Monday, 11 December 2017

अजब किताब



छोटी-छोटी बातें मिलकर
एक बनेगी बड़ी किताब
पढ़ा लिखा था तुमने कितना
और बताओ कितना खेले
कब मम्मी की बात न मानी
कितनी बार झूठ बोले थे
काम न करने पर टीचर से
कब कब पड़ी कहो फटकार?
कैसे हंसे, रुलाया किसने
पड़े पीठ पर कितने मुक्के
पापा क्यों गुस्सा होते हैं
मम्मी कब हंसती हैं भैया
दादी के चश्मे का शीशा
कब टूटा था?
ऐसी ही कितनी ही बातें
खट्ठी-मीठी प्यारी बातें
याद करोगे तो फिर मिलकर
एक बनेगी बड़ी किताब
यह तो होगी प्यारी प्यारी
हंसनी-रोनी अजब किताब

Thursday, 30 November 2017

वह मेरा दोस्त



क्या वे दोनों आपस में दोस्त थे? एक जना दूसरे को अपना मित्र कह रहा था. लेकिन दूसरे को इस बारे में कुछ पता नहीं था. वह तो इस सम्बन्ध की कल्पना भी नहीं कर सकता था. क्या यह दोस्ती कुछ अजीब नहीं थी? थी जरूर थी, लेकिन फिर भी वह लगातार गहरी होती जा रही थी.

‘’ पापा,क्या सचमुच यह आपका दोस्त है!’—विमल ने  रिक्शा वाले की पीठ की ओर इशारा करते हुए शायद पांचवीं बार पूछा था. और पिता रजत ने होठों पर ऊँगली रख कर चुप रहने का संकेत करके धीरे से  कहा था‘हाँ.’ लेकिन विमल की तसल्ली न हुई, उसे जैसे पापा की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. और हो भी कैसे सकता था. उसने पापा के सभी दोस्तों को देखा है ,उनके परिवार के बच्चों के साथ खेला है. पापा के कई मित्र दफ्तर में साथ काम करते हैं. आज से पहले रजत ने किसी रिक्शा वाले को अपना दोस्त नहीं कहा था. तो फिर इसके साथ पापा की मित्रता कब और कैसे हो गई थी, यही बात विमल को हैरान कर रही थी.
सोसाइटी के गेट पर रिक्शा से उतर कर रजत अंदर की ओर बढ़ चले. विमल ने रुक कर ध्यान से रिक्शा वाले की ओर देखा— कंधे पर अंगोछा ,बदन पर मैली कमीज़ और पाजामा, चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी,क्या सच में यह पापा का नया दोस्त है! यही सोचता हुआ विमल घर में चला गया. एकाएक उसे ध्यान आया कि पापा ने रिक्शा वाले को किराया नहीं दिया था ,पर उसने माँगा भी नहीं था. उसने सबसे पहले यह बात माँ विभा को बताई तो वह भी चौंक गईं.
दोपहर में भोजन करते हुए विभा ने रजत से कहा—‘’ सुना है आजकल आपने एक रिक्शा वाले से दोस्ती की है.’’
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‘’ हां खिलावन रिक्शा चलाता है.’’—कह कर रजत चुप हो गए. पर वह जानते थे कि पूरी बात बताये बिना मामला शांत नहीं होने वाला. सुबह वह हेयर कटिंग सैलून जाने लगे तो विमल भी साथ चल दिया. रविवार के कारण सैलून में भीड़ थी. विमल सैलून के बाहर बरामदे में चला गया. उसे देख कर सड़क पर खड़ा रिक्शा वाला मुस्करा उठा.विमल को याद आया कि वह पापा के साथ उसकी रिक्शा में आया था. विमल को लगा शायद पापा रिक्शा वाले को किराये के पैसे देना भूल गए हैं इसीलिए वह इन्तजार कर रहा है.उसने सैलून में जाकर रजत को बताया तो वह हंस पड़े ,कहा—‘ मैंने ही उससे रुकने को कहा था.हमें उसी की रिक्शा में घर वापस जाना है.वह मेरा दोस्त है. मैं आज कल उसी के साथ बाज़ार आता जाता हूँ.’
