यान में यह सब देखा। अब शक की गुंजाइश नहीं था। रामेश्वर ने उसे अपना शिकार मान लिया था। लंबा हाथ मारने की कल्पना से वह मन ही मन प्रसन्न हो उठा। अब रामेश्वर को बस में कुछ पलों के लिए उसके पास खड़े होने का मौका चाहिए था। एकाएक ड्राइवर ने जोर का ब्रेक लगाया और रामेश्वर अपने आगे वाले यात्री से जा टकराया।
‘‘संभलकर नहीं खड़ा हुआ जाता।’’ वह आदमी गुर्राया।
‘‘मेरा क्या दोष है भैया!’’ रामेश्वर ने नरम स्वर में कहा और उसकी बगल से आगे निकल आया। अब उसके और टोपी वाले के बीच में बस एक आदमी और था।
रामेश्वर अगल-बगल की सीटों पर बैठे लोगों की ओर देखने लगा। हाथ की सफाई दिखाते समय इधर-उधर का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। दाईं तरफ वाली सीट पर दो सवारियां बैठी ऊंघ रही थीं, बायीं ओर वाली सीट पर कालेज के छात्र जैसे दिखने वाले दो लड़के बैठे हुए थे।
एकाएक रामेश्वर को लगा जैसे बायीं ओर किनारे वाली सीट पर बैठा लड़का ध्यान से उसकी ओर देख रहा है। रामेश्वर सिर घुमाकर दूसरी तरफ देखने लगा। कुछ पल यों ही बीत गए। रामेश्वर ने नजर घुमाई तो पाया वह लड़का अब भी उसकी ओर देखे जा रहा है। खैर जो भी हो, अब उसे अपना काम जल्दी पूरा करना था, क्योंकि जोरबाग का स्टैंड आ रहा था । रामेश्वर ने अपने शिकार को जोरबाग का टिकट मांगते हुए सुना था। उसे अपना काम करके जोरबाग से कुछ पहले ही उतरना  होगा। यह सोचकर रामेश्वर थोड़ा और आगे खिसक गया।
तभी पीछे से किसी ने पुकारा, ‘‘नमस्कार सर, आइए सीट खाली है।’’
2
रामेश्वर अचकचा गया। उसने गर्दन घुमाकर देखा, बायीं तरफ बैठा वही लड़का उठ खडा़ हुआ है और हाथ जोड़कर खाली सीट पर बैठने की प्रार्थना कर रहा है। उसने याद करने की कोशिश की लेकिन उस लड़के को पहचान नहीं सका।
‘‘सर, आइए न!’’ लड़के की आवाज फिर सुनाई दी,‘‘मैं देख रहा हूं, आप बहुत देर से खड़े हैं। क्षमा करें मैं अब तक आपको पहचान नहीं पाया था।’’
रामेश्वर को घूमकर उसकी ओर देखना पड़ा था। वह उसी तरह सीट छोड़कर खड़ा था।
‘‘क्या तुमने मुझसे कुछ कहा?’’ रामेश्वर ने पूछा।
‘‘जी सर, आइए बैठिए ना!’’ कहते हुए लड़का खुलकर हंस पड़ा।
‘‘नहीं, नहीं तुम बैठो,’’ रामेश्वर ने जल्दी से कहा और मन ही मन एक भद्दी-सी गाली दी उसे, सीट पर बैठने का मतलब होगा शिकार को बचकर निकल जाने देना।
‘‘आप खड़े रहें और मैं...’’ लड़का फिर कह रहा था।
‘‘कोई बात नहीं, आजकल सब चलता है। लेकिन मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूं।’’ रामेश्वर ने कहा।
‘‘सर, स्कूल में इतने लड़के आते हैं। आप सबको कहां तक याद रख सकते हैं, लेकिन मैं आपको कभी नहीं भूल सकता।’’ लड़के ने कहा।
रामेश्वर कुछ और कहता, इससे पहले उसके आगे खड़ा व्यक्ति उस खाली सीट पर बैठ गया। अब रामेश्वर और उसके शिकार के बीच कोई नहीं था।
‘‘सर!’’ लड़का क्रोधित हो उठा।
रामेश्वर जोर से हंस पड़ा। वह मन ही मन सीट पर बैठने वाले व्यक्ति को धन्यवाद दे रहा था।
‘‘कोई बात नहीं, मुझे बस में बैठकर सफर करना अच्छा नहीं लगता।’’ रामेश्वर यह कैसे कहता कि अगर वह बस में बैठकर यात्रा करे तो हाथ की सफाई दिखाने का मौका कैसे मिलेगा।
‘‘आप कहां जाएंगे?’’ लड़के ने पूछा।
3

