Thursday, 19 October 2017

मैं और तुम



तुमने  शब्द चुने
मैं पराया हो गया।
एक एक शब्द में
हजार अर्थ
हर अर्थ में
मैं और मेरा सब
न जाने
कितनी कितनी बार व्यर्थ।

ये अर्थ हैं?
तो वह क्या था?
हर कहीं
हर समय
हम निःशब्द निकट,
बांसों की बांसुरी
चहक पंखों की
झीलों के दरपन
पोंछती धूप
कभी घुलते
चांद-तारे.
ये सब
कैसे कैसे
पुल बनाएं
हम और तुम
दौडे चले जाएं!
-लेकिन
तुम्हारा सार्थक होने का मोह!
क्या कहूं...
तुमने अर्थ चुने
मैं पराया हो गया!

Friday, 29 September 2017

ना अब नहीं



पक रही है कढ़ी
भूख सिर पर खड़ी
 भात है चांदनी
धूप सी  है कढ़ी

माँ कहे सब्र कर
भात में है कसर
ना अब नहीं
भूख सिर पर खड़ी

झट खिला दे मुझे
भात के संग कढ़ी

Friday, 15 September 2017

चोट की दावत



आखिर किसी की चोट का दावत से क्या सम्बन्ध हो सकता है? लेकिन अगर हो तो ? हाँ कुछ ऐसा ही हुआ था सोनू और बालन के साथ. और फिर ....
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   दोपहर का समय – बच्चे स्कूलों से लौट रहे हैं. एक के बाद दूसरी बस आकर रूकती है,बच्चे शोर मचाते,हँसते-मुस्कराते उतरते हैं और प्रतीक्षा करते घर वालों के साथ चले जाते हैं. कुछ समय तक शोर और हड़बड़ी के बाद वातावरण शांत हो जाता है. सुबह और दोपहर में रोज यही क्रम चलता है. लेकिन वह दोपहर कुछ अलग थी.सोसाइटी के गार्ड रामबरन ने देखा गेट के बाहर वाली मुंडेर पर एक रोटी रखी है और उस तरफ नजरें गडाए एक लड़का खड़ा है.
     वह लड़का सोनू था. गार्ड सोनू को खूब जानता है. वह सड़क पर समय गुजारने और रात में फुटपाथ पर कहीं भी सो जाने वाले लड़कों में से है. सोनू कहाँ से आया था इस बारे में रामबरन भी औरो की तरह कुछ नहीं जानता. इन छोकरों के बारे में जानकारी जुटाने की जरूरत उसे कभी महसूस नहीं हुई. उसने सोनू को वहां आकर रुकने वाली कारों के शीशों पर झाडन फिरा कर कुछ मांगते और डांट खाकर पीछे हटते हुए कई बार देखा है. ऐसे में एक प्रश्न मन में उठता है—क्या इन बच्चों का कोई नहीं है.
     लेकिन इस समय सोनू मुंडेर पर रखी रोटी के पास पहरेदार की तरह क्यों खड़ा है भला. उसने पूछा —‘ अरे इस रोटी की पहरेदारी क्यों कर रहा है? खाता क्यों नहीं .
      ‘ रोटी मेरी नहीं किसी की है.’’
       ‘’किसकी?’
      ‘’बालन की.’’
      बालन को भी जानता है रामबरन. बालन भीख मांगता है. और कुछ ऐसे वैसे काम भी करता है जिन्हें कोई भी ठीक नहीं मानता. सोनू ने जो कुछ बताया उसका मतलब था—अभी  कुछ देर पहले स्कूल बस से उतरते हुए कोई बच्चा गिर पड़ा. तब सोनू और बालन वहीँ खड़े थे. बालन के हाथ में रोटी थी.उसने रोटी मुंडेर पर रखी और बढ़ कर रोते हुए बच्चे को उठा लिया और सोसाइटी के अन्दर की तरफ चल दिया. बच्चे की माँ भी आगे आगे चल रही थी. बालन ने सोनू से रोटी का ध्यान रखने को कहा और जल्दी लौटने की बात कह कर अन्दर चला गया. बालन को अन्दर गए काफी देर हो गई थी और वह अब तक नहीं लौटा था
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रामबरन ने कहा —‘ तू उसकी रोटी की पहरेदारी कब तक करेगा. इसे खा ले  मेरे खाने के डिब्बे में एक रोटी बची हुई है. मैं उसे दे दूंगा. ‘ तभी न जाने कहाँ से एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और मुंडेर पर रखी रोटी उठा कर भाग गया. सोनू चोर चोर चिल्लाता हुआ उसके पीछे दौड़ गया. रामबरन को हंसी आ गई. तभी उसने बालन को आते देखा. उसके हाथ में एक थैली लटक रही थी. मुंडेर पर रखी रोटी और सोनू –को गायब देख कर वह चिल्लाया—‘’ चोर कहीं का. मेरी रोटी लेकर भाग गया.’
      रामबरन ने बालन को पूरी बात बता दी. कहा—‘’उसका कोई कसूर नहीं है. ‘’