विभा ने इस अजीब दोस्ती का कारण जानना चाहा तो रजत ने बताया—‘एक दिन मैं इसी की रिक्शा में बाज़ार जा रहा था.एकाएक रिक्शा केमिस्ट की दुकान के सामने रुक गई. मेरे पूछने पर खिलावन ने कहा कि उसका बेटा अस्पताल में है. उसके लिए दवाई लेनी है. वह केमिस्ट के पास गया और दवा लेकर लौट आया. वह रिक्शा चलाने को हुआ तो मैंने रुकने को कहा. मैंने केमिस्ट की आवाज सुन ली थी –‘पूरे पैसे लेकर आया करो.’’ मैं रिक्शा से उतर कर केमिस्ट के पास गया. वह मेरा परिचित है, कई बार दवाइयां लेता हूँ .उसने बताया कि रिक्शा वाले के पास पैसे पूरे नहीं थे इसलिए ... मैंने देखा काउंटर पर कुछ दवाइयां रखी थीं ,ये वही थीं जिन्हेँ पैसे कम होने के कारण केमिस्ट ने रोक लिया था.
‘’ और फिर वे दवाएं तुमने रिक्शा वाले को थमा दीं और इस तरह वह तुम्हारा नया दोस्त बन गया.’’—विभा ने हंस कर कहा.
‘ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. उसने लेने से इनकार कर दिया. उसने जो कुछ कहा उसका मतलब इतना ही था कि मैं उसे भीख दे रहा था जिसे वह कभी नहीं लेगा.यानि मैंने उसके स्वाभिमान पर  चोट की थी.’
‘शायद तुम्हारे व्यवहार से उसे ऐसा लगा हो.’—विभा बोली.
‘’मेरा व्यवहार वैसा नहीं था जैसा तुम सोच रही हो .पर बीमार बच्चे को पूरी दवाइयां तो मि लनी ही चाहिए थीं. पर वह  जिद पर अडा था.’’
‘ फिर आपने क्या किया?’’—विमल ने पूछा.
‘’मैंने उसे समझाया कि उसकी जिद के कारण उसके बेटे की बीमारी बढ़ सकती है.मुझे एक उपाय सूझ गया. मैंने कहा—‘ये दवाएं मैं तुम्हें उधार दे रहा हूँ. तुम मेरा उधार चुका सकते हो. ‘
‘’वह कैसे?’—उसने पूछा.
‘मैं रोज शाम को बाजार जाता हूँ. तुम मुझे अपनी रिक्शा में ले जा सकते हो. मैं तुम्हे किराया नहीं दूंगा .उन पैसों को मैं तुम्हारे उधार में से काट लूँगा. इस तरह तुम्हारा उधार हर रोज उतरता जाएग और बच्चे को पूरी दवाएं मिलती रहेंगी.’’ खिलावन के चेहरे का तनाव कुछ कम होता लगा. बस तब से यही हो रहा है.’’ रजत ने विभा और विमल को  एक कापी दिखाई जिसमें खिलावन
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   का हिसाब लिखा हुआ था.

विमल ने पूछा – ‘क्या आप यह हिसाब खिलावन को दिखाते हैं?’
वह अनपढ़ है.’
‘’तब तो हिसाब में गड़बड़ी भी हो सकती है.’’—विभा ने कहा.
‘’हो सकती है,पर मैं...’’
‘’तो इसीलिए आपने आज रिक्शा वाले को किराया नहीं दिया था.’ –विमल बोला.
‘’ तुम रिक्शावाले की जगह खिलावन दादा भी कह सकते हो.’’ रजत ने गम्भीर स्वर में
 कहा.
‘’सॉरी पापा. क्या आप मुझे उनके घर ले चलेंगे? मैं उनके बेटे से मिलना चाहता हूँ,’’
‘’कभी ले चलूँगा. अब उनका बेटा रमेश ठीक है.उस दिन मैं सड़क पर निकला तो खिलावन ने पुकार लिया—‘’बाबूजी, खुश खबरी है.रमेश को अस्पताल से छुट्टी मिल गई है.’ मैंने कहा—वाह तब तो पार्टी होनी चाहिए,’ वह मुझे चाय पिलाने ले गया. एक चाय वाले की दूकान पर हम चाय पीते हुए देर तक बातें करते रहे. उसने बताया कि उसे गाँव क्यों छोड़ना पड़ा. वही जात पांत ओर्  रोजगार  न मिलना. लेकिन गाँव की याद बहुत आती है.’’