रामेश्वर एकाएक कुछ कह न पाया, क्योंकि वह कहीं जाने के लिए तो बस में चढ़ा नहीं था ,  फिर उसने ऐसे ही किसी जगह का नाम बता दिया।
‘‘जी, मैं भी वहीं जा रहा हूं। हम वहीं रहते हैं।’’ लड़का खुशी से बोला, ‘‘आपको मेरे घर चलना होगा।’’
रामेश्वर का खून खौल उठा। इस लड़के ने तो सारा खेल ही बिगाड़ दिया है। उसने लड़के की किसी बात का जवाब नहीं दिया। वह खिसकता हुआ टोपी वाले से एकदम सटकर खड़ा हो गया। उसके हाथ टोपी वाले की जेब तक पहुंचने के लिए तैयार थे।
‘‘सर, आप तो अब भी उस दयानंद हायर सेकेंड्री स्कूल में पढ़ा रहे होंगे?’’ रामेश्वर ने उस लड़के को कहते सुना।
‘‘तुम क्या करते हो?’’ रामेश्वर ने जवाब देने के बदले सवाल पूछ लिया। बात कुछ-कुछ समझ में आ रही थी। शायद लड़का उसे दयानंद स्कूल का कोई अध्यापक समझ बैठा था गलती से।       
रामेश्वर का प्रश्न सुनकर लड़का उदास हो गया। निराश स्वर में बोला , ‘‘जी, पढ़ाई बीच में ही रह गई। आपको शायद पता न हो, दो वर्ष पहले मेरे पिताजी नहीं रहे। आप तो जानते ही होंगे कि वह कितने बीमार रहते थे।’’
रामेश्वर ने ध्यान से लड़के की ओर देखा। वह सिर झुकाकर आंसू पोंछ रहा था। रामेश्वर ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। मृदु स्वर में बोला, ‘‘तो इसमें निराश होने की कौन-सी बात है। धीरज रखना चाहिए। हिम्मत करके पढ़ते रहो। अभी नौकरी की उम्र भी तो नहीं है, लेकिन ट्यूशन कर सकते हो।’’
‘‘जी, वही कर रहा  हूँ ।’’ लड़के ने कहा, फिर जैसे कोई भूली हुई बात याद आ जाए इस तरह बोला, ‘‘मैंने तो आपको बस में चढ़ते समय ही देख लिया था, लेकिन बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी।’’
‘‘क्यों?’’ रामेश्वर को पूछना पड़ा।

4
‘‘सोच रहा था, मेरी चोरी वाली बात आपको अब तक याद होगी। एक बार साथी के पैसे चुराने पर आपने मुझे बहुत डांटा था। फिर सोचा, अब तो मैं ऐसा करता नहीं जो आपसे मुंह चुराऊं। आपको तो यह जानकर खुशी ही होगी कि उसके बाद वैसी हरकत मैंने कभी नहीं की।’’
‘‘अच्छा... अच्छा...’’ रामेश्वर सिर्फ इतना कह सका। एकाएक उसकी आंखों के सामने एक चित्र तैर गया, वह कुर्सी पर बैठा है। यह लड़का सामने खड़ा है और चोरी के अपराध की क्षमा मांग रहा है।
एकाएक रामेश्वर जैसे सोते से जाग गया।
कंडक्टर चिल्ला रहा था, ‘‘जोरबाग... जोरबाग...’’ 
‘‘अरे!’’ रामेश्वर के होठों से निकल गया। उसने देखा उसका शिकार टोपी वाला बस से नीचे उतर रहा है।
एक पल को रामेश्वर कुछ बोल न सका। उसे अपना गला रुंधता हुआ महसूस हुआ। बस की खिड़की में से टोपी वाले की आकृति उसे दूर जाती दिखाई दी।
कमबख्त को मेरे चेहरे में न जाने कौन-सा अध्यापक नजर आ रहा है!उसके हाथों के ठीक नीचे से टोपी वाला सुरक्षित बच निकला था। रामेश्वर उसकी जेब को छूने का मौका ही नहीं पा सका था इस अनजान लड़के के कारण। उसने गुस्से से लड़के को देखा। वह मुस्करा रहा था। रामेश्वर भी हंस पड़ा और हंसता ही गया। लड़का भी हंसने लगा। बस में बैठे लोग आश्चर्य से दोनों की ओर देख रहे थे।
जब लड़के का स्टाप आया तो रामेश्वर उसका हाथ थामकर नीचे उतर आया। लड़के ने अपने घर चलने के कहा तो उसने मना कर दिया। उससे काफी देर तक बस स्टैंड पर ही बातें करता रहा। उसे लग रहा था जैसे वह रामेश्वर जेबकतरा नहीं, उसी अनजान लड़के का भूला-भटका अध्यापक है।
‘‘तो मैं चलता हूं।’’ अंत में रामेश्वर ने कहा।
‘‘आशीर्वाद दीजिए सर!’’ कहते हुए लड़का उसके पैरों में झुक गया।
5

‘‘अरे रे...’’ कहते हुए रामेश्वर ने लड़के को कंधों से थाम लिया। बोला, ‘‘बड़े होकर अच्छे आदमी बनो! यही आशीर्वाद है। इसके अतिरिक्त हम और दे भी क्या सकते हैं। तुम्हें चोरी की गलती आज तक याद है, यही बहुत है।’’
लड़का नमस्कार करके चला गया। रामेश्वर खोया-सा खड़ा रह गया।
काश, मैं सचमुच ही उस लड़के का अध्यापक होता।’’ उसने होंठों-होंठों में कहा और पैदल ही लौट चला। अनेक ठसाठस भरी बसें उसके पास से गुजर गईं। कोई और समय होता तो वह उनमें से किसी बस में जरूर चढ़ जाता, लेकिन वह तो उसी लड़के के बारे में सोच रहा था, जो अपने घर पहुंचकर मां को पुराने अध्यापक से मिलने की घटना बताकर खुश हो रहा होगा।
रामेश्वर चला जा रहा था। मन में खुशी थी, पछतावा नहीं था। वह याद करने की कोशिश कर रहा था, इतनी खुशी उसे कब मिली थी!  (समाप्त )