      बालन ने हाथ की थैली अखबार के पन्ने पर उलट दी.हंस कर बोला—‘अपनी तो दावत हो गई’’. वह ठीक ही तो कह रहा था. अखबार पर ढेर सारी पूरियां और मिठाई दिख रही थीं. रामबरन कुछ पूछता इससे पहले ही बालन पूरी कहानी सुना गया. उसने कहा--; बच्चे की चोट मामूली थी. माँ ने दवा लगा दी. मैं चलने लगा तो उन्होंने रोक यह पूरी –मिठाई मुझे दे दी. साथ ही दस का नोट भी  दिया,’’
       ‘ वाह तेरे तो मजे आ गए.’’ रामबरन ने कहा.’’ बच्चे को चोट लगी और तुझे पूरी,मिठाई और बख्शीश भी मिल गई. ‘’
       ‘’वह सब तो ठीक पर बच्चे को चोट नहीं लगनी चाहिए थी.’’ तभी सोनू भागता हुआ आ गया.उसकी मुट्ठी मैं रोटी का टुकड़ा झाँक रहा था.बोला –‘’ मैंने भी रोटी चोर को पकड़ कर ही दम लिया.छीना - झपटी में आधी रोटी उसके हाथ में ही रह गई.’’
      बालन ने हंस कर उसका कन्धा थपथपा दिया,बोला—‘ छोड़ रोटी की बात.ले पूरी और मिठाई खा.’’दोनों ने छक कर खाया फिर भी काफी खाना बच गया. बची हुई भोजन सामग्री को थैली में डालते हुए हंस कर बोला—‘ऐसा पहली बार हुआ कि दिन में छक कर खाने के बाद रात का भी इन्तजाम हो गया हो.’’
       ‘’क्या ऐसा रोज नहीं हो सकता?’’
       ‘’कम से कम भीख से तो कभी नहीं.’’—कहते हुए बालन सोनू का हाथ थाम कर चल दिया.
       ‘’तो फिर कैसे?’’
        सोनू को अपने सवाल का जवाब नहीं मिला. बालन एक पेड़ के नीचे बने छोटे से मंदिर के सामने हाथ जोड़ कर आँखें बंद कर खड़ा था. ‘’तुम भगवान् से भी मांगते हो.’’—सोनू बोला.
     ‘’अपने लिए कुछ नहीं .बच्चों के लिए माँगा.’’
                                            2
     ‘’क्या?’’
     ‘’यही कि सब बच्चे ठीक रहें,किसी को चोट न लगे.’’
     ‘’लेकिन अगर बच्चे को चोट न लगती तो दावत कैसे होती.’’
    बालन ने सोनू के गाल पर चपत लगा दी, चिल्ला कर बोला—‘’फिर कभी ऐसी गलत बात मत कहना,’’सुन कर सोनू सहम गया. वह सोच रहा था—आखिर मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया. दावत की बात खुद बालन ने ही तो कही थी. पूरे दिन दोनों बालन और सोनू साथ साथ घूमते रहे.सोनू कुछ समझ नहीं पा रहा था. रात हुई तो भूख सताने लगी.रोज तो वह कारों के शीशे साफ़ करके या बोझ ढो कर रोटी का जुगाड़ कर लेता था,लेकिन उस दिन मौका नहीं मिला. लेकिन एक आशा थी कि जब बालन सुबह का बचा हुआ भोजन खाने बैठेगा तो उसे भी दावत में हिस्सा जरूर देगा. लेकिन उस रात भूखे ही रहना पड़ा. क्योंकि बालन ने भी कुछ नहीं खाया. क्या सोनू को  पता था कि उसने बचे भोजन की थैली कूड़े मैं फैंक दी थी.
       सुबह दोनों सोसाइटी के गेट पर खड़े थे. बच्चे हँसते मुस्कराते हुए स्कूल बसों मैं चढ़ रहे थे. बालन खुश था. दोपहर में बच्चों के लौटते समय भी बालन सोनू का हाथ थामे हुए वहीँ मौजूद था. बच्चों के सोसाइटी में चले जाने के बाद सोनू ने कहा—‘ आज किसी बच्चे को चोट नहीं लगी.’’
          ‘’मैंने भगवान् से यही तो माँगा था.’’—बालन ने हंस कर कहा. ‘’ आज तुम्हारी दावत नहीं होगी,’’—सोनू भी हंस रहा था.
          ‘’आज से दूसरे के आगे हाथ फैलाना बंद.’
           ‘’तो खाना कैसे मिलेगा?’’—सोनू ने जानना चाहां.
        ‘’कोई और काम करेंगे,’’
            क्या काम?’’
            सुबह और दोपहर बच्चों को देखेंगे. ‘’
            बच्चों को देखना---यह कैसा काम है?’’
         इससे ख़ुशी मिलेगी तो आधा पेट अपने आप भर जाएगा.’’
        ‘’और बाकी आधा?’’—सोनू ने पूछा
                                             3 .
           आधी भूख मिटाने के लिए काम करेंगे,’’    
         ‘’ हाँ काम करेंगे ,किसी से कुछ मांगेगे नहीं. ‘’
         अगली और उसके बाद आनेवाली हर सुबह और दोपहर के समय बालन और सोनू हँसते मुस्कराते बच्चों को देखते खड़े रहते थे. पता नहीं उन्हें कोई काम मिला या नहीं.पर बच्चों की  देख भाल का काम उन्होंने किसी से पूछे बिना संभाल लिया था. (समाप्त )
    