‘तुम खिलावन को विमल की जन्म दिन की पार्टी में बुला सकते थे.’ –विभा ने कहा.
‘’ उसे बुला कर मैं तुम्हें और खिलावन दोनों को संकट में  नहीं डालना चाहता था. उनकी और हमारी दुनिया में अभी काफी दूरी है.बीच में पुल बनने में न जाने कितना समय लगने वाला है पर उस दिन मैंने अपने दोस्त को पार्टी जरूर दी थी. ‘’
‘’कहाँ?’
उसी चाय की दूकान पर जहाँ रमेश के स्वस्थ होने की दावत हुई थी.’’—कह कर रजत मुस्करा दिए. विभा और विमल भी हंस रहे थे.                                       ( समाप्त )

Thursday, 2 November 2017

मिठास



क्या मिठाई का मिठास मन के अँधेरे को उजला कर सकता है? पता नहीं. उस छोटी सी दुकान में बैठी बूढी औरत और सात आठ  साल के छोकरे को सोमू कई दिनों से लगात्तार देखता हुआ कुछ सोच रहा था. क्या खिचड़ी पक रही थी उसके मन में?
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सोमू ने ध्यान से उधर देखा –अगल बगल रोशनी से चमकती दुकानों के बीच दबी सहमी सी संकरी छोटी सी जगह में पीला बल्ब जल रहा था. एक फट्टे पर दो थालियों में समोसे और गुलाब जामुन रखे थे . उनके पीछे दो जने बैठे थे – एक बूढी औरत और सात आठ साल का एक बच्चा. उस में ऐसा क्या देखने लायक था जो सोमू जैसा आदमी उधर देखे—और वह भी इतने ध्यान से. और यह कोई पहली बार नहीं था. पिछले कई दिनों से यह देखा देखी चल रही थी. कोई सोमू से पूछे तो वह बस मुस्करा कर रह जाएगा.
वह किसी को बताने वाला नहीं था कि उसके मन में क्या चल रहा था. बहुत बड़े प्लान की खिचड़ी पक रही थी सोमू के दिमाग में. वह  गाँव से शहर आया था काम की तलाश में. काम तो नहीं मिला पर कुछ ऐसे दोस्त जरूर बन गए जो सोमू को अँधेरे रास्तों पर ले गए, जहाँ बिना कुछ किये कभी कभी हाथ में पैसे आ जाते थे. बीच बीच में गाँव जाने पर वह पिता को बताया करता था कि वह एक दुकान  खोलने की सोच रहा है. यह सुनकर वह खुश हो जाया करते थे. मेहनत –मजूरी करके जैसे तैसे पेट भरने का जुगाड़ करने वाले पिता का सपना भी यही तो था.
पिता को तसल्ली देना और बात थी लेकिन सोमू को अच्छी तरह मालूम था कि शहर में एक छोटी सी दुकान पाना तो दूर उसका सपना भी कभी साकार होने वाला नहीं था. इसी उहापोह में डूबा हुआ सोमू उस गली से चला जा रहा था, तभी उसकी नजर उस दुकान पर टिक गई जो रौशनी से चमचमाती दुकानों के बीच दबी हुई किसी अनाथ बच्चे की तरह लग रही थी. सोमू के कदम ठिठक गए. वह कुछ देर तक देखता खड़ा रहा. मन में कई सवाल सिर उठा रहे थे. आखिर वह खस्ताहाल  दुकान किसकी थी. क्या वह पिता के सामने कही गई अपनी झूठी बात को सच कर सकता था?
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सोमू ने आस पास की दुकानों में पता किया था, गली में खड़े फेरी वालो से पूछा था. वह खस्ता हाल दुकान किसी नरेश की थी. वह अक्सर बीमार रहा करता था. इसलिए दुकान खुलती कम लेकिन बंद ज्यादा रहती थी. और नरेश की जगह उसकी बूढी माँ रामवती अपने पोते परेश के साथ बैठी नजर आती थी. सामने समोसे और गुलाब जामुन रखे हुए, जो देखने से ही बासी लगते थे. सोमू ने कई दिन तक देखा और सोचा और फिर एक शाम रामवती के सामने जा खड़ा हुआ.
‘’ माई, राम राम.’ – सुन कर रामवती हडबडा गई. उसने परेश का हाथ थाम कर सोमू की ओर देखा और आँखें पोंछने लगी, नरेश के दुनिया से चले जाने के बाद किसी ने शायद पहली बार उसे माई कह कर पुकारा था. सोमू ने कहा-‘ माई , समोसा और  गुलाब जामुन तो देना , भूख लगी है.’’
रामवती ने झट पास रखी प्लेट उठा कर अपने आँचल से पोंछी और एक समोसा और एक गुलाब जामुन रख कर सोमू की ओर बढ़ा दी. सोमू प्लेट लेकर परेश के पास बैठ गया. वह खाना शुरू करता इसके पहले ही रामवती ने हडबडा कर कहा –‘बेटा माफ़ करना ये गरम नहीं हैं.’
‘ माई, भूख में सब चलता है, वैसे गरम होते तो..’—अपनी बात अधूरी छोड़ कर सोमू ने समोसा खाना शुरू कर दिया. फिर दूसरे हाथ से परेश के बाल सहला दिए. रामवती ध्यान से देख रही थी. परेश ने दादी की ओर देखा तो बोल उठी—‘’ तेरे मामा हैं.’’अब परेश ने सोमू की ओर नजर घुमाई तो सोमू ने उसका कन्धा थपकते हुए कहा—‘  माई ने सच कहा—मैं तेरा मामा ही तो हूँ.’’ फिर रामवती से बोला—‘ समोसा और गुलाब जामुन ठंडे लेकिन स्वादिष्ट हैं. ‘’ फिर कंधे पर लटकते झोले से प्लास्टिक का डिब्बा निकाल कर रामवती को थमा दिया. रामवती कुछ समझ न पाई. हंस कर बोला—‘गुलाब जामुन इसमें और समोसे कागज की थैली में रख दो. मैं दोस्त के घर जा रहा हूँ. गरम करके खायेंगे तो मज़ा आएगा.’
रामवती असमंजस में थी. सोमू बोला—‘ क्या सोच रही हो. जितने गुलाब जामुन और समोसे  हैं, सब रख  दो.’’
‘’ क्या सच , सारे लोगे,लेकिन... ‘’  सोमू ने डिब्बा रामवती के हाथ से ले कर खुद  रामवती की मुश्किल आसान कर दी, फिर जेब से सौ रुपये का नोट निकाल कर उसे थमा दिया.
वह बोली –‘लेकिन मेरे पास छुट्टे नहीं हैं.’’ ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई  ग्राहक इतना सारा सामान ले रहा था. आखिर कौन है यह लड़का जो उसे नरेश की तरह माई कह रहा है. मन में जैसे कुछ हो रहा था. पर क्या , इसे रामवती समझ नहीं पा रही थी.हंस कर सोमू ने कहा—‘ माई,चिंता मत कर. माँ –बेटे का हिसाब लम्बा चलेगा. इतनी जल्दी चुकता होने वाला नहीं.
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. मैं कल आकर बकाया ले लूँगा.’’ रामवती सोमू को जाते हुए देखती रही. परेश भी उधर ही ताक रहा था. दुकान बंद करके घर की ओर जाते हुए भी इसी बारे में सोच रही थी. कौन था यह अजनबी लड़का, जिसने नरेश की तरह माई पुकार कर उसके साथ बेटे का रिश्ता जोड़ लिया था.
    क्या रामवती को  जरा भी आभास था सोमू की कपट योजना के बारे में ? नहीं था, लेकिन सोमू ने पहले से ही सब कुछ सोच लिया था कि कब क्या कहना और करना है. अपने कमरे पर पहुँच कर उसने दोस्तों को बुला लिया. सब गरम समोसों और गुलाब जामुन का मजा ले रहे थे. एक ने पूछा तो हंस कर बोला—‘’ दुआ करो यह सिलसिला चलता रहे. ‘’ इससे ज्यादा क्या कहता भला.   