Saturday, 19 August 2017

आओ नाश्ता करें -



रविवार की सुबह नाश्ते की मेज पर पकवानों और खिलखिलाहट की सुगंध के साथ उतरती थी ,लेकिन बाबा उस दावत मैं शामिल नहीं होते थे.वह अपना नाश्ता छत पर परिंदों के साथ करते थे.आखिर क्यों? :-

‘मेरा नाश्ता ऊपर भेज देना.’—कह कर अमित के बाबा छत की ओर जाने वाली सीढियां चढ़ने लगे. अमित के बाबा यानि शामलाल जी. अमित की मम्मी अल्पना नाश्ते की प्लेट लगा रही थी.उन्होंने कहा—‘बाबूजी, छत पर क्यों,अपने कमरे में आराम से बैठ कर...’ लेकिन बात पूरी न हुई,शामलाल जी तब तक छत पर जा चुके थे. अल्पना ने अमित के पापा की ओर देखा तो उन्होंने कंधे उचका दिए – यानि जैसी बाबूजी की मर्जी.
 रसोई की हवा में मिठास तैर रहा है. हलवा बन रहा है. फिर कटलेट की बारी है. रविवार की सुबह का नाश्ता विशेष होता है. तब पूरा परिवार एक साथ नाश्ते का आनंद लेता है.वर्ना हर सुबह भागमभाग और हड़बड़ी में गुज़रती है. पहले अमित स्कूल जाता है फिर उसके पापा विनय निकलते हैं. इसके बाद अल्पना जल्दी-जल्दी काम निपटा कर आफिस चली जाती है, यह सोच विचार करती हुई कि क्या काम अधूरा छूट गया है. इन तीनों के जाने के बाद अमित के बाबा घर में अकेले रह जाते हैं. दोपहर में अमित के स्कूल से लौटने के बाद दोनों साथ साथ भोजन करते हैं, अब शामलाल जी आराम करते हैं. क्योंकि इससे पहले काम वाली बाई आती है,उसका ध्यान रखना होता है, ऐसे में  आँख मूँद कर आराम से तो लेटा नहीं जा सकता.
शाम चार बजे बाबा को दवाई देकर अमित ट्यूशन पर चला जाता है. अमित के पापा के लौटने के काफी देर बाद अल्पना आती है, और कुछ देर आराम के बाद शाम के भोजन की तैयारी में जुट जाती है. घर और दफ्तर की छह दिनों की भागदौड़ की थकान इतवार की सुबह नाश्ते की मेज पर स्वादिष्ट पकवानों का मज़ा लेते हुए उतरती है.कभी कभी कोई दोस्त या रिश्तेदार् भी आ जाता है तो नाश्ते का मज़ा कई गुना बढ़ जाता है. घर में खिलखिल की लहरें उठने लगती हैं.लेकिन शामलाल जी को नाश्ते में शामिल ही नहीं किया जाता.इसलिए रविवार के नाश्ते के साथ घुलीमिली हंसी उन्हें एकदम अच्छी नहीं लगती.आखिर ऐसा क्यों होता है उनके साथ?
   अमित के पापा विनय से पूछो तो वह जो कुछ कहेंगे उसका मतलब इतना ही है कि उनके पिता शामलाल जी को कई रोगों ने घेर रखा है. इसलिए दवाओं के साथ परहेज का भोजन दिया जाता है.पर वह स्वादिष्ट चटपटे खान-पान के शौकीन हैं इसलिए ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन उनके पिता शामलाल इस बात को नहीं मानते.इसलिए रविवार का नाश्ता वह छत पर करते हैं -- तरह तरह के स्वादिष्ट पकवानों से दूर. नाश्ते की मेज़ से उठने वाली खिलखिल उनके मन को गुस्से से भर देती है. यदि कोई उनसे पूछे तो वह कहेंगे –अगर रविवार को मैं सबके साथ नाश्ता कर लूँगा तो कोई आफत नहीं आ जाएगी. हाँ मैं हमेशा से स्वादिष्ट और चटपटा खाने का शौकीन हूँ . लेकिन  इसके लिए मेरे साथ ऐसा व्यवहार मुझे पसंद नहीं.