    रामवती घर पहुँच कर बहू रचना को कुछ बतलाती इससे पहले परेश बोल उठा—‘’आज मामा आये थे और दादी को सौ का नोट दे गए.’’ रचना ने अचरज के भाव से रामवती की ओर देखा तो उसे बोलने का मौका मिला. उसने सौ का नोट रचना को देते हुए पूरी बात कह सुनाई. रचना सौ के नोट को देखती हुई सोचती खड़ी रही. बात कुछ रहस्यमय लग रही थी.
     अब सोमू को अगली चाल चलनी थी.  दूसरी शाम वह दुकान पर पहुंचा तो हडबडा गया—दुकान बंद थी. कुछ देर सोचता खड़ा रहा.अब क्या करे. तभी दूसरी तरफ खड़े फेरी वाले ने कहा –‘ आज दुकान नहीं खुली. शायद घर में किसी की तबीयत ख़राब हो. वैसे बेटे की मौत ने उसे तोड़ कर रख दिया है. पता नहीं किस उम्मीद में पोते के साथ यहाँ बैठी रहती है. मैंने तो कई बार समझाया है कि दुकान किसी को किराए पर दे दे या बेच कर छुट्टी करे.दुकान चलाना उसके बस की बात नहीं. ‘’
       फेरी वाले के शब्द सोमू के कानों में जैसे मिठास घोल रहे थे. अगर ऐसा हो जाए तो...तो.... पल भर में मन न जाने कितनी दूर उड़ गया. फिर अचकचा कर बोला—‘ तुम किसी की बीमारी के बारे में कह रहे थे. पता ठिकाना मालूम होता तो जा कर देख आता.’’
‘’मैंने शायद तुम्हे कल भी देखा था. मैं रामवती के घर के पास ही रहता हूँ. आओ ले चलूँ. ‘’ आगे का प्लान सोचता हुआ सोमू फेरी वाले के पीछे चल दिया.
दो गलियाँ पार करके फेरीवाला एक दरवाजे के सामने रुक गया. उसने आवाज लगाईं और दरवाज़ा खडका दिया. दरवाज़ा परेश ने खोला . सोमू को देखते ही मुड़ कर चिल्लाया—‘दादी, मामा आये हैं.’’सोमू अंदर घुसा तो देखा—रामवती चटाई पर हाथ टेक कर उठने की कोशिश कर रही थी. बोला—‘ माई,लेटी रहो.बताओ तबीयत कैसी है.’ और उसके पास ही बैठ गया.
   ‘’मैं ठीक हूँ. तू अपनी बता.’’—कहते हुए रामवती ने मुस्कराने का प्रयास किया. ‘
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‘’ तेरा हाथ मेरे सिर पर है तो मुझे क्या चिंता.’’—कहते हुए सोमू ने रामवती  का हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रखा तो चौंक पड़ा.उसे तेज बुखार था. परेश से बोला—‘’  तेरी दादी को तो डाक्टर को दिखाना होगा. जवाब में रचना ने कहा—‘’ मैं तो सुबह् से कई बार डाक्टर को दिखाने की बात कह चुकी हूँ ,लेकिन...’
‘’ अभी आया.’’—कह कर सोमू बाहर निकल गया. कुछ देर बाद लौटा तो रामवती की बांह पकड़ कर बोला –‘’रिक्शा बाहर खड़ी है ,आओ.’ फिर साथ में परेश को भी ले लिया. रामवती के लौटने तक रचना ने इखरे बिखरे घर को कुछ संवार दिया .सोमू ने रामवती को दवा दी और कहा—अब चलता हूँ, कल फिर आऊंगा.’’ लेकिन रामवती की पुकार ने रोक लिया. बोली—‘ उस दिन ठन्डे समोसे और गुलाब जामुन ले गया था. आज गरम चाय है, पीकर जाना.’ वह हंस रही थी. सोमू को पुराने दिन याद आ गए.उसकी दादी भी ऐसे ही हंसा करती थी. वह  रामवती के पास ही बैठ गया. उसके म न ने कहा—‘ सोमू ,तेरा काम हो गया.’
रामवती उसे नरेश की बातें सुनाते हुए रोने लगी. बीच बीच में उसका हाथ थाम लेती थी सोमू उसके हाथ के कम्पन को महसूस कर रहा था. चाय पीते पीते सोमू ने घर को अच्छी तरह निरख परख लिया. उसने एक बर्तन में रखे गुलाब जामुन देखे और कुछ कहने को हुआ पर रचना पहले ही बोल पड़ी—‘’मैंने गुलाब जामुन बहुत पहले ही बना लिए थे, फिर अम्माजी की ताबियत बिगड़ गयी. समोसे नहीं बन सके.’’
‘’कोई बात नहीं, एक काम करो –यह गुलाब जामुन वाला बर्तन मुझे दे दो. घर में तो इन्हें खराब ही होना है.’’—सोमू बोला.
‘’पर आप इतने सारे गुलाब जामुनो का क्या करेंगे?’’
यह भी खूब कहा.खुद खाऊंगा और दोस्तों को खिलाऊंगा.’’—सोमू ने कहा.’’उस दिन ठन्डे समोसे और गुलाब जामुन गरम करके खाए तो सबको बहुत अच्छा लगा था. कुछ उसी तरह की  दावत आज भी कर लेंगे .’’—कहते हुए सोमू ने रामवती की ओर देखा.
‘’ शैतान.’’—कह कर रामवती मुस्करा पड़ी.
सोमू ने कहा—‘’ माई,अब कुछ दिन दुकान पर मत बैठना, वर्ना तबीयत ज्यादा बिगड़ जायेगी.’
‘’लेकिन..’
लेकिन वेकिन रहने दो.मैंने दुकान ठीक ढंग से चलाने के बारे में कुछ सोचा है. ‘’
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‘’ और मैंने भी सोच लिया है.’’—रामवती ने कहा.
फिर आने की बात कह कर सोमू बाहर चला आया. रामवती की बात बार बार कानों में गूँज रही थी. आखिर दुकान के बारे में क्या सोचा था रामवती ने!कहीं उसका झूठा सपना सच तो नहीं होने जा रहा था. सोमू कई बार रामवती का हाल चाल लेने गया.उसे देख कर रामवती जैसे निहाल हो जाती थी.उसके जीवन में ऐसा पहली बार था कि किसी गैर ने उसके मन में इतनी गहरी जगह बना ली थी.और फिर एक दिन सोमू सबको दुकान पर ले गया, आसपास की चहल पहल के बीच अपनी उदास,उजाड़ दूकान रामवती और रचना को दुखी कर गई. सोमू बड़े ध्यान से उनके हाव भाव परख रहा था.
कुछ देर की चुप्पी के बाद सोमू ने कहा—‘’ माई, पहले मेरी सुनोगी या अपनी कहोगी.’’
‘’तूने दुकान के बारे में क्या सोचा है?
‘’मैंने परेश के बारे में कुछ सोचा है. दुकान नरेश और तुम्हारी है . दूकान की चिंता तुम करो.’’    
‘’परेश के बारे में क्या...
यही कि दूकान के चक्कर में नरेश की माई परेश का जीवन नष्ट कर रही है.’’ –सोमू ने गंभीर स्वर में कहा.’’बचपन पढाई और खेल कूद के लिए होता है. लेकिन तुम उसे सारा दिन दुकान पर अपने साथ बांधे रखती हो.’’
‘’यह तो मेरी आँखों का तारा है.’’—कहते हुए रामवती ने परेश को आलिंगन में बाँध लिया.उसकी आँखें भर आईं. रचना भी आंसूं पोंछने लगी.
‘’ माई,मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहता. लेकिन हमें परेश के बचपन के बारे में भी तो सोचना चाहिए.हमें इसे स्कूल भेजना चाहिए.’’
‘’पर मैं अकेली तो दूकान चला नहीं सकती.’’
‘’ मैं भी यही चाहती हूँ कि परेश पढाई करे. इसके पापा की भी यही इच्छा थी.’’—रचना बोली.
‘’हमारे घर के  पास एक अध्यापक रहते हैं.मैंने परेश के बारे में उनसे बात की थी. उनका कहना है कि पहले परेश को उनके पास भेजा जाए ताकि वह समझ सकें कि परेश को किस क्लास में प्रवेश मिल सकता है.’’