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अमित नाश्ते की प्लेट लेकर छत पर गया तो शामलाल जी मुंडेर के पास खड़े थे. अमित ने  प्लेट मेज़ पर रख दी.छत पर एक गोल टेबल और दो कुर्सियां रखी हैं. सर्दियों के मौसम में रविवार की दोपहर सब लोग छत पर धूप का आनंद लेते हैं. फिर वह बाबा के पास जा खड़ा हुआ. अमित ने देखा कि बाबा मिटटी के बड़े प्याले में छत पर लगे नल से पानी भर रहे हैं. मुंडेर पर कई बड़ी -छोटी कटोरियाँ रखी हैं.बड़ी कटोरियों में परिंदों के लिए पानी और छोटी कटोरियों में दाने हैं. मुंडेर से लगा कर पौधों के गमले रखे गए हैं. हवा में पत्तियां हिलडुल रही थीं. सर्दियों की धूप अभी नीचे नहीं उतरी थी. हवा में परिदों के पंखों की फड़ फड़ और चूं चिर्र गूँज रही थी.
‘’बाबा, नाश्ता..’—अमित ने कहा तो बाबा ने नाश्ते की प्लेट की ओर देखा-- दो बिना मक्खन के टोस्ट,दो बिस्किट, एक कप दूध और एक छोटी कटोरी में दवा की गोलियां.हाँ यही हर दिन का नाश्ता है.रविवार को भी इसमें कोई बदलाव नहीं होता. उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—‘ हाँ देख रहा हूँ,  करना ही है. मैं परिंदों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. हम साथ साथ नाश्ता करेंगे.’’
‘ परिदों के साथ नाश्ता!’—अमित ने अचरज से कहा.
‘’ हाँ यह ठीक है कि परिंदे और हम एक दूसरे की बोली नहीं बोल सकते लेकिन एक दूसरे के भाव जरूर समझ सकते हैं. पशु- पक्षी जगत के प्राणी कब खुश या नाराज या डरे हुए होते हैं इसे समझा जा सकता है. क्या तुमने डाक्टर डू लिटिल के बारे में सुना है?’
अमित ने इनकार में सिर हिला दिया.
‘ वह एक ऐसे डाक्टर थे जिनके घर में अनेक पालतू पशु पक्षी रहते थे.इसलिए रोगी उनके पास आने से डरते थे. इसलिए उनका दवाखाना बंद हो गया. तब किसी ने उन्हें जानवरों का डाक्टर बनने की सलाह दी.एक तोते ने उन्हें जानवरों की बोलियाँ सिखाई और वह जानवरों के अनोखे डाक्टर बन गए. जानवरों का इलाज करने के लिए डू लिटिल ने दूर दूर की यात्राएँ की.’
‘यह तो कहानी है.’—अमित ने कहा.
       हर कहानी में कुछ सच्चाई भी होती है.’—कह कर बाबा हंसने लगे. बोले—‘ अनेक लोग घरों में पशु पक्षी पालते हैं ,वे उनके भाव अच्छी तरह समझते हैं.’’  
       ‘’हाँ.यह तो ठीक कहा आपने.’—अमित बोला.’
       ‘’तो बस हमारी छत पर उतरने वाले परिदों के बारे में भी यही सच है.’’
      ‘’पर छत पर आने वाले परिंदों के साथ कैसे नाश्ता करेंगे आप?’’—अमित ने पूछा.
       जब परिंदे दाना चुगेंगे तो भी टोस्ट खा लूँगा.’’—बाबा बोले.
       अमित देखता रहा पर कोई चिड़िया या कबूतर नीचे नहीं उतरा.उसने कहा—‘’अगर कोई पक्षी नहीं उतरा तब आप क्या करेंगे?’
        ‘’ तब तो मुझे नाश्ता अकेले ही करना होगा.खैर इसे छोड़ो,यह बताओ आज रसोई में क्या बन रहा है?’
      ‘’माँ ने हलवा और कटलेट बनाए हैं. मेरी मौसी भी आ रही हैं मालपुए और समोसे लेकर.’’
       ‘’ वाह ,तब तो बढ़िया दावत होगी.जिस गली में मेरा जन्म हुआ था वहां के हलवाई बहुत अच्छे मालपुए बनाते थे.दूर दूर से लोग  लेने आते थे. उनका स्वाद मुझे आज भी याद है.’’ बाबा   बोले. यह कहते हुए उनकी आँखें बंद थीं जैसे अपने बचपन की गलियों में पहुँच गए हों.
     अभी तक छत पर कोई  परिदा नहीं उतरा था. अमित ने धीरे से कहा—‘ बाबा,नाश्ता.’
     शामलाल जी ने कहा—‘ मुझे लगता है एक ही तरह के दाने चुग कर बेचारे बोर हो गए हैं. इतवार को तो उनके भोजन में कुछ बदलाव होना ही चाहिए.क्या कहते हो ?’’
       ‘’बात तो आपकी ठीक है,लेकिन ...’ अमित ने कहना चाहा.
       ‘’अगर मेरी बात ठीक मानते हो तो कुछ करो परिंदों का जायका अच्छा करने के लिए.’  
         अमित कुछ सोच रहा था,फिर तेजी से नीचे चला गया.  तब तक सब नाश्ता कर चुके थे और मेज से उठ कर कमरे में जा बैठे थे. अमित रसोई में गया.उसने मालपुए, समोसे और कटलेट एक प्लेट में रखे और छत पर जा पहुंचा. देख कर बाबा हंसने लगे. उन्होंने कहा—‘ अमित, तुम इनके टुकड़े करो, हम इन्हें कटोरियों में रख कर परिंदों के आने की प्रतीक्षा करेंगे.’ अमित और बाबा ने मिल कर मालपुए,कटलेट और समोसे के टुकड़ों को मुंडेर पर रखी छोटी छोटी कटोरियों में रख दिया. अब बाबा मुंडेर के पास खड़े होकर दोनों हाथ हिलाते हुए बार बार  ‘आओ आओ नाश्ता करो’ कहने लगे. अमित ने भी बाबा का अनुसरण किया. लेकिन देर तक भी कोई परिंदा नहीं आया. एकाएक बाबा ने कहा—‘अब समझ में आया कि बात क्या है.’’
        ‘क्या?’
        ‘’जब तक हम मुंडेर के पास खड़े रहेंगे तब तक परिदे नीचे नहीं उतरेंगे.’’
      ‘’तब हम क्या करें?’—अमित ने पूछा .’’
       ‘’हमें पीछे या नीचे चले जाना चाहिए.’—बाबा ने कहा.
       बात अमित की समझ में आ गई. बाबा ने कहा—‘’ तुम नीचे चलो मैं भी नाश्ता करके आता हूँ.’’
अमित सीढियों से उतरने लगा.पर फिर ऊपर चला आया. उसने देखा बाबा मुंडेर के पास खड़े हुए थे,मुंडेर पर कोई परिंदा नहीं था, पर बाबा नाश्ता कर रहे थे. अमित का मन हुआ कि बाबा से कुछ पूछे लेकिन फिर रुक गया. उसे बाबा का नाश्ता करना अच्छा लग रहा था.कम से कम रविवार को तो बाबा चिड़ियों के साथ नाश्ता कर ही सकते थे. उसने तै कर लिया था कि वह इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहेगा,बाबा से भी नहीं.                        ( समाप्त)