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‘’यह तो बहुत अच्छा रहेगा.’’—रचना ने उत्साहित स्वर में कहा,
‘’ लेकिन दुकान...’’ –रामवती बीच में रुक गई’
‘’माई, मैंने इसका भी इंतजाम कर लिया है.’’—सोमू ने रामवती का हाथ पकड़ कर कहा ‘मैं एक कारीगर को जानता हूँ जो अच्छी मिठाई बना सकता है’’ ,.फिर रचना की ओर देख कर बोला –‘अब तुम्हे घर पर गुलाब जामुन और समोसे बनाने की जरूरत नहीं.माई सुबह आकर दुकान खोल देगी ,फिर कारीगाए गुलाब जामुन और समोसे बना देगा. ग्राहकों को सामान भी वही देगा.माई का काम सिर्फ पैसे लेना होगा.’’
‘मैं अकेली’. .’—रामवती ने कहना चाहा .
‘’ तुम्हारे साथ रचना भी रह सकती है.मास्टरजी से पढ़ कर परेश भी यहीं आ जाया करेगा. लेकिन उसे आगे बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी. वह पीछे बैठ कर पढ़ सकता है. तुम तीनों जैसे सुबह साथ आओगे उसी तरह शाम को घर चले जाना,’’—कह कर सोमू चुप हो गया.
रामवती ने कहा—‘’अब मेरी भी सुन ले.मैं इतना झंझट नहीं कर सकती.तू दुकान संभाल ,हमें आराम से रहने दे.’’
सोमू के मन में ख़ुशी फूटने लगी. अरे,उसकी योजना कितनी आसानी से सफल हो गई थी. लेकिन कुछ तो कहना ही था.’’ माई, तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारी मुसीबत अपने गले में डाल लूं. ना माई ना. मैं इतना पागल नहीं. तुम जानो तुम्हारा काम . हाँ परेश को अध्यापक से जरूर मिला दूंगा.मिठाई बनाने वाला कारीगर भी कल से आ जायेगा. ‘’ मैं यह चला.’’ और वह चुपचाप उठ कर चला गया.
‘’ अरे सुन तो.’’—रामवती पुकारती रह गई. पर सोमू रुका नहीं ‘’अब शायद नहीं आयेंगे.’’—रचना ने उदास स्वर में कहा. लेकिन अगली सुबह वह्परेश को अध्यापक के पास ले जाने के लिए आ गया.बोला—‘’परेश को मास्टरजी के पास छोड़ कर मैं मिठाई वाले कारीगर के साथ दूकान पर पहुँचता हूँ. तुम दोनों भी आ जाओ.’’ हलवाई ने समोसे और गुलाब जामुन बना दिए. कई ग्राहक मिठाई ले गए. दोपहर में सोमू परेश को दूकान पर छोड़ गया. रचना से बोला—‘अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी. हलवाई का हिसाब सप्ताह के अंत में करती  रहना.’’
‘’ पर तू कहाँ जा रहा है?’—रामवती ने कहा. ‘’मैंने तुझ से दुकान सँभालने को कहा और तू है कि डर कर भाग रहा है.’
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‘हाँ मैं डरता हूँ तो बस अपने से. वैसे मैं कहीं जा नहीं रहा हूँ. बीच बीच मैं आकर देखता रहूँगा कि तुम अपने बेटे का नाम कितना आगे बढ़ा रही हो. और परेश की पढाई कैसी चल रही है.’’—कह कर सोमू रामवती के पैरों पर झुक गया’.उसका हाथ पकड़कर अपने सर पर रख लिया .फिर  तेजी से चला गया.
नरेश की दुकान अब अच्छी चल रही है. परेश को स्कूल में प्रवेश मिल गया है. लेकिन दुकान को हथियाने के इरादे से आया सोमू कहाँ है? वह रामवती के साथ छल करना चाहता था,पर जरूरत नहीं पड़ी.रामवती तो खुद उसे दुकान देना चाहती थी,फिर क्यों नहीं ली .बेटे की याद में तड़पती माँ से उसका सहारा छीनने की उलझन में सोमू रामवती के कितना निकट चला गया था यह उसे पता ही नहीं चला.और जब  मालूम हुआ तो...                                 ( समाप्